Monday, June 24, 2024
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गोरखा का वह प्रथम क्रूर शासक..! जिसने कीर्तिपुर के महिला-पुरुषों के होंठ-नाक कटवा दिए।

  1. गोरखा का वह प्रथम क्रूर शासक..! जिसने कीर्तिपुर के महिला-पुरुषों के होंठ-नाक कटवा दिए।

(मनोज इष्टवाल ट्रेवलाग 09 मई 2015)

नेपाल टूर ..! भूकम्प व राहत अपडेट..।


हम गोरखा पहुँच गए…। गोरखा यानि जहाँ नेपाल के प्रथम शासक पृथ्वीनारायण शाह ने जन्म लिया था और 23 अंचलों (54 राज्य) के राजाओं को जीत कर नेपाल की स्थापना की थी।  यहाँ भूकंप की स्थिति काफी हद तक अब सुधार की ओर है। विस्तृत लेख बाद में लिखूंगा फिलहाल चंद्रौटि से गोरखा तक की संक्षिप्त यात्रा वर्णन लिख रहा हूँ। देहरादून उत्तराखंड से लगभग 250-300 किमी. की इस यात्रा में हम बुटवल कुछ देर के लिए रुके। चौड़ी सड़कों के दोनों छोर बसा यह मार्केट आकर्षक है। दैनिक दिनचर्या में भूकम्प का कहीं कोई चिन्ह नजर नहीं आया। शायद यह क्षेत्र भी मधेश का हुआ। यहाँ से काठमांडो की दूरी मात्र 250 किमी. के आस-पास है।

दाउन्ने से आगे सड़क सर्पाकार होकर पहाड़ चढ़ना शुरू कर देती है। हम लगभग 8 बजे दाउन्ने देवी मंदिर पहुंचे। सड़क मार्ग से एक किमी. दूरी पर यह मन्दिर है। टीम मन्दिर तो नहीं पहुंच पायी लेकिन में सड़क से लगभग 200 मीटर ऊपर लक्ष्मी नारायण मन्दिर जरूर गया। यहाँ से लौटकर नेपाल के स्वादिष्ट पकवान सेल रोटी और खस्सी का नाश्ता कर आनन्द लिया।

सच कहूं तो नेपाल में वन और पानी बेहद मात्रा में है। मैंने इतने बड़े बड़े जंगल देखे लेकिन अपने उत्तराखंड के पहाड़ जैसे चीड़ वृक्ष यहाँ कहीं नहीं देखे। सप्त गंडकी (नारायणी नदी) के तट पर बसा नारायण गढ़ बहुत सुन्दर है। नारायणगढ़ में काली गण्डक, बूढी गण्डक, त्रिशूली सहित चार और नदियों का मिश्रण होकर सप्त गण्डक नदी बनती है।

मुझे आश्चर्य इस बात का है कि नेपाल सरकार ने नदी तट पर पसरे शांत तट पर अभी तक ध्यान केंद्रित क्यों नहीं किया होगा? यहाँ नदी तट पर बेहतर पार्कों का निर्माण व नदी में वोटिंग का आनन्द लेकर पर्यटन व आर्थिकी को मजबूत किया जा सकता है।

नारायण गढ़ से हमें बांये हाथ मुड़कर काठमांडो की ओर जाना पड़ता है। यह रुट ठीक वैसा ही है जैसे आप ऋषिकेश से श्रीनगर बदरीनाथ की ओर बढ़ते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि वहा गंगा आपके दांये हाथ बहती है तो यहाँ त्रिशुली नदी आपके बांये हाथ..।

त्रिशुली के दोनों छोर छोटे-छोटे गॉव हैं, जहाँ सिर्फ और सिर्फ भुट्टे की खेती होती है। वहीँ राष्ट्रीय राजमार्ग में छोटे छोटे बाजार जो चाय पानी के हैं,  इन्हीं बाजारों में ऊनि धागे से बने सजावट के सामान आपकी आँखों के केंद्र बिंदु बनते हैं। त्रिशुली नदी घाटी का यह मार्ग नारायण गढ़ से मुंगलिंग तक लगभग 35 किमी. दूर है। यहाँ से नाक की सीध में सीधी रोड काठमांडो जाती है जबकि हम बांये मुड़कर गोरखा के लिए मुड़ जाते हैं, जो त्रिशुली के दांये छोर पर है। यहाँ से गोरखा 24 किमी. दूरी पर है। रास्ते भर औषधि पादप आपका ध्यान आकर्षण करते नजर आते हैं।

