Tuesday, June 2, 2026
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अर्द्धग्रामेश्वर… 40 बर्ष पुराने पहाड़ का ताना-बाना।

(मनोज इष्टवाल)

अर्द्धग्रामेश्वर का अगर भावार्थ ढूँढ़ा जाए तो आधा गाँव, आधा शहर का कहा जा सकता है क्योंकि यह शब्द ऐसा है जिसका सही अर्थ क्या हो, वह कह पाना संभव नहीं है। लगता है प्रखर विद्वान व दूरदर्शन समाचार के समाचार सम्पादक रहे स्व. राजेंद्र धस्माना ने अपने नाटक में यह कूट शब्द बतौर नाटक के सार के रूप में प्रस्तुत कर विद्वानों को सोचने को मजबूर कर दिया। 1986 में लिखा गया यह नाटक वैसे अब तक जाने कितने मंच देख चुका होगा, लेकिन 40 बर्ष बाद भी इसका रूहानी क्लेवर जीवंत रहना नाटक की सफलता को दर्शाता है।बहरहाल ‘अर्द्धग्रामेश्वर‘ नाट्य मंचन देखने के बाद यह तो स्पष्ट हो ही गया कि उनका यह नाटक पौड़ी गढ़वाल के चौंदकोट क्षेत्र के बग्याळी गाँव पर रचा बसा वह ताना बाना है ज़ो उनके खेत खलिहान, गाँव बाजार व सरहद के आस -पास ग्राम सभा तक सिमटा एक आभामंडल है जिसमें गाँव के शिल्पकार वर्ग से लेकर प्रधान व पदान तक वे सभी लोग सम्मिलित हैं, ज़ो गाँव में भी हैं और गाँव से शहर में छोटे बड़े पदों पर कार्य करने के बावजूद भी अपने गाँव को उस दौर तक नहीं छोड़ पाए थे, जिस दौर में यह नाटक लिखा गया था। वर्तमान में विकास की अंधी दौड़ ने न सिर्फ गाँव गुठयार हमसे छीन लिए बल्कि उसकी लोक संस्कृति भी हमसे जुदा हो गई।नाटक का सबसे खूबसूरत पहलु यह रहा कि जितने भी किरदार इसमें अपना अभिनय निभा रहे थे, उनमें से 99% ऐसे नाट्यकर्मी थे जिनकी जुबान में शुद्ध गढ़वाली शब्द थे। कुछ तो ऐसे कुदरती रंगकर्मी थे, ज़ो दिल्ली के ऑडियोटोरियम से भी हमें सीधे गाँव के चौक खालिहाँन तक ले जा रहे थे। पदान का अभिनय करने वाले तो जन्मजात कलाकार लगे। उनके अभिनय में एक प्रतिशत भी मिलावट नहीं थी।

नाटक में वे सभी स्वाद थे ज़ो पहाड़ की आवोहवा को प्रदर्शित करने ले लिए बड़े माध्यम कहे जा सकते हैं। दिल्ली, लखनऊ से गाँव लौटे नौकरशाह व उनके ताने-बाने अजब-गजब के थे। हाँ… एक आध दृश्य जरूर प्रदर्शन के समय समझने में थोड़ा मुश्किल से लगे। एकेश्वर व पाटीसैण को जोड़ते हुए स्व. राजेंद्र धस्माना जी ने बग्याळी गाँव की उकाळ उंदार का अच्छा वर्णन किया है। गाँव जाओ तो एकेश्वर उतरो, वापस लौटो तो पाटीसैण..! ताकि चढ़ाई न चढनी पड़े।

अर्द्धग्रामेश्वर के पहले मंचन की यादें ताज़ी करते हुए गढ़वाली सिनेमा के पितामह फिल्मकार, अभिनेता पारेश्वर गौड़ अपनी सोशल साइट पर लिखते हैं – ‘अर्द्धग्रामेश्वर नाटक से जुड़ा एक किस्सा–राजेन्द्र धम्माना इथा डरपोक छौ कानून क नौ से , पूछा ना । ये ही नाटक से संबधित एक घटना–धस्माना जी ने जब ये नाटक लिखा तो मुझको ध्यान में रखकर भी लिखा। मै स्वयं की तारीफ क्या करूँ लेकिन दावे से कह सकता हूँ कि मैं एक बहुत ही अच्छा कलाकार था । तो उन्होने मुझे कहा कि हमारे गांव का एक दास है जिसका नाम है डुबकी दास…। जिसे मैं अच्छी तरह निभा सकता हूँ। मैने पढ़ा मुझे अच्छा लगा , मैंने उसे अपनाने की शुरूआत कर ली। एक दो रिहर्सल में डुबकी जमा। उसी नाटक में राही जी नजीबाबाद से कोटद्वार जाने वाली ट्रेन में अंधे गायक सूरदास का किरदार निभा रहा था। रिहर्सळ में जैसे ही डुबकी आया किसी का डायलॉग था, कि ये हरिजन नहीं सुधरेंगे..कुछ इस तरह का सा था । ये सुनते राही भड़क गया, उसने नाटक ब॔द करने की धमकी भी दे डाली।उन दिनों दिल्ली में बहादुर राम टम्टा (गढवाली) जज हुआ करते थे। कहा कि उनके पास जाकर शिकायत करूँगा, बस इतना कहना धस्माना जी डर गये। फिर जन्म हुआ मातबर का जिसे मैंने बखूबी निभाया। मित्र ने गोवर्धन आदि से इसकी पुष्टि की जा सकती है अगर उन्हें याद हो तो।’

