( हरीश कण्डवाल “मनखी” कलम से)
जब से लॉकडाउन हुआ था तब से शराब की दुकान और पंचमू की ब्वारी का बुटीक भी बंद था। इस दौरान पंचमू ने और उसके ब्वारी ने बहुत काम निपटा दिये। पहले गेंहूं की कटाई, फिर मंडाई, उसके बाद छिल्ले नयार नदी के गदेरे में डाल दिये, बरसात के लिए लकडियांं की कठकळी लगा दी। घर के कुछ बंजर खेतों में पचंमू से हल लगवाकर तोर बो दी है, कुछ जगह भिडीं और अग्या मुगंरी बो दी हैं। घर के अंदर की साफ सफाई कर दी। यू ट्यूब में देखकर घर में कई ब्यंजन सासू और पंचमू को खिला दिये। बच्चों की ऑन लाईन क्लास चल रहीं हैं तो फोन उन्हीं के हाथों में है, इसलिये सोशल मीडिया में कम ही ध्यान दिया। इस लॉकडाउन के दौरान सबसे बड़ी खुशी इस बात कि थी कि उसके पति पंचमू ने पिछले डेढ महीने में दारू की बोतल की ढकणी भी नहीं सूघंने को मिली थी। इस समय पंचमू ने उसका बहुत सहयोग किया, पंचमू की ब्वारी और उसकी मॉ को लगा कि पंचमू सुधर गया है, चलो हर साल ऐसी बीमारी तो नहीं आये लेकिन लॉकडाउन जरूर हो।
सतपुली बाजार फ़ाइल फोटो।
जैसे ही सरकारों ने फैंसला लिया कि अब बाजार खुलने के साथ शराब के ठेके भी खुलेगें तो पंचमू सुबह 6 बजे सतपुली ठेके पर पहुॅच गया, वहॉ देखा तो उसके दगड़या, धर्मू, मंगतू, काळया, सब लाईन पर लगे हुए हैं। ईधर पंचमू की ब्वारी ने सोचा कि हो सकता है, पचंमू दूर खेतों में गया होगा, आ जायेगा लेकिन वह तो सतपुली में अपनी लॉकडाउन के धैर्य की खुमारी को उतारने के लिए लाईन पर लगा हुआ है। इधर पंचमू की ब्वारी बच्चों के लिए नाश्ते में ग्वाजा मरसू की भुज्जी बना रही है, और सास घर की साफ सफाई में व्यस्त है। कुछ देर बाद पंचमू भी झूमता गाता हुआ घर आ गया है, यह देखकर पहले तो पंचमू की सास का पारा चढ गया, फिर पंचमू की ब्वारी का। घर में खूब हल्ला हो गया। बच्चों की तीन महीने की फीस, उनके किताबों का खर्च कैसे निकलेगा इसकी इसे चिंता नहीं और ये अपनी गेळी खचोर कर आ गया है। तब पंचमू की ब्वारी ने कहा कि जनौ का तन बल ह्वाला कन। जब काका ही इसका ऐसा है तो भतीजे के लिए तो कहना ही क्या। खैर ये बात वहीं पर खतम हो गयी।
फ़ाइल फोटो लॉकडाउन ।
दिन में पंचमू की ब्वारी ने टीवी खोला और समाचार देखा तो दारू के ठेके पर लोगों की लाईन लगी हुई है। ऐसी लाईन तो तब नही लगी थी जब राशन डीलर राशन बॉट रहा था, पंचमू और धर्मू, मंगतू काळया जैसे ने राशन के लिए लाईन लगने के लिए सौ बहाने मार दिये, तब उनकी घरवाली लाईन पर लगी, ईधर खबर क्या मिली कि कल से दारू के ठेके खुले तो ये बिना मुॅह धोये ही सतपुली ठेके पर लाईन लगाकर ऐसे खड़े हो गये जैसे समुद्र मंथन के दौरान निकलने वाले अमृत का बॅट रही हो। अब यह देखकर पंचमू की ब्वारी ने बच्चों की ऑनलाईन क्लास खत्म होने के बाद अपनी ब्यथा कुछ इस तरह से लिखी।
दिल्ली में रहने वाले बड़या ससुर जी और देहरादून में रहने वाले कके ससूर जी, दो महीने जब लॉकडाउन था तो कोरोना महामारी पर काफी नियन्त्रण हो गया था। मानती हॅू कि अब देश ज्यादा दिन लॉकडाउन में नहीं रह सकता है। भले मैने गोर चराते हुए एम0ए0 किया है, लेकिन पढा तो है, क्यांंकि मैने गोर चराते हुए पढायी भी कि और मायके की अर्थव्यवस्था मॉ के साथ संभाली है। कॉलेज में जाकर समय बरबाद नहीं किया। यह तो बस जरा मन की भड़ास निकाल दी। चलों मुद्दे पर आती हॅूं, आपने अन्य दुकानें खोली स्वागत योग्य कदम हैं। मेरी सतपुली में बुटीक की दुकान अभी बंद है। इस महामारी में सब्र रखना जरूरी है। बडे ससुर जी मैंने सोशल मीडिया में अखबार की फ़ोटो में पढ़ा कि आपने कहा कि देश का युवा शराब का नशा कर रहा है, जो देश हित में नहीं है, यह बात बिल्कुल सही है। क्योंकि मैं तो आपके भतीजे पंचमू को रोज झेल रही हूॅं। मुझसे और मेरी जैसी पत्नी से ज्यादा कौन जानता होगा ऐसे झाझिंयो को। हमारे कके ससुर जी को पता नहीं सास किस चीज की पकौड़ी खिला कर भेजती है,कभी कुछ बोलते हैं, कभी कुछ कहते हैं, फिर भूल जाते हैं कि मैने पहले क्या बोला था।
