Monday, September 14, 2026
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पर्यटन सचिव धिराज गर्ब्याल ने साल्ट रूट पर दिखाई रूचि। डीएफओ पौड़ी को लिखा पत्र

पुरिया सेवा ट्रस्ट निकला ढ़ाकर रूट के सर्वेक्षण पर

“ढाकर मार्ग—विरासत से पर्यटन तक”

अब दिखेंगे साल्ट रूट (ढ़ाकरी मार्ग) पर ट्रेकिंग के शौक़ीन पर्यटक 

(मनोज इष्टवाल)

यह जितना सुनने में अचम्भित करने वाली बात लगती है उतनी ही सुखद भी । क्योंकि 1887 से पूर्व सम्पूर्ण गढ़वाल में कोई सड़क मार्ग नहीं था। 1887 से पूर्व गढवाल में प्रवेश करने के यूँ तो तीन साल्ट रूट जिन्हें ढ़ाकरी मार्ग भी कहा जाता रहा है व जिनमें मात्र एक मार्ग गोरखा शासन काल तक राजबाट या राजमार्ग कहलाता था, वह चौकीघाटा (कण्वाश्रम) से मालिनी नदी के साथ उसके उद्गम की ओर बढ़ता हुआ चंड़ा पर्वत शिखर – पुराणकोट होता हुआ बायीं ओर डाडामंडी की ओर और दायीं ओर दुगड्डा की तरफ बढ़ता था। डाडामंडी- द्वारीखाल-बांघाट-नैथाणा-कांसखेत-अदवाणी- झंडीधार (पौड़ी)होकर श्रीनगर पहुँचता था जबकि अन्य महत्वपूर्ण मार्ग लालढांग होता हुआ और एक खोह्द्वार-दुगड्डा होकर श्रीनगर पहुँचता था।

इन्ही में से सबसे महत्वपूर्ण दुगड्डा मंडी तक पहुँचने वाला वह साल्ट रूट जो मूलत: ढ़ाकर मार्ग कहलाता था, वह 1887 से पूर्व खोहद्वार मंडी (वर्तमान में इसके अवशेष कोटद्वार सिद्धबलि मंदिर के पास दिख जायेंगे) से शुरू होता था। विकास खंड कल्जीखाल के हैड़ाखोली गाँव के लाट सूबेदार बलभद्र सिंह नेगी जोकि ब्रिटिश काल में एडीसी टू वायसराय इन इंडिया एंड इंग्लैंड रहे, उनके प्रयासों से गढ़वाल राइफल्स की स्थापना के बाद ही 1887 में पहले खोहद्वार (कोटद्वार) से दुगड्डा व लैंसीडाउन तक छकड़ा मार्ग बनाया गया, जिसका ठेका उस दौरान के जाने माने व्यापारी सूरजमाल को दिया गया। उसी दौरान कोटद्वार से ढ़ाकर मंडी लेकर मिश्र बंधू दुगड्डा शिफ्ट हुए। 1925-26 तक सतपुली व 1932-35  तक सड़क पौड़ी पहुंची, जिस में सबसे पहली मोटर लारी पौड़ी कमिश्नर काम्बोट की चली, जो मूलतः गढवाल राइफल्स की लारी थी। तदोपरान्त दुगड्डा के सेठ  मोतीराम व कोटद्वार के सेठ सूरजमल ने भी संयुक्त रूप से एक लारी वाहन (मोटर गाड़ी) खरीदी जिसे पौड़ी तक ले जाने की जिम्मेदारी कफोलस्यूं पट्टी के पयासू गाँव के मलासी पंडित ने निभाई।

यह जानकारी इसलिए साझा करना भी यहाँ जरुरी था ताकि हम समझ पायें कि उससे पूर्व सम्पूर्ण गढ़वाल में सड़क के नाम पर ढ़ाकरी मार्ग थे और उन्ही के द्वारा सम्पूर्ण गढ़वाल ही नहीं बल्कि नीति-माणा घाटी होकर तिब्बत तक नमक व गुड़ का व्यापार हुआ करता था। इस ढ़ाकरी मार्ग को अंग्रेज नमक व्यापार के कारण ही साल्ट रूट कहा करते थे।

अब लगभग 43 बर्ष बाद खुद को जड़ों से जोड़ने की पहल में एक विजन के रूप में श्री पुरिया नैथाणी सेवा ट्रस्ट के अध्यक्ष सुनील कुमार नैथानी के सचिव पर्यटन व  जिलाधिकारी स्वाति भदौरिया को लिखे पत्र पर सचिव पर्यटन धिराज गर्ब्याल ने संज्ञान लेकर डीएफओ पौड़ी को पत्र लिखकर पर्यटन के उद्देश्य से इस साल्ट रूट को विकसित को कार्यवाही हेतु कहा गया है।

