Tuesday, March 5, 2024
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कैलाखुरी चितौड़गढ़ के राणा राजपूतों के रणभूत पहुंचे टिहरी गढवाल के ठेला गाँव

* ठेला गांव के सात भाई व बहन सोनादेई के वे रणभूत
(मनोज इष्टवाल)

सूनादे या सोनादेई की बात आते ही सोच एकदम जौनसार बावर के सुप्रसिद्ध लोकगायक स्व. जगत राम वर्मा द्वारा गाये गए उस गीत की याद हो आई जो गीत कम और हारुल ज्यादा लगती है। विचार कौंधा और याद आ गए चितौड़गढ़ के वे सात भाई राणा राजपूत जिनके परिवार का अंत बेहद दुर्दांत तरीके से हुआ और कैलाखुरी का छोटा सा साम्राज्य तहस-नहस हो गया। यह और आश्चर्यजनक है कि टिहरी गढवाल के नैलचामी घाटी में लगभग 600 बर्ष पूर्व चितौड़गढ़ राजस्थान के कैलाखुरी गढ़ के राणा राजपूतों के रणभूत आज भी नाचा करते हैं।

दुविधा यह कि कैलाखुरी गढ़ राजस्थान के इन राणा राजपूत वंशजों का कैलाखुरी/कैलाकुरी जाति से कोई लेना देना नहीं है जो चमोली व रूद्रप्रयाग के कई गाँव में बसे हुए हैं और तो और गढवाल में कैलाखुर गाँव भी चमोली गढवाल में है लेकिन यहाँ भी शायद राणा राजपूत नहीं हैं।

चलिए इन रणभूतों का इतिहास खंगालने टिहरी गढवाल की नेलचामी घाटी के गाँव ठेला पहुँचते हैं। टिहरी झीएल से ल्लाग्भ्ग 22 किमी दूर दो नैलचामी घाटी में दो छोटी नदियों (गाड) के संगम पर स्थित ठेला गाँव का इतिहास बड़ा गौरवमयी है। कई सौ सदी पूर्व इस गाँव में ठेल्याल जाति के मूल लोग निवास करते थे जिन्हें हम यहाँ की जनजाति के नाम से पुकार सकते हैं। यह गाँव बाँझ-बुरांस के जंगलों के बीच एक खूबसूरत लोकेशन में अवस्थित है, जहाँ सरसब्ज खेती आपका मन मोह लेती है। ठेला गाँव में लगभग 200 परिवार निवास करते हैं जिनमें राणा राजपूतों के अलावा, बडोनी, भंडारी, बिष्ट, कुमैय्या रावत व शिल्पकार जातियां प्रमुख हैं।

डॉ बीरेंद्बर सिंह बर्तात्तेवाल अपनी पुस्तक “गढवाली गाथाओं में लोक और देवता” में लिखते हैं कि इस गांव का मूल पुरुष राणा जाति का ही था, जो राजस्थान से आकर यहां बसा था। भूप सिंह राणा नामक वह युवक चित्तौड़गढ़ राज्य के अंतर्गत या निकट की कैलाखुरी रियासत के शासक राणा उदय सिंह का पुत्र था।

