मेरे गांव धारकोट की मढ़ी का सन 1910 का बना शौचालय
(मनोज इष्टवाल /संस्मरण 15/12/21)
सचमुच कितना भोला-भाला, सीधा-साधा और मासूम था वह बचपन। अब सोचकर भी हंसी आती है। क्योंकि जब हम पाटी-बोळख्या व बस्ता लेकर अपने गांव के महादेव मढ़ी के पास से गुजरते थे तो आंखें बंद करके शौचालय को भी ठीक उसी श्रद्धा से नमन करते थे जिस श्रद्धा से महादेव को। क्योंकि कई बार मढ़ी की माई दीदियों को हमने उसमें आते जाते देखा, साथ में हाथ में पानी का बर्तन भी…लेकिन कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर ये है क्या?
थोड़ा बड़े हुए और कक्षा चार पांच में पहुंचे तो लगा महात्मा जी तो अंदर धुनि के पास बैठकर तपस्या करते हैं शायद माई दीदियाँ यहां तपस्या करती होंगी। सच कहूं तो यह राज तब तक बना रहा, जब तक 11-12 साल की उम्र तक मैं चाचा जी के साथ बिलासपुर नहीं गया। कहाँ ग्रामीण खुले में शौच त्यागने वाले और कहाँ फिर मैदानों में चूल्हे के आकार के शौचालय में बैठकर शौच करना। सच कहूं तो मैदानों के ऐसे शौचालयों में बैठने पर ज्यादा घिन्न लगती थी क्योंकि तब एक विशेष जाति समुदाय के लोग वह मल कनस्तरों में लेकर कहीं दूर फैंका करते थे। उन्हें समाज अछूत कहता था।
(मेरे गांव धारकोट की मढ़ी का सन 1910 का बना शौचालय)
यह राज एक दिन तब खुला जब मैं पिताजी के साथ अपने बाजार के ये निकला था। तब शायद मेरी उम्र 14 बर्ष के आस पास रही होगी। पिताजी बोले- तू यहां क्यों प्रणाम कर रहा है? मैं बोला-यहां मैं माई दीदियों को हाथ में लोटा लिए जाते देखता हूँ। क्योंकि तब प्लास्टिक प्रचलन में नहीं था और बोतल महादेव में हो ऐसा सम्भव नहीं था। पिता जी तब जोर से हंसे और वह बात महात्मा जी को बताई। उनका व माई दीदियों का हंस हंसकर बुरा हाल था। पिता जी में एक खूबी थी, वह ऐसे उठते प्रश्नों का खूब विस्तार से जबाब देते थे। उन्होंने बताया कि गांव की बसासत के बाद यहां महादेव निर्माण की बात आई तब 1910 में जब यहां मढ़ी निर्माण हुआ तो आम रास्ता मढ़ी के ऊपर से होकर बनाया गया। उस दौर में यह तय हुआ कि मढ़ी के बाएं छोर पर एक सुलभ शौचालय बनाया जाय। ताकि जो भी जोगी-जोगन मढ़ी में रहें या आएं उन्हें असुविधा न हो। सच कहूं तो मैं आत्मग्लानि से कई दिन तक शर्मसार रहा और जब भी इस शौचालय के पास से गुजरता आंखे बंद करके सांस रोककर गुजरता। बालपन जो ठहरा।
धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों युवावस्था की ओर कदम बढ़े अपनी नासमझी पर मुस्करा देता था। शायद मैं ही नही मेरे समय के ज्यादात्तर अबोध ऐसा ही करते थे, लेकिन वे इतना कडुवा सच कहने का साहस कर सकेंगे, ऐसा मुझे नहीं लगता।
(कुमैय्या दीदी माई आनन्दीगिरी के साथ उनके जीवनकाल के अंतिम दिनों की फोटो)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने तो स्वच्छ भारत में गांव-गांव स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण की बात हुई तब हमारे गांव की मढ़ी की माई आनन्दी गिरी (कुमैय्या दीदी) कहा करती थी कि स्वच्छ भारत तो बहुत बड़ी बात हुई । पहाड़ों में दूर दूर तक कोई इस बारे में सोच भी नहीं सकता था कि शौचालय भी कोई चीज हुई। उस दौर में हमारी मढ़ी में यह शौचालय निर्मित था। अब तुम लोग ही बताओ कि तुम संसारी ज्यादा संस्कारी हो या हम जोगी-जोगणियां। मेरी उम्र गुजर गयी। तब से ही हम स्वच्छ भारत मिशन के आदी हैं और अब प्रधानमंत्री इतने बर्षों बाद इसी बात को कह रहे हैं। चलो अच्छी बात तो है कि हमारे देश को कोई तो ऐसा प्रधानमंत्री मिला जिसने ऐसा सोचा वरना जिसको देखा बेशर्मों की तरह कहीं भी हग मूत लेता था।
सच मानिए आज से 50 बर्ष पूर्व ज्यादात्तर ग्रामीण समाज के लोगों को यह पता नहीं था कि यह मूत्र त्यागने का स्थान है वो इधर उधर जाते वक्त उचककर जरूर देखा करते थे कि आखिर यहां ऐसा विशेष होता क्या होगा जो यहीं ये लोग मूत्र त्यागने जाते हैं। शायद यह भी सोचते रहे होंगे कि अगर हम घर में ऐसा कुछ बनाये तो उसे कैसे डिज़ाइन करें। आखिर रसोई गौशाला और घर के आस हगने मूतने का स्थान..! न जी ना। लेकिन सामाजिक परिवर्तन और शिक्षित समाज ने गांवों में बमुश्किल 20 या 30 बर्ष पूर्व ही जनचेतना के तहत यदाकदा शौचालय बनाये होंगे जबकि मेरे गांव धारकोट में इसका निर्माण 111 बर्ष पूर्व हो गया था।