इस सम्बन्ध में श्री पुरिया नैथानी सेवा ट्रस्ट के संस्थापक निर्मल नैथानी ने जानकारी देते हुए उत्कंठ मन से सचिव पर्यटन धिराज गर्ब्याल की कार्यशैली की प्रशंसा करते हुए कहा कि ऐसे अधिकारी बमुश्किल नसीब होते हैं जो धरातल पर काम करना व देखना पसंद करते हैं। उन्होंने धिराज गर्ब्याल को विजनरी व्यक्तित्व का धनी बताते हुए कहा कि उनके ही निर्देशन में उनकी टीम ने 10 सितम्बर 2026 की शाम, श्री पुरिया नैथानी सेवा ट्रस्ट, ग्राम नैथाना की टीम कांसखेत से ऊपर लगभग 5 किमी लंबे ऐतिहासिक ढाकर मार्ग के सर्वेक्षण पर निकली। टीम में कर्नल आनंद थपलियाल, कैप्टन नेवी देव नैथानी, ट्रस्ट के संरक्षक श्री राजेन्द्र प्रसाद नैथानी एवं श्री विजय नैथानी शामिल रहे। उन्होंने कहा यह उनका पहला अनुभव था जब वे इस ढ़ाकरी मार्ग पर लगभग 5 किमी. तक पैदल चले।

उन्होंने कहा कि चीड़ के वृक्षों से घिरा यह मार्ग, प्राकृतिक घास के बिछौनों, दो जलस्रोतों और पुरानी रिटेनिंग वॉल के साथ आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी कहता है। कुछ स्थानों पर रिटेनिंग वॉल की मरम्मत और मार्ग की सफाई आवश्यक है। हम वन एवं पर्यटन विभाग से आग्रह ही नहीं, पुरजोर अपील करते हैं कि इस ऐतिहासिक ढाकर मार्ग का संरक्षण एवं जीर्णोद्धार प्राथमिकता से किया जाए। यह केवल एक रास्ता नहीं, हमारी पहाड़ी विरासत और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यटन की संभावित धरोहर है।

निर्मल नैथानी ने कहा कि यदि समय रहते इसे बचाया और संवारा गया, तो यही पुराना ढाकर मार्ग भविष्य में एक शानदार हेरिटेज एवं नेचर ट्रैक बनकर क्षेत्र के पर्यटन और स्थानीय रोजगार को नई दिशा दे सकती है। आज हमें जिसकी सबसे ज्यादा आवश्यकता है वह विरासत को मिटने से पहले बचाने और अपनी पहाड़ियों की पुरानी पगडंडियों को भविष्य की नई राह बनाने की है ताकि साहसिक व वाइल्डलाइफ के शौक़ीन पर्यटकों व ट्रेकरों के लिए यह रूट दिव्य स्वप्न सा प्रतीत हो, इससे स्थानीय रोजगार के अवसर खुलेंगे व रिवर्स माइग्रेशन की सम्भावनाएं बढेंगी।

ज्ञात हो कि 1887 से पूर्व खोहद्वार मंडी से यह ढ़ाकरी मार्ग विभिन्न पड़ावों को पार करता हुआ गढवाल राज्य की राजधानी श्रीनगर पहुँचता था। खोहद्वार यानि कोटद्वार से श्रीनगर पहुँचने के लिए ढ़ाकरी कोटद्वार (खोहद्वार – दुगड्डा (07 मील)- डाडामंडी (07 मील)-द्यूसा-तोली-राजबाट -लंगूरी – कलोडी – ग्वीन -बकरोटी – द्वारीखाल (06 मील)- गैंठीपाखा -थानखाल – संजीणा- धौड़धार- कठुड़ लगा कंरोटा – सीला – बांघाट (06 मील) – बूँगा -कलेथ -बनेख -नैथाणा (3.50 मील) – घंडियाल -बांजखाल – कांसखेत (02 मील) – ब्यडवा -अदवाणी (04 मील) – गंगोट्यूँ (03 मील)- ढ़िबरबासा – टेका (02 मील) – झंडीधार पौड़ी (03 मील) – पौड़ी गाँव (1.50 मील) – कालिंका ढांडरी – खण्डाह  होकर श्रीनगर (गढ़वाल की राजधानी 06 मील) पहुँचता है , जहाँ से सम्पूर्ण गढ़वाल के  साथ चारों धाम के यात्रा मार्ग व नीति-माणा होकर बाड़ाहोती होकर तिब्बत पहुँचता।

बहरहाल ब्रिटिश काल में बने बांघाट नयार नदी के झूला पुल जोकि लंगूर व मनियारस्यूं पट्टी को जोड़ता था, पर 1979 में लोहे के पुल का निर्माण होने के पश्चात् 1983 तक बांघाट से कांसखेत अदवाणी होता हुआ सड़क बनाया गया और इस पर सुचारू रूप से गाड़ियाँ चलने लगी। उससे पूर्व इस क्षेत्र के निवासी ढ़ाकरी मार्ग से पैदल ही यात्रा किया करते थे। हम यह कह सकते हैं कि श्री पुरिया नैथानी सेवा ट्रस्ट की टीम ने तब से लेकर अब तक के 43 बर्षों में इस साल्ट रूट (ढ़ाकरी मार्ग) पर 05 किमी. पैदल यात्रा कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि अगर इसे पर्यटन से जोड़कर देखा जाएगा तो यह साहसिक व वाइल्ड लाइफ पर्यटन के लिए आय का बड़ा स्रोत हो सकता है।

 

 

 

 

 

 

 

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