Thursday, June 11, 2026
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उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’ से सम्मानित होंगी लोकगायिका हेमा नेगी करासी

— संघर्ष की कसौटी पर कसा गया साधना का सोना

(लखपत सिंह राणा )।

लोक संगीत के क्षेत्र में उत्तराखंड की पहचान को नई ऊँचाई देने वाली गायिका हेमा नेगी करासी को वर्ष 2024 का प्रतिष्ठित ‘उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार’ प्रदान करने की घोषणा हुई है। यह सम्मान भारत के राष्ट्रीय संगीत, नृत्य एवं नाट्य अकादमी (संगीत नाट्य अकादमी) द्वारा दिया जाएगा। यह पुरस्कार न केवल उनकी विलक्षण प्रतिभा की पुष्टि है, बल्कि बाबा केदार की पवित्र भूमि से जुड़ी लोक संस्कृति के अप्रतिम योगदान का भी सम्मान है।

हेमा नेगी करासी का जीवन संघर्षों की वह गाथा है, जिसे सुनकर हर साधक को प्रेरणा मिलती है। मात्र चार वर्ष की अल्पायु में ही पिता श्री चंद्र सिंह नेगी के आकस्मिक निधन से उनका बचपन अभावों के अंधकार में डूब गया। रुद्रप्रयाग जनपद के मलाओ-चोपता गाँव की इस बालिका ने आर्थिक विपन्नता के बीच ही जीवन के कठोर यथार्थ को समझा। लेकिन परिस्थितियाँ उनके भीतर पल रही लोकचेतना को नहीं मिटा पाईं।

वर्ष 2003 में गाँव के इंटर कॉलेज कांडई के वार्षिकोत्सव में आकाशवाणी व दूरदर्शन के कलाकारों के बीच हेमा ने ‘धरती हमारा गढ़वाल’ गीत प्रस्तुत किया। उस दिन न केवल सभी स्तब्ध रह गए, बल्कि यही वह मोड़ था जहाँ से उनकी यात्रा को पंख लगे। बारहवीं के बाद कोटद्वार आकर उन्होंने गिरीश शर्मा जैसे कुशल संगीत शिक्षक से शास्त्रीय नोटों की बारीकियाँ सीखीं। किंतु जीविका के लिए दो वर्षों तक समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं में कार्य करना भी उनके संघर्ष का हिस्सा रहा। उनके मन में लोकसंगीत के प्रति गहरी आसक्ति थी, इसलिए उन्होंने छोटे-छोटे मेलों और आयोजनों से अपनी स्वर-यात्रा पुनः आरंभ की।

पहली कैसेट से वैश्विक पहचान तक

2005 में उनकी पहली ऑडियो कैसेट ‘क्या ब्वन तब’ तथा नरेंद्र सिंह नेगी के साथ ‘कथा कार्तिक स्वामी’ एल्बम रिलीज़ हुई, जिसे लोकप्रियता मिली। विवाहोपरांत 2008 से 2011 तक कुछ वर्षों का मौन रहा, किंतु 2012 में ‘माई मठियाणा देवी’ और 2013 में ‘गिर गेंदआ’ एल्बम ने उन्हें वापसी का अमर अवसर दिया। तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा। विगत पंद्रह वर्षों में हेमा सत्रह से अधिक एल्बम ला चुकी हैं। उनका हालिया गीत ‘मेरी बामणी’ तैंतीस लाख से अधिक दर्शकों द्वारा देखा जा चुका है, और मात्र एक सप्ताह में इसके छह लाख व्यूज का आँकड़ा उनकी लोकप्रियता का जीता-जागता प्रमाण है।

लोक की खनक और जादुई स्वर लहरी

हेमा की विशिष्टता उनकी ‘जागर शैली’ है, जहाँ पारंपरिक वेशभूषा में मंचस्थ होकर वह लोकचेतना को न केवल सुरों में बाँधती हैं, बल्कि उसे नवजीवन प्रदान करती हैं। उनकी आवाज़ में गढ़वाली माटी की वह सच्ची खनक सुनाई देती है, जो दिलों को झकझोर देती है। वह उत्तराखंड से लेकर न्यूज़ीलैंड, दुबई, जापान जैसे दूरस्थ देशों में भी अपने प्रशंसकों को झूमने पर विवश कर चुकी हैं।पिता चंद्र सिंह नेगी (निवासी टुखिंडा, दशज्यूला-कांडई पट्टी) की छह संतानों में चौथी हेमा बताती हैं कि बचपन में पिता से सुने जागर, झुमेलो, चौंफुला और दांकुड़ी आज उनके संगीत का मूल आधार हैं। चार वर्ष की आयु में गाए गीत ‘दे देवा बाबाजी’ पर पिता की थपकी आज भी उनके मानस पटल पर अंकित है। वह नरेंद्र सिंह नेगी, बंसती बिष्ट व प्रीतम भरतवाण जैसे वरिष्ठ कलाकारों को भी अपना प्रेरणास्रोत मानती है।

हेमा नेगी करासी केवल एक लोकगायिका नहीं, अपितु उस अटूट साहस की प्रतीक हैं जो कहती है – विपत्तियाँ मार्ग की बाधा नहीं, बल्कि मुकाम की सीढ़ियाँ होती हैं। संगीत नाट्य अकादमी का युवा पुरस्कार उस साधना का सार्थक सम्मान है, जिसने संघर्षों को सुरों में, और लोकगीतों को वैश्विक पहचान में बदल दिया। उनका जीवन प्रत्येक उस युवा के लिए प्रज्ज्वलित दीप है, जो थोड़ी-सी कठिनाई में हिम्मत हार बैठता है।

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