घाम-पाणी स्यालौ ब्यो। स्यालैकि बोई ढुल्की बजौ…
(मनोज इष्टवाल)
अचानक सोशल साइट पर इस तरह के सतरंगी धनुष को देखकर बचपन याद आ गया। दरअसल वह हमारे बचपन के सुनहरे दिन हुआ करते थे। इस सतरंगी धनुष को हम इन्द्र धनुष बोला करते थे। इसकी अवधारणा थी कि अगर यह धनुष गाड़ पड़ेगा तो नदी सूखेगी, बारिश बंद होगी और धार पड़ेगा तो बर्षा होगी।
यह धनुष अगर बारिश बंद पड़ने के बाद पड़ा तब ज्यादा बिशेष उत्सुकता का बिषय नहीं होता था लेकिन अगर घाम (धूप) भी हो और हल्की-हल्की बारीक बूंदों की बारिश हो रही हो और अचानक यह इन्द्र धनुष पड़ जाए तो हम गाय बछड़े, बैल इत्यादि चुगाने अपने डांडे बुग्याल जा रखें हों। तो अपने-अपने अपने टल्ले लगे छाते, पतले प्लास्टिक के बरसाती या बोरे से बनी बरसाती एकदम सिर से उतार फेंकते थे। व दोनों हाथ सामान्तर दिशा में फैलाकर झूमते हुए गाने एक सुर में बोलते -“घाम-पाणी स्यालौ ब्यो। स्यालैकि बोई ढुल्की बजौ…..। ”
तब यह क्षण कौतुहल व मनोरंजन का होता था। लेकिन हमेशा मन में यह जिज्ञासा होती कि आखिर हम ऐसा क्यों बोलते हैं। क्या सचमुच ऐसे मौसम में सियार की शादी होती है? क्या सचमुच ऐसे मौसम में सियार की माँ उसकी विवाह की ख़ुशी में ढ़ोलक बजाती है?
इनका जबाब आखिर मुझे 12 जुलाई 1982 में तब मिला था। जब मैं सिंगन (प्राकृतिक मशरूम)ढूंढने अल-सुबह छोया-खोली नामक अपनी सरहद के पार पयासू की सरहद में जा पहुँचा था। सिंगन कब किस घाटी या सारी में किस दिन निकलेगी यह दिन तय होता था। यहाँ हर साल 12 जुलाई को ही सिंगन निकलती थी।
पिछली रात खूब जमकर बारिश हुई थी व खूब बिजली कड़की थी। उम्मीद के अनुरूप आज डांडा में खूब घनाफोड़ भी निकले थे। मैंने पहले कुत्ता खाल के पास खूब थैला भरकर घनाफोड़ निकाले।
घनाफोड़ :-
लगभग क्रिकेट की बॉल से थोड़ा छोटा लेकिन वैसे ही गोल मशरूम होता है ज़ो बरसात के बाद बिजली कौधने से अक्सर कम बुग्याल बंजर घास युक्त जमीन से फुटकर बाहर निकलते हैं। ये बहुत स्वादिष्ट मशरूम होती है।
उस दिन भी बारिश की रिमझिम थी और कोहरा पूरे डांडे के पहाड़ों को घेरे हुए था। समय वही सुबह सात – साढ़े सात बजे का रहा होगा। क्योंकि सबको सिंगन यानि प्राकृतिक मशरूम की घाटियाँ व सारियाँ अक्सर पता रहती थी इसलिए सबका यही लक्ष्य होता था कि वह पहले चुनकर मशरूम ले आये। मेरी किस्मत आज अच्छी थी। आज खूब घनाफोड़ भी मिले व छोया-खोली के पाणी के सोते वाले खेत में जड़िया सिंगन भी। धीरे-धीरे कोहरा छंटा तो धूप के साथ हल्की बूँदा-बांदी के साथ इन्द्र धनुष पाली गाँव की धार पार से ठीक नानसू गाँव के नीचे खरगढ़ नदी तक जा फैला। यानि बचपन का वही खेला –“घाम-पाणी स्यालौ ब्यो। स्यालैकि बोई ढुल्की बजौ…..। ”