अब देखो बडे ससूर जी मैं आपको अपना बड़या ससुर ही मानती हॅू। आपने जब जब जो बोला मैनें ध्यान से सुना और उसका पालन करा और गॉव में दीदी भूली, देवर जेठानी को बताया। घास काटते वक्त भी सब तुम्हारी छुई लगाते हैं, कहते हैं कि आपने समय रहते अच्छे निर्णय लिये, आपके सभी निर्णय देश हित मे रहे है। लेकिन इस निर्णय पर आपने चुप्पी कैसे साध ली। आपने शराब के ठेके खुलवाने के संबंध में कोई ठोस नीति राज्य सरकारों को क्यो नही दी। आप कहते तो ये नहीं करते। हमारे उत्तराखण्ड में तो आबकारी ही नैया पार लगाता है, पूरा राज्य इसी शराब की बोतलों पर टिका है, कहने को देवभूमि है, लेकिन यहॉ वास्तव में अब देवभूमि के नाम पर राक्षस लोग ज्यादा रहने लगे हैं। अब देखो जिस तरह समाचार चैनलों द्वारा दिखाते लाइव तस्वीरों मे ठेकों पर लंबी लाईन लगी हुर्ह थी, वह सब पिछले दो महीने के धैर्य को पल भर मे खत्म कर देगी, क्योंकि झांझि जब तक एक दूसरे के गले नहीं लगेगें चूमेगें चाटेगे नहीं, एक दूसरे के लिए पैग नहीं बनायेगे तब तक उनकी धीत कैसे भरेगी। तब ऐसे में कोरोना का संक्रमण चौगुना बढेगा।
अब मेरे पति पंचमू को ही देख लो सुबह जब सतपुली से गळी खचोर कर आया था तो कह रहा था कि मेरे चाचा जिंदाबाद। जब तक मेरे चाचाजी तब तक भतीजे के लिए दारू की कोई कमी थोड़ी है, हमारे चाचा जी भतीजे का पूरा ख्याल रखते हैं, इसलिए उन्होनें यहॉ भी ठेके खुलवाने में देर नहीं की। अब हालात देखना हमारे पहाड़ अभी तक इस निरभगी महामारी से बंचित था, लेकिन ये दरूळया अब जरूर लेकर आयेगें। अब हमें भी चिंता होने लगी है। हम सभी उत्तराखण्ड की महिलायें इस निर्णय से बहुत नाराज हैं। कके ससुर जी आप ये ठेके नहीं खुलवाते और प्रवासी देवर जेठानियों के लिए यहॉ लाने की व्यवस्था करते। आप भी इसी बहाने दो चार दिन के लिए कके सास जी को लेकर यहॉ आ जाते। आपके लिए हम तिमलू की कंकोड़ी की सब्जी, ग्वीराळ के फूलों की सब्जी, मरसू की भुज्जी खिलाते। दो चार दिन रहकर अपने बंझर पुगड़ीयों को देख लेते। गॉव में आपके दुमंजली कूड़ी को ही होम स्टे बनवा लेते। आप खुद गॉव आ जाते इस दौरान और तब यहॉ रहकर हमारे बैल काळया और बुल्ला से अपने खेतों में हल लगाते फिर देखो कैसे पूरे उत्तराखण्ड में प्रवासी लोग अपने घर आकर खेती नहीं करते। वैसे मैने कके सास जी को फोन करके कहा है कि लॉकडाउन खुलने के बाद यहॉ घर के आम खाने जरूर आना, इस बार खूब आम आ रखे हैं।
अभी भी अगर देश और राज्य को इस महामारी से बचाना है तो इस ठेके खोलने वाले निर्णय को वापस लेलो, बच्यां राल निर्भगी छ्वारा त कच्ची भी पे ल्याल, निथर घाट म लिजाणा खुणी भी क्वी झांझी नी मिलण्या। यदि राज्य की आर्थिक स्थिति को बढाना ही है तो गॉव को मजबूत करो, वहॉ कुटीर उद्योगों को बढावा दो, जहॉ लघु उद्योग हैं वहॉ उनके लिए सुविधा दे दो। ये दारू से राज्य के राजकोष में धन तो आ जायेगा लेकिन धन कमाने वाले इस महामारी की चपेट में आ जायेगे। इन झांझियों के कारण बेकसूर परिवार वाले भीं संक्रमित हो जायेगे। क्यांकि इन्हें तो इतने बरसों में नही समझा सके तो अब कैसे समझाना जब डेढ महीने से ये लॉकडाउन नहीं ठेके खुलने का इंतजार कर रहे थे। अब ज्यादा क्या लिखूं बस हम महिलाओं की पीड़ा के समझते हुए देश व राज्य हित में ठेके कुछ दिन के लिए बंद करवा दीजियेगा, नही तो इतनी मेहनत सब बेकार जायेगी।
अब इतना लिख दिया है, बाकि क्या लिखूं ज्यादा समझदार नही हॅू। शाम को जरा खेतो में गोबर डालने जाना है, और शाम के लिए खाना भी बनाना है, उधर सासू को चाय की तलब लग गयी है, जरा चाय बनाती हॅू। तुम लोग तब तक मेरी इस पीड़ा को आगे सरकाओं और अपनी राय जरूर देना। क्योंकि सोशल मीडिया में बिना क्वी कमेंट अर लाईक करी पोस्ट इन लगदी जन बुल्यांद कि नै ब्यौंली कि बिना बिंदी कपाळ अर बिना लौंग नाक।
’’पंचमू की ब्वारी सतपुली से’’ ।


