(मनोज इष्टवाल)
सच में जब आप कलयुग में द्वापर के दृश्य देखते हैं तो लगता ही नहीं है कि यह सब कलयुग में ही घटता है, क्योंकि द्वापर में हुई महाभारत भी ठेठ वैसी ही है जैसे आज के घोर कलयुग में …! बस अंतर तब इतना था कि बुजुर्ग मान-मर्यादाओं से राजधर्म का पालन कर रहे थे और दृष्टराष्ट्र अंधे होकर . वर्तमान में अगर वे दृश्य जो दृश्य पटल पर उभरे थे, होते तो जाने कितने क़त्ल उसी समय होते क्योंकि तब इसकी परिणति महाभारत नहीं होती अपितु तत्काल इसे लोकलाज की बलिवेदी बना दिया जाता न कि महाभारत के शकुनी की कूटनीति .
विगत 08 जून को राजधानी देहरादून के संस्कृति विभाग के ऑडियोटोरियम में उत्सव ग्रुप व आवाज सुनो पहाड़ों की, के तत्वावधान में लेखिका श्रीमती कांता घिल्डियाल के नाटक “द्रौपदी की लाज” का नृत्य-नाट्य मंचन हुआ. लगभग सवा से लेकर डेढ़ घंटे की अवधि के इस नाट्य मंचन ने अंतिम समय तक दर्शकों को बांधे रखा. यह नाटक यकीनन अतीत के प्रश्न वर्तमान में मंच पर रखकर कई अन्य प्रश्न खड़े कर गया.
लगभग 30 लोगों के झुंड ने इस नाटक की ख़ूबसूरती बनाए रखने के लिए वह सब किया जिसकी दर्शकों को उम्मीद थी क्योंकि “द्रौपदी की लाज” यहाँ उत्सव ग्रुप के सल्ली डॉ राकेश भट्ट के हाथ में थी. उन्होंने अपने निर्देशन पक्ष न सिर्फ मंच अपितु मंच के पार्श्व में भी प्लेबैक का शानदार मजमा लगाए रखा. भले ही शुरूआती दौर में कानफोडू संगीत ने कुछ समय तक विचलित किये रखा. और तो और अमेरिका से आये सच्चिदानंद सेमवाल जी की बेटी जो मेरी बगल में बैठी थी, वह बहुत देर तक कान दबाए बैठी रही लेकिन जब असहनीय हो गया तो उसे सेमवाल जी को कहना पड़ा और उन्हें फ़ौरन उठकर जाना पड़ा. उनके जाने के बाद भी जब संगीत पक्ष बैलेंस नहीं हुआ तो मुझे पहल करनी पड़ी. तत्काल संगीत सही हुआ और फिर सब कुछ नार्मल सा होता रहा लेकिन मुझे पीड़ा यह हुई कि यह काम मुझे बहुत पहले कर देना चाहिए था ताकि वह बिटिया इस पूरे नाटक का आनन्द ले पाती.
यह तकनीकी कमी इसलिए भी रही कि निर्देशक पार्श्व से गायन कर रहे थे, हो सकता है उनके ज्यादात्तर नाटक खुले मंच या बड़े हाल में होते रहे हों. यह कमी उनकी नहीं अपितु संगीत संयोजन कर रही टीम की रही.
