Thursday, September 24, 2026
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40 करोड़ पर्यटकों के दबाब में ‘हिमालय’

(वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र सेमवाल की फेसबुक वाल से)

हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती पर्यटन और विकास गतिविधियों से पर्यावरणीय असंतुलन पर वैज्ञानिक और प्रकृति प्रेमी चिंतित हैं। भारत के हिमालयी क्षेत्रों में सालाना पर्यटकों की पहुंच 40 करोड़ से ऊपर पहुंच चुकी है। पर्यटन से लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी है, लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर दबाव बढ़ रहा है। भारत की अनुमानित 64.8 लाख करोड़ रुपये की अर्थव्यवस्था में हिमालय का योगदान 21.5 फीसदी है, लेकिन हिमालयी राज्यों को इस आर्थिक मूल्य का करीब पांच फीसदी ही प्राप्त हो रहा है। वहीं, पर्यावरणीय क्षति और आपदाओं की लागत का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों को उठाना पड़ता है। यानि आपदाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित स्थानीय आबादी ही हो रही है।

हिमालय भारत के लिए आर्थिक रूप से बहुत जरूरी है और अब ये एक ऐसे मोड़ पर गया है, जहां लाखों लोगों की जिंदगी और रोजी-रोटी दांव पर लगी है। अगर हमने हिमालयी सिस्टम को अस्थिर होने दिया, तो इसके नतीजे बहुत दूर तक महसूस किए जाएंगे। इस इलाके के लिए खुशहाल और बेहतर भविष्य पर काम होना जरुरी है।

इको-टूरिज्म और जैविक खेती पर जोर

सिस्टेमिक, इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशियटिव (आईएमआई) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन एनवायरनमेंट (जीबीपीएनआईएचई) की ‘प्रॉस्परस एंड रेजिलिएंट हिमालय’ ताजा रिपोर्ट में हिमालय के लिए मौजूदा आर्थिक विकास मॉडल में बदलाव की जरूरत बताई गई है। जिसमें अनियंत्रित पर्यटन पर रोक लगाकर ‘इको-टूरिज्म’ को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है। इससे स्थानीय रोजगार बढ़ने के साथ कचरा प्रबंधन भी बेहतर हो सकता है। पारंपरिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने से पानी की बचत और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने पर जोर दिया गया है। सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं की योजना भी इस तरह बनाने की जरूरत बताई गई है, जिससे भूस्खलन और आपदा का खतरा कम हो।

हिमालय अस्थिर हुआ तो पूरे देश पर असर
हिमालय से निकलने वाली गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी सैकड़ों नदियां देश के बड़े मैदानी क्षेत्रों की कृषि और अर्थव्यवस्था का आधार हैं। असम और पश्चिम बंगाल में चाय-चावल की खेती, पश्चिम बंगाल में उद्योग और पूर्वोत्तर में जलविद्युत उत्पादन भी हिमालयी तंत्र से जुड़े हैं। हिमालयी राज्यों में विकास कार्यों की लागत राष्ट्रीय औसत से करीब तीन गुना है, जबकि बुनियादी सेवाएं और ढांचा उपलब्ध कराने की लागत मैदानी क्षेत्रों की तुलना में दो से पांच गुना तक अधिक है।

हर साल बढ़ रहा पर्यटकों का दबाव

भारतीय हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में पिछले 4-5 वर्षों में पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है। संसद और पर्यटन मंत्रालय, नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, पूरे हिमालयी क्षेत्र (जिसमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, लद्दाख और सिक्किम सहित 13 राज्य शामिल हैं) में पर्यटकों का आंकड़ा साल 2014 के 10.55 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025 में 40.78 करोड़ पार कर गया है। यह 11 वर्षों में लगभग 286% का भारी उछाल है।

पांच साल में उत्तराखंड और हिमाचल में पर्यटक
वर्ष उत्तराखंड हिमाचल प्रदेश
2021 2,00,18,115 56.37 लाख
2022 5,39,81,338 1.51 करोड़
2023 5,96,36,601 1.60 करोड़
2024 5,95,50,277 1.81 करोड़
2025 6,03,21,194 –

-2025 में पहली बार उत्तराखंड में पर्यटक/तीर्थयात्रियों की संख्या छह करोड़ पार हुई।
-हिमाचल के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार यहां घरेलू और विदेशी पर्यटकों को मिलाकर 2022 में करीब 1.51 करोड़, 2023 में 1.60 करोड़ और 2024 में करीब 1.81 करोड़ पर्यटक पहुंचे।

आस्था का सैलाब, बढ़ती चुनौती

उत्तराखंड की चारधाम यात्रा में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। 2023 में चारधाम यात्रा में करीब 56 लाख श्रद्धालु पहुंचे थे। 2024 में यह संख्या करीब 48.1 लाख रही। 2025 में चारधाम में करीब 48.3 लाख श्रद्धालु पहुंचे। वहीं 2026 में 21 अगस्त तक ही चारधाम में 48,04,897 श्रद्धालु पहुंच चुके थे, जो 2025 की इसी अवधि से 5.22 लाख अधिक हैं। अमरनाथ यात्रा में 2024 में रिकॉर्ड 5.12 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचे थे, जो 12 वर्षों में सर्वाधिक संख्या थी। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 25 साल में पहली बार बदरीनाथ धाम में 17. 79 लाख श्रद्धालु पहुंचे हैं। पिछले पांच साल से बद्रीनाथ पहुंचने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या लगातार 17 लाख से अधिक बनी हुई है। यमुनोत्री, गंगोत्री के बाद अब बदरीनाथ धाम में दर्शन के लिए आए श्रद्धालुओं की संख्या ने इस बार नया रिकार्ड स्थापित किया है। जबकि धाम के कपाट बंद होने में अभी डेढ़ महीने से अधिक का वक्त बाकी है।

पर्यटकों की भीड़ से हिमालय को हो रहा नुकसान

अत्यधिक पर्यटन से कचरा, पानी, यातायात और आपदा का दबाव बढ़ रहा है। पहाड़ी कस्बों में वाहनों और होटलों की बढ़ती संख्या से वायु प्रदूषण, कचरा और सीवेज प्रबंधन की समस्या गंभीर हो रही है। इस दबाव से स्थानीय जलस्रोतों पर दबाव बढ़ रहा है, पीक सीजन में पानी की खपत बढ़ती है। अनियंत्रित विकास से ढलानों की स्थिरता प्रभावित हो रही है और भूस्खलन का जोखिम बढ़ रहा है। संकरी घाटियों और सीमित सड़क नेटवर्क पर ट्रैफिक जाम आपातकालीन सेवाओं को भी प्रभावित कर रहा है। उच्च हिमालयी क्षेत्र के घास के मैदानों(बुग्याल) और नाजुक ग्लेशियरों पर खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञ कैरीइंग कैपेसिटी के आंकलन पर जोर दे रहे हैं।

वैज्ञानिक लगातार उच्च हिमालयी क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या सीमित कर स्थानीय लोगों के आर्थिक लाभ बढ़ाने और पर्यटन आय को स्थानीय समुदाय, बुनियादी ढांचे तथा पारिस्थितिकी में लगाने की सिफारिश कर रहे हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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