मैंने छोया-खोली पयासू की दिवार जैसे ही फांदी छाता ओढे विक्रम भाई को देखा तो वह बीड़ी का कस लगाए दिवार की ओट में बैठा, ओंठो पर अंगुली रख मुझे चुप रहने का इशारा कर मुझे चुपचाप नीचे बैठने को बोला। पहले तो मैं डर गया लेकिन फिर उसकी नजर का पीछा किया तो अचंभित हो गया। एक सियार ऊँचे स्थान पर खड़ा था जबकि लगभग दर्जन भर से ज्यादा सियार नीचे तप्पड़ में इकट्ठा होकर उसकी ओर मुंह करके चूतड़ों को टिकाये पिछले पैरों के बल बैठे हुए थे।
यह सब क्यों हो रहा है, यह समझना कठिन था। अचानक ऊँचे स्थान पर खड़े सियार के पीछे से दो छोटे-छोटे सियार उभरे और बड़े सियार की अगल-बगल में जा बैठे। सियार ने मुंह ऊपर कर जोर से रोना शुरू किया। यह उसका रोना था या खुश होना, समझ नहीं सका। उसके सुर ले खत्म होते ही सामूहिक स्वर में सभी सियारों ने स्वर मिलाया। यह नजारा अद्भुत था। फिर सब चुप हुए और वे दोनों बच्चे सियार उतर कर नीचे तप्पड़ (मैदान) में जा पहुँचे। मैदान से एक सियारन या सियार उनकी अगुवाई को आगे आई, उसने दोनों के मुंह सूँघे और फिर एक अजीब से स्वर में मुंह उभर कर अपनी ख़ुशी जाहिर की. यह स्वर सियारों के सामूहिक स्वर की तरह दिल दहलाने वाला नहीं था बल्कि बेहद लोकप्रिय लगा।
फिर बारी-बारी से सब सियारों ने उसका अनुशरण किया। जैसे हम पांडव नृत्य के लिए गोल घेरा बनाते हैं, वैसे ही सियारों ने भी गोल घेरा बनाया और उन दोनों को घेरे के बीच में रखकर ऊँचे स्वर में चिल्लाना शुरू कर दिया। फिर घोल घेरे में ठीक उसी तरह से नाचना शुरू कर दिया जैसे अक्सर कुत्ते भी नाचा करते हैं। यह देखना जितना अद्भुत था, मेरे लिए उस दौर में डरावना भी था। कुछ देर बाद वह नीचे उतरे और विक्रम भाई मुझसे बोले – देख भुला, आज सियारों की शादी थी। इसलिए ज़ो सिंगन तू लाया है उसे आधी – आधी कर…वरना जाने क्या होगा। क्योंकि आधी उनके विवाह के लिए छोड़नी होगी। मुझे तब समझ ही कितनी थी। विक्रम यानि बीरु भाई…बोले और हम न करें। मैंने आधी से जरा सा कम सिंगन वहीं ज़मीन पर रखी, तो विक्रम भाई बोले – अब पीछे मत देखना। मुट्ठी पर थूक लगाना और सीधे घर जाना। मैं तो अभी अपने खाडू को ढूंढने जा रहा हूँ। कल से घर नहीं आया। और हाँ… यह बात किसी को मत बताना कि तूने सियारों की शादी देखी, वरना तुझ पर दोष चढ़ जाएगा। यहाँ से मुंह के अंदर बोलते जाना – -“घाम-पाणी स्यालौ ब्यो। स्यालैकि बोई ढुल्की बजौ…..। ”
सच में तब कितना अबोध था वह लड़कपन क्योंकि खाडू कहीं नहीं खोया था बल्कि विक्रम भाई सियारों की शादी में बिन मेहनत की मेरी आधी मशरूम घर ले गया।