बहुत सधी हुई स्क्रिप्ट के साथ मंचन ने दृश्य पटल पर सभी को बांधें रखा. कुछ पात्रों ने तो वास्तव में झंडे गाड़ दिए जिनमें द्रयोधन, शकुनी, द्रौपदी, विधुर, भीष्म, धृतराष्ट्र, दुशासन, विकर्ण के रूप में आयुष रावत इत्यादि शामिल थे. सच कहूँ तो द्रयोधन का अभिनय करने वाले विपुल वर्मा के आगे पांडव पक्ष का अभिनय दूर तक टिकता नहीं दिखाई दिया. लगा कि उनके कंधे पासा फेंकने से पहले ही झुके हुए थे. अर्जुन का अभिनय कर रहे दीपक डिमरी के पैरों में चपलता थी, वह संगीत व बोलों के साथ धनुष का ठीक-ठाक अनुसन्धान कर रहे थे लेकिन चेहरे पर सपाटता व लिप्सिंग न होने के कारण जो उनसे उम्मीद की जा सकती थी उसकी वह क्षतिपूर्ती नहीं कर पाए. वही हाल भीम का अभिनय कर रहे वी के डबराल का भी था, उनके होंठ भी एकदम खामोश रहे . उनके मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे. हाँ युधिष्टर का अभिनय कर रहे अभिनेता ने अपने अभिनय के साथ काफी हद तक इन्साफ किया लेकिन उनके कंधे झूके रहने व चेहरा दर्शकों की अपेक्षा मंच की ओर ज्यादा रहने के कारण वह स्वरुप नहीं आ पाया जो होना चाहिए था. सच कहूँ तो विदुर के अभिनय में सुनील मैखुरी, शकुनी के अभिनय में शीशपाल, दुशासन के रूप में सुशील पुरोहित, व धृतराष्ट्र के रूप में राजेश भारद्वाज का बेजोड़ अभिनय रहा.
गांधारी -रजनी, कृष्ण-रुद्राक्ष मैखुरी, नकुल-प्रदीप सेमवाल, सहदेव- मनीष गुसाईं, नृत्य-दीप्ति व तानिया चौहान के पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं था, लेकिन वे जितनी देर मंच पर रहे दर्शकों को आकर्षित करते रहे.
उम्र के लिहाज को मेकअप के आवरण में ढकाती द्रौपदी का अभिनय कर रही सोनिया गैरोला व भीष्म का अभिनय कर रहे अरुण ठाकुर ने अपने डायलॉग व अभिनय से इतना प्रभावित किया कि कोमल हृदयी जनमानस के आँखों में आंसू उमड़ पड़े. सोनिया के अभिनय में ख़ास बात यह रही कि उनकी आँखों से बहते आंसू इस बात के गवाह थे कि उन्होंने अपने अभिनय को कितने मनोयोग से निभाया है. वहीँ भीष्म का किरदार निभा रहे अरुण ठाकुर ने भी जबरदस्त अभिनय किया. हाल में तालियों की गड़गड़ाहट भी गूंजती रही और कुछ लोग अपने आंसू भी पोंछते नजर आये.
प्ले बैक व मेकअप गजब का था. कुछ संगीत की अरेंजर की कमियाँ दरकिनार कर दी जाएँ तो पार्श्व गायन में डॉ राकेश भट्ट, कविता भट्ट मैठाणी, मुकेश अग्रवाल, हुड़का में गोविन्द शरण, ढोलक में शान्ति भूषण नीरज, पैड पर शुभम बिष्ट, बांसुरी व शहनाई में महेश कुमार, मेकअप आर्टिस्ट के रूप में दूरदर्शन देहरादून की सदी हुई मेकअप आर्टिस्ट संगीता बहुगुणा व सुधा भट्ट ने हर्र क्षेत्र में अपना सर्वस्व दिया. सूत्रधार के रूप में भावना नेगी व मंच संचालन में भारती आनंद ‘अनंता’ ने बेहतर जिम्मेदारी निभाई.
द्रौपदी की लाज …की पटकथा को गद्य की जगह पद्य में यानि गीत नाट्य में खूबसूरती के साथ स्थानांतरित कर डॉ राकेश भट्ट ने कमाल का समिश्रण किया है. पटकथा लेखिका श्रीमती कांता घिल्डियाल ने वास्तव में द्वापर युग को कलयुग में लाकर फिर से वही प्रश्न उठाया है कि क्या त्रेता की सीता माँ और क्या द्वापर की द्रुपदा…? कालान्तर से वर्तमान तक अभी भी निरंतर वही कुछ तो चल रहा है. नाटक वास्तव में अंत तक दर्शकों को बांधें रखा जिसके लिए आवाज सुनो पहाड़ो की के एमडी नरेंद्र रौथाण व उत्सव ग्रुप के डॉ राकेश भट्ट को बहुत बहुत शुभकामनाएं