लगभग छह सौ साल पहले बसे ठेला गांव में पहला रणभूत भूप सिंह राणा पर ही अवतरित हुआ था। तब से यहां रणभूत नृत्य की परंपरा निरंतर चली आ रही है। पहले यहां दो वर्ष के अंतराल पर प्रत्येक चौथे वर्ष रणभूत नृत्य होता था, लेकिन
पलायन आदि कारणों से यह अंतराल बढ़ता गया, परन्तु रणभूत नचाने की परंपरा अभी भी यथावत है। ये जागर 10 दिन तक चलते हैं। इनमें राणा सोहन सिंह, विजय सिंह, मोहन सिंह, खुशाल सिंह, विशाल सिंह, रूप सिंह, भूप सिंह (सातों सगे भाई) तथा बहन सोनादेई (इन सात भाइयों की बहन) मुख्य रणभूत होते हैं। इनके अतिरिक्त इन भाई-बहनों की मां (जिया ब्वे) दो बहुएं (चौहान्या और पटुल्या राणी), छह महीने का शिशु (बाळ), नर्तकी कंचनी, दीवान और सती माता भी जागर में अवतरित होती है। जागरों में राणाओं की कुलदेवी ज्वाला एवं नगेला देवता भी अवतरित होता है। ठेला के रणभूत नृत्य में राजपूतों की आन-बान-शान की रक्षा की प्रतिबद्धता के साथ ही मुगल शासन (अकबर) की कठोर निंदा के दर्शन होते हैं। अपनी और अपने परिवार को मृत्यु के लिए मुगल शासन को उत्तरदायी ठहराते हुए विजय बादशाह को श्राप देता है। बीरत्व के साथ ही ऐतिहासिकता प्रदर्शित करते इस जागर में सती जैसी प्राचीन भारतीय प्रथाओं का भी उ‌द्घाटन है।
गाँव में जो ज्वाला माता है उसके आगमन की भी अलग कहानी है जिसे हम क़िस्तवार आपके सम्मुख रखेंगे। इस मंदिर में लगभग 600 बर्ष पूर्व की वह तलवार भी है जिसे लेकर भूप सिंह राणा चितौड़गढ़ राजस्थान कैलाकुरी गढ़ से अपने छ: भाई, एक 06 बर्षीय भतीजे, बहन सोनादेई व परिजन की अस्थियाँ लेकर हरिद्वार आया था व बरणया गाँव के बडोनी पुरोहित के साथ आकर ठेला गाँव आ बसा व यहीं आकर उसने बाद में ठेला गाँव की ठेल्याल जाति की कन्या से विवाह रचाया।
सेवानिवृत्त एक्जीक्यूटिव इंजीनियर पुष्कर सिंह राणा (राणा वंश ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और रणभूत मंडाण : ठेला नैलचामी) अपनी पुस्तक में  लिखते हैं कि 15वीं शताब्दी में राजस्थान के चितौड़गढ़ राज्य के अंतर्गत या इसके आसपास कैलाखुरी नामक एक छोटी रियासत थी। राणा उदय सिंह इसके शासक थे। इनकी मृत्यु के पश्चात यह दायित्व उदय सिंह के बड़े पुत्र सोहन सिंह राणा ने संभाला। सोहन सिंह से छोटे विजय सिंह, मोहन सिंह, खुशाल सिंह, बिशाल सिंह, रूप सिंह और भूप सिंह थे। इन सात भाइयों की बहन सोनदेई/सोनादेई  थी। सोहन सिंह और विजय सिंह विवाहित थे। सोहन सिंह का एक शिशु था। इन दो भाइयों की पत्नियां चौहान्या और पटुल्या रानियां थीं और इनका दीवान गजे सिंह था।
उन दिनों भारत वर्ष पर मुगल शासक अकबर अपना संपूर्ण आधिपत्य करने के उद्देश्य से रियासतों को अपने अधीन कर रहा था। उसने कूटनीति से कई हिंदू रियासतों में रिश्तेदारी कर उन्हें अपने अधीन कर लिया था और जिस शासक ने अधीनता स्वीकार नहीं की, उस पर मुगल शासक ने आक्रमण कर अपने अधीन कर लिया। चित्तौगड़गढ़ के शासक महाराणा प्रताप मुगल शासक की अधीनता स्वीकार न करते हुए मातृभूमि की रक्षा के निमित्त भटकते रहे। उन्होंने प्रण लिया कि जब तक चित्तौड़गढ़ को स्वतंत्र नहीं करा लूं, बिस्तर पर नहीं सोऊंगा, सोने-चांदी के बर्तनों पर भोजन नहीं करूंगा और एक स्थान पर नहीं टिकूंगा।