गोरखा दलभंज्यांग पहुँचते ही तबाही का मंजर दिखना शुरू हो गया। जगह जगह मकान जमीदोज थे। लोग टेंट लगाए जैसे तैसे राहत का इन्तजार करते नजर आ रहे थे। हम दुःख दर्द बांटते आखिरकार गोरखा पहुंचे जहाँ हमारी व्यवस्था लक्ष्मी ओझा जोकि काठमांडो में सामाजिक कार्यकर्ती हैं, के मायके में उनके भाई के घर थी। जहाँ हम 18 सदस्यीय दल के लिए भोजन व्यवस्था और रात्रि विश्राम की सम्पूर्ण व्यव्स्था थी।

हमारी टीम में देहरादून से गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट की राष्ट्रीय अध्यक्ष उमा उपाध्याय, श्रीगंगा उद्वार समिति चंद्रबनी की उपाध्यक्ष पूजा सुब्बा,पॉजिटिव वेलफेयर सोसाइटी से कमला थापा, सबकी सहेली ग्रुप से मंजू कार्की, स्वयम् सेविका निर्मला काफ्ले, स्वयंसेविका सुनीता क्षेत्री, स्वयम् सेवक कोमल घलेशुभम सिन्धुपाल शामिल हैं, जबकि हरिद्वार से भगवत कुञ्ज के भगवताचार्य पण्डित बसंत राज अधिकारी वहीँ नेपाल के दलदली प्रगति नगर से स्वयं सेवक तील काफ्ले, स्वयम् सेविका बिमला अधिकारी, काठमांडो से स्वयं सेविका लक्ष्मी अधिकारी वृन्दावन से ऋषि पोखरेल के अलावा नेपाल पुलिस प्रहरी अच्युत अधिकारी व कोटद्वार गढ़वाल से बस-चालक अमित, ट्रक ड्राइवर प्यारे लाल इत्यादि मौजूद हैं।

गोरखा पहुंचने के बाद यहाँ के इतिहास की बात न की जाय तो भला यह कैसे संभव है क्योंकि मैं गोरखा या नेपाल राष्ट्र के बारे में उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ जी की पुस्तक “गोरख्याणी” में काफी विस्तार से पढ़ चुका था। यह सच कहूं तो छोटे से पहाड़ी कस्बे पर मेरे लिए वह सपनों का शहर है जिसने नेपाल राष्ट्र ही नहीं बल्कि भारत बर्ष के बडे हिस्से पर बेहद क्रूर शासन किया व जिसके किस्से हम अक्सर अपने बुजुर्गों से सुनते आ रहे हैं। नेपाल के प्रथम राजा पृथ्वीनारायण शाह ने सिर्फ अपने राजकाज के दौरान सिर्फ़ भारत में ही क्रूर शासन की नींव रखी होती तो शायद यह समझ लिया जाता कि यह एक देश के दूसरे देश पर शासन हस्तगत करने का तरीका हो सकता है लेकिन अपने पडोसी राज्य कीर्तिपुर पर अधिकार जमाने के लिए हर हद पार कर देना रूह कम्पाने जैसा है। कीर्तिपुर को हस्तगत करते हुए इस शासक ने अपने भाई को आदेश दिया कि सिर्फ़ गोद के बच्चे को छोड़कर हर एक स्त्री पुरुष के होंठ और कान काटकर एक जगह इकट्ठा करना जिन्हें आकर मैं देखूंगा। आइये जानते हैं इतिहास के पन्नों में दर्ज उन बेरहम अलफ़ाजों के खून में डूबे हर्फों को :-

ज्ञात हो कि पृथ्वी नारायण शाह एक गोरखाली राजा थे, जिन्होंने विभिन्न 54  राज्य में बंटे राजाओं के रजवाडों को हस्तगत उनका एकिकरण किया और बिशाल नेपाल राज्य की स्थापना की।उनका जन्म गोरखाली राजाओं के शाह वंश में हुआ । उनके पिता गोरखा राज्य के राजा नरभूपाल शाह और माता पाल्पा की राजकुमारी कौशल्यावती देवी थी । पिता की मृत्यु के पश्चात्स संवत 1799 अर्थात सन 1742 में ये गोरखा की राजगद्दी पर बैठे।

ज्ञात हो कि गोरखा राज्य की स्थापना कब हुई उसका पूरा ब्यौरा उपलब्ध कर पाना संभव नहीं है फिर भी सन 1560 ई. में राजा द्रव्यशाह द्वारा यहाँ महल बनाकर विधिवत अपना राज्याभिषेक करवाया गया जो कि राजा पृथ्वीनारायण शाह के बूढ़े दादा बताये जाते हैं। गोरखा से काठमांडो की दूरी 141 किमी बताई जाती है।

कीर्तिपुर में गोरखा सेना का अमानवीय कृत्य व नरसंहार :-

डॉ शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ अपनी पुस्तक ” गोरख्याणी” में पृष्