Saturday, May 18, 2024
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बेहद खतरनाक हैं लिवाड़ी की चियाली मात्रियाँ (परियां)

उत्तराखण्ड में ऐड़ी, आँछरियाँ, बणदयो, बणकियां, भराड़ी, अहेड़ी, डागनियाँ, रक्तपिचासिनियाँ इत्यादि नामों से जाना जाता है

 

  • उत्तराखण्ड में ऐड़ी, आँछरियाँ, बणदयो, बणकियां, भराड़ी, अहेड़ी, डागनियाँ, रक्तपिचासिनियाँ इत्यादि नामों से जाना जाता है

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 27-28 अक्टूबर 2015)

1- लिवाड़ी गांव पर्वत क्षेत्र स्थित चियाली/जीवनागढ़ की मात्रियों, परियों का मंदिर, 2- अक्टूबर 2015 में लिवाड़ी गांव 3-लिवाड़ी गांव स्थित मेला।

लगातार परी लोक की गाथाओं को आपके सम्मुख लाने का यह जुनून भले ही कुछ मित्रों के लिए हास्यास्पद हो लेकिन जो प्रकृति को बेहद खरीद से महसूस करते हैं उनके लिए प्रकृति प्रदत्त ये सभी उपादान सृष्टि निर्माताओं में सम्मिलित हैं। परियां जिन्हें उत्तराखण्ड में ऐड़ी, आँछरियाँ, बणदयो, बणकियां, भराड़ी, अहेड़ी, डागनियाँ, रक्तपिचासिनियाँ इत्यादि नामों से जाना जाता है, का एक अद्भुत संसार आपको 7000 फिट से लेकर हिमालयी ऊंचाइयों की तमाम धारों, बुग्यालों व गुफाओं में सुनने देखने को मिल जाएगा। इन पर लिखने के लिए उनके हिसाब से उन पर शोध करना और भी अनूठा व कठिन कार्य है। मेरे मित्र इन्ही लेखों को पढ़कर मुझे आँछरी एक्सपर्ट कहकर ही नहीं चिढ़ाते बल्कि कहते हैं अक्सर यह कहकर अपना मनोरंजन करते हैं कि किसी दिन हमें अचानक पता चलेगा कि मनोज इष्टवाल को आँछरियाँ हर ले गयी। मैं उनके इस हास परिहास में मुस्करा भर देता हूँ कि चलो इस बहाने ही सही मैं इन सभी का केंद्र बिंदु तो बना रहता हूँ।

पर्वत क्षेत्र स्थित सुपिन नदी घाटी का बिहंगम दृश्य।

परीलोक की सैर हो या उच्च हिमालयी क्षेत्रों की सैर..! वहां का घुमन्तु जीवन जीने के लिए आपको अपने अनुकूल नहीं बल्कि प्रकृति के नियमों व अनुशासन के आधार पर जीना होगा तभी आप सम्भवतः उस अलौकिक लोक में जीते जी स्वर्ग की अनुभूति कर सकते हैं। आप वहां के बुग्यालों में टैंट लगाइए आप वहां की गुफाओं के दर्शन कीजिये, आप वहां के हिमशिखरों तालों का आनन्द लीजिये लेकिन अपने खान पान पर नियंत्रण रखकर ही आप इन अनुभवों का लाभ लीजिये। प्रकृति के इस लोक में आपके साथ अदृश्य शक्तियां हमेशा आपकी हम कदम बनकर आगे बढ़ती हैं इसलिए उन्हें प्रणाम कीजिये कि वह आपकी गलतियों को माफ कर आपका उनके क्षेत्र में पूरा ख्याल रखें जैसे वह 6 माह उन भेड़ बकरियों व भेडालों का ख्याल रखते हैं जो इन्हीं के साथ इस लोक में निवास करते हैं।

लिवाड़ी गांव अपनी तीन ऋतुओं में।

यूँ तो हिमालयी तालों, बुग्यालों, गुफाओं, हिमशिखरों की सैर करते हुए मैंने अपनी जिंदगी के लगभग 20 बसन्त गुजार दिये हैं लेकिन भराड़सर ताल जहां बणदेवियों में भराड़ियों आ अद्भुत संसार है की अनुभूतियां बेहद अलग हैं। यहां एक बहुत ही खूबसूरत युवक युवती के जोड़े ने मेरा मार्गदर्शन किया था बाद में पता चला वह हर रास्ता भूल जाने वाले को राह दिखाते हैं। लेकिन यह पता नहीं चला कि वे हैं कौन? 2017 में हिमालय दिग्दर्शन यात्रा पर भराड़सर गए हिमालय दिग्दर्शन टीम के दिग्दर्शक ठाकुर रतन सिंह असवाल व अजय कुकरेती ने भी अपनी यात्रा के दौरान इनसे मुलाकात व रास्ता दिखाने की जब चर्चा की थी तब मैं चौंक ग़या था।