कैलाखुरी रियासत को भी अपने अधीन करने के उद्देश्य से अकबर ने कैलाखुरी के शासक सोहन सिंह को संदेश भिजवाया कि अधीनता स्वीकार न करने की स्थिति में लड़ाई के लिए तैयार रहें। सोहन सिह ने एकतरफा निर्णय न लेकर अपने सभी भाइयों एवं दरबारियों से इस पर विचार-विमर्श किया। यहां प्रश्न राजपूतों को परंपरा, मर्यादा, आत्मसम्मान, प्रतिष्ठा एवं स्वाभिमान का था, इसलिए निर्णय हुआ कि मर-मिट जाएंगे, लेकिन हम मुगल शासक की अधीनता स्वीकार नहीं करेंगे। मुगल शासक के संदेश का यही प्रत्युत्तर भेज दिया गया। इसके परिणाम को देख राणा बंधु पहले ही लड़ाई के लिए तैयार हो गए। रण में जाने के लिए  माँ से अंतिम तिलक मांग सभी ने मोर्चा संभाल लिया। महल के सभी फाटक बंद कर दिए गए। मुगल सेना और कैलाखुरी रियासत का घोर संग्राम छिड़ गया। राणाओं की कुल देवी ज्वाला देवी थी, जो इन्हें मुगलों की भावी रणनीति की सूचना उपलब्ध करा देती थी, इसलिए राणा सेना पराजित नहीं हो पाती थी। मुगल इस बात पर आश्चर्य में पड़ गए कि हमारी इतनी बड़ी सेना कैलाखुरी के इतने मुट्ठी भर सैनिकों को आखिर परास्त क्यों नहीं कर पा रहे हैं। मुगलों को गुप्तचरों से पता चला कि राणाओं की कुलदेवी उनकी सहायता कर रही है। इसकी काट खोजते हुए मुगलों ने ज्वाला देवी मंदिर में गाय का वध करवा दिया। मंदिर अपवित्र हो गया। परिणामस्वरूप ज्वाला देवी ने सूचना (सहायता) देनी बंद कर दी।
अब कैलाखुरी पर मुगल सेना भारी पड़ गई। राणाओं के बहुत सैनिक मारे गए। लड़ते-लड़ते जब राणाओं की सेना महल के फाटक तक पहुंची तो पहरेदार ने सभी राणा भाइयों को गुप्त दरवाजे से अंदर कर दिया। उनकी बहन सोनदेई बाहर ही रह गई। मुगलों के अत्याचार और अपने परिवार पर कहर टूटने की आशंका में सोनदेई ज्वाला देवी के मंदिर में गई और देवी के कटार से अपने पेट पर प्रहार कर दिया। जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
इसकी सूचना महल के अंदर पहुंच गई, लेकिन शोक, आक्रोश और भय के मिश्रित इस वातावरण में राणा बंधु अपनी बहन के पार्थिव शरीर के दर्शन न करने को विवश थे। राणा बंधुओं में विजय सिंह बड़े आक्रोश वाले थे उन पर राजपूती जूनून सिर पर सवार हो गया। वह यह कल्पना कर कि मुगल हमें अधीन कर तरह-तरह के अत्याचार करेंगे, हमारे वंश की प्रतिष्ठा भी चली जाएगी, अतः क्यों न अपने ही हाथों अपनी मृत्यु का वरण किया जाए। विजय सिंह ने तलवार उठाई और ज्वाला देवी के जयघोष के साथ एक-एक कर अपने पांच भाइयों को मार डाला। सबसे छोटा भाई भूप सिंह ननिहाल गया हुआ था, इसलिए वह जीवित रह गया। विजय सिंह ने अपनी मां, दो बहुओं को भी मृत्यु के घाट उतार दिया। सोहन सिंह के छह माह के शिशु को पत्थर पर पटककर मार दिया। नृत्यांगना कंचना, दीवान गजे सिंह को भी विजय सिंह ने नहीं छोड़ा और जो भी दरबारी, कर्मचारी मिला, सभी को मार डाला।
अंत में खून से एक दीवार पर भूप सिंह के लिए संदेश लिख दिया-“कैलाखुरी अब मुगलों के अधीन हो चुका है, तुम यहां मत रहना, इनकी अधीनता स्वीकार मत करना।” सबका संहार करने के पश्चात विजय सिंह ने अपने पेट में तलवार से प्रहार कर अपनी भी जीवन लीला समाप्त कर दी।” 
(शेष अगले अंक में )
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