राकेश पोखरियाल लिखते हैं ‘उत्तराखंड के प्रमुख बुद्धिजीवी, प्रख्यात विचारक एवं लेखक राजेंद्र धस्माना द्वारा 1986 में लिखित एक रोचक नाटक का मंचन ‘हाई हिलर्स’ समूह द्वारा गत शुक्रवार, 29 मई को नई दिल्ली के मंडी हाउस, कॉपरनिकस मार्ग स्थित एल.टी.जी. थिएटर में किया गया।
दिल्ली-एनसीआर से पधारे अनेक रंगमंच प्रेमियों, कलाकारों, पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मुझे भी इस नाटक को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। नाटक की विषयवस्तु अत्यंत प्रभावशाली थी।
यह नाटक 1986 में लिखा गया था। उस दौर में उत्तराखंड से पलायन आज की तुलना में बहुत कम था। तब जो लोग भी नौकरी के सिलसिले में दिल्ली, देहरादून या मुंबई जाते थे, उनका अपने गांव से गहरा लगाव बना रहता था और वे समय-समय पर गांव आते-जाते रहते थे। नाटक हास्य-व्यंग्य से भरपूर था और दर्शकों को खूब गुदगुदाया।नाटक की शुरूआत में पर्दा उठने से पहले पार्श्व में “दामू रे दामू तिलै धारू बोला”… ठेठ पहाड़ के उस अबोध रूप में लिए चलता है ज़ो मेरे बचपन के दिनों में यानि 50 बर्ष पूर्व फलता -फूलता आगे बढ़ रहा था। बिर्ति और फिर्ति की लोक संस्कृति को जीवन्त करता यह गीत सपनों की उस दुनिया में उस अभाव के साक्षात् दर्शन करवा देता है, जिस अभाव में न तन ढकने के लिए ढंग के कपड़े होते थे न भूख मिटाने के लिए भोजन। तब बिर्ति और फिर्ति के लोगों का ढ़ोल दमौ और ढोलक -घुँघरू की थाप व चाप ही तो एक मात्र प्रकृति प्रदत्त ऐसे संसाधन थे ज़ो पेट की भूख शांत करने का माध्यम बनते थे। उस कालजयी वक्त को याद करते हुए अतीत के वो पल याद आ जाते हैं ज़ो आँखों के आगे तैरते दूर निकल गए। सच में ज़ो भी गायिका यह गीत पार्श्व में गा रही थी, उसके बोलों की कशिश दिल की गहराईयों को नापने के लिए काफी थी।

फिर आया दौर ‘म्यारा प्वां बाघा रे...। यह देखकर अच्छा लगा कि हाई हिलर्स ग्रुप के चुनिंदा कलाकारों में रंगकर्मी डॉ सतीश कालेश्वरी सिर्फ गीत लिखते ही नहीं बल्कि उनको प्रदर्शित करने का शऊर भी उनके पास है। हुड़के की थाप में उन्होंने गढ़वाल के मूर्धन्य लोकगायक स्व. चंद्र सिंह राही को जीवंत कर दिया।

यह सुखद लगा कि नाटक में स्व. राजेंद्र धस्माना ने कालजयी लेखक व कवि स्व. कन्हैयालाल डंडरियाल को भी पंचिंग लाइन्स में जीवंत किया है लेकिन आगे चलकर वह कहे देते हैं – ‘ कैका घारम ऊत-औलाद हुँयाँ पर कवि लेखक नि हुंयाँ….। 

बहरहाल पूरे नाटक का लब्बोलुआब यह रहा कि बृजमोहन वेदवाल द्वारा निर्देशित ‘अर्द्धग्रामेश्वर’ ने दर्शकों को ढाई घंटे तक बैठे रहने के लिए मजबूर कर दिया।

मेरी नजर में नाटक का सबसे कमजोर पक्ष उसका वर्तमान के समय में बहुत ज्यादा लम्बा होना है क्योंकि वर्तमान में महानगरों की व्यस्तता में बंधे किसी भी व्यक्ति के पास समय का इतना आभाव है कि वह करोड़ों की लागत से निर्मित ढाई घंटे की फ़िल्म देखने सिनेमाघर तक नहीं जा पाता। दूसरा नाटक का सीक्वल विखराव सा लाता हुआ नजर आया। दृश्य पटल पर उभरने वाले. सीन कई बार गठजोड़ की कमी महसूस कराते रहे। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि इस खूबसूरत नाटक को और खूबसूरत बनाने के लिए इसके दृश्य पटल को सम्पादित कर इसे एक या डेढ़ घंटे में समेटकर प्रस्तुत करना चाहिए ताकि इसकी ताज़गी बनी रहे। हाई हिलर्स ग्रुप के सभी नाट्यकर्मियों ने अपना बेहतरीन दिया व नाटक को बांधे रखा उसके लिए सभी को साधूवाद। यह सुखद था कि मुझे राजेंद्र धस्माना जी के साथ अतीत में गुजारे पल दूरदर्शन संसद मार्ग से लेकर उनके आवास व आरके पुरम में अवस्थित गांधी फाउंडेशन तक का एक एक दिन चलचित्र की भांति तब तक आँखों में तैरता रहा जब तक मैं दर्शक मंच से लेकर दर्शक दीर्घा में रहा।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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