Monday, April 27, 2026
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मुझको पाड़ि मत बोलो मैं देहरादून वाला’ हूँ बनाम “पहाड़ी छाँ हम, पहाडै रूँनी राs ..

(मनोज इष्टवाल)

संगीत और काव्य संरचना जब गीत में ढलकर स्वर और सुर ताल बन जाते हैं तो उनका वास सीधे अंतस में होता है और वे उतने ही गहरे से उतर भी जाते हैं। उत्तराखंड राज्य निर्माण के बाद हुए बदस्तूर पलायन की पीड़ा को व्यंग्यात्मक शैली में गीत के बोलों में ढालकर जब लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने “मुझको पाड़ि मत बोलो मैं देहरादून वाला हूँ… गाया तो पलायनवादी समाज ने उसमें भी अपने अंतस में अपने पहाड़ को ढूंढ़ना शुरू कर दिया। ठीक वैसे ही जैसे नरेन्द्र सिंह नेगी के गीत ‘अबरी दां तू लम्मी छुट्टी लेकि ऐई, बगत ऐगे आखिरी, टीरी डूबण लग्यूँ छ बेटा ड़ाम का खातिर.. में पीड़ा सिर्फ टिहरी वासियों को ही नहीं हुई बल्कि पूरे पहाड़ के जनमानस की वह पीड़ा बन गई थी।

https://youtu.be/XPEBWuvT83w?si=vpumsyv4iNNofOY3

रिवर्स माइग्रेशन को बेहद करीब से छूता कुमाऊं की उप्रेती सिस्टर्स का हाल ही के दिनों में रेडिओ पार्टनर OHO & BOX FM के सौजन्य से यह गीत भी ठीक लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के इन्हीं गीतों की तुलना को संजोता हुआ सिर्फ कुमाउनी समाज की नहीं बल्कि सम्पूर्ण उत्तराखंड की सामाजिक परिकल्पना के प्रतिबिम्ब को प्रदर्शित करता हुआ आगे बढ़ता है। गीत के बोलों को ज्योति-नीरजा उप्रेती सिस्टर्स ने जितने सुंदर सुरीले सुर में गाया है, उतने ही सुंदर इसमें शब्द भी पिरोये गए हैं। चन्दन के संगीत में साजे इस गीत में वह मसाला कहीं नहीं है ज़ो आज उत्तराखंडी समाज के गीतों में उड़ेला जा रहा है। विजुअलाइजेशन की खूबसूरती यह है कि बहुत ही व्यवहारिक ढंग से इसका फिल्मांकन किया गया है। शब्द के बोलों के साथ उत्तराखंड लोक समाज व लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करता यह गीत हमारे पहाड़ी समाज को मानों यह संदेश दे रहा हो कि ‘चलो लौट आओ, चलो लौट आओ, हिमालय के बेटों चलो लौट आओ।

खेत खलिहान, नाज पानी व पहाड़ी रूहानी सौंदर्य को प्रदर्शित करते इस गीत के बोलों को अगर तुलनात्मक अध्ययन के रूप में देखा जाए तो यह गीत लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी के गीतों को छूता हुआ रिवर्स माइग्रेशन की प्रेरणा देता हुआ आत्मबोध करवाता है। शानदर उप्रेती सिस्टर्स

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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