लिवाड़ी गांव उत्तरकाशी जनपद के पर्वत क्षेत्र का हिमालयी गांव माना जाता है जिसके लिए आपको जखोल से पैदल जाना होता है लेकिन अब रेग्चा फिताड़ी तक सड़क निर्माण हो गया है। यों तो लिवाड़ी तक सड़क निर्माण का कार्य हो गया है लेकिन सूपिन नदी पर बनने वाले पुल का कार्य पर अब सतलुज जल विद्युत परियोजना रोड़ा अटकाने का काम कर रही है, ऐसा सुनने को मिल रहा है।

सामाजिक कार्यकर्ता लिवाड़ी राय सिंह सपरिवार।

बहरहाल यहां इन सभी मुद्दों को गौंण बनाकर हम लिवाड़ी की उन बनदेवियों परियों पर बात करते हैं जिनका मंदिर लिवाड़ी गांव से 7 किमी. ऊपर देवदार के जंगल में है। यहां के सामाजिक कार्यकर्ता राय सिंह रावत इस परीलोक के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि स्थानीय लोग इन्हें चियाली देवियों के नाम से जानते हैं, यों तो 12 महीने यह मंदिर दर्शनार्थ खुला रहता है लेकिन 28 तारीख जुलाई को हर बर्ष यहाँ बहुत बड़ा मेंला लगता है जिसमें पर्वत क्षेत्र के लगभग 2-3 हजार लोग इस मेले में शामिल होते हैं।

राय सिंह रावत बताते हैं कि इन्हें क्षेत्रीय जनमानस न्याय की देवियों के नाम से भी जानते हैं। इस क्षेत्र के लोग अपने साथ हुए अन्याय के लिए इन देवियों के पास न्याय मांगने आते हैं। जिन्हें मात्र 1माह में ही न्याय दिखाई देता है। इच्छा पूर्ण होने पर यहां लोग परियों को बलि के रूप में बकरा देते हैं। साथ ही सुहागनें यहां परियों के श्रृंगार के लिए चूड़ियां, बिंदी, सिंदूर, चुनरी इत्यादि चढ़ाती हैं।

यहाँ क्षेत्रीय देवता सोमेश्वर महाराज का भी अपना मन्दिर स्थापित है। यहां दो मातृकाओं/परियों के मंदिर हैं आगे वाले मन्दिर को चियाली देवी मंदिर व पीछे वाले को जीवनागढ मातृकाओं का मंदिर कहा जाता है। राय सिंह रावत बताते हैं कि लिवाडी की कोई भी लडकी कहीं भी शादी करे साल में एक बार यहाँ उन्हें इन बनदेवियों दर्शन करने जरूर आना पडता है। पुत्र प्राप्ति के लिए लोग बहुत दूर-दूर से यहाँ पहुँचते है लोगों का मानना है कि यहां आकर सभी की मन्नत पूर्ण होती हैं। मेरा आपसे भी अनुरोध है कि जब भी आप भराड़सर, देवक्यार सहित पर्वत क्षेत्र के बुग्यालों का भ्रमण करें तब सभी दिशाओं को नमन कर यहां के हिमालयी बुग्यालों में अवस्थित सभी देवी देवताओं को हृदय से नमन जरूर करें ताकि यह क्षेत्र आपको सुगमता से आपका प्रकृति व परीलोक में यात्रा करवाये। इस क्षेत्र की परियां मातृकाओं में बीणासु, कंडारा, सरुका, चियाली, जीवनागढ़भृंग तथा सोमेश्वर देवता का हमें स्मरण जरूर करना चाहिए तब आप अपनी मंजिल तक बड़े आराम से बिना कष्टों के पहुँच जाते हैं। खानपान पर नियन्त्रण जरूर रखें, वर्ना प्रकृति विरुद्ध कार्यों को ये बनदेवियां बर्दास्त नहीं करती हैं व बेमौसम बरसात या बादलों से आपको घेर लेती हैं। यह पहला संकेत उनकी ओर से होता है। अगर इसके बाद भी आप अनुशासन कायम नहीं रखते हैं तो ये आपके लिए मुसीबत साबित हो सकती हैं। अतः अनुरोध है कि आप यहां के क्षेत्रीय ग्रामीणों के साथ ही इस क्षेत्र का लुत्फ उठाएं ताकि आपकी यात्रा निष्कंटक रहे। लिवाड़ी तक पहुंचने के लिए अगर आप पुराने मार्ग से जाना चाहें तब आपको मोरी, नैटवाड़ से होकर कोटगांव से सांकरी मार्ग छोड़कर बांयें हाथ पांव होकर जखोल से हरिपुर रेग्चा जाना होगा। यहां से पैदल रेक्चा ग्राम सभा से होते हुए 2 किमी रालासह तक सीधा व पगडंडी रास्ता व वहां से खड़ी चढाई 3.5 किमी.की दूरी तय करने के बाद लिवाडी गाँव पहुँचते हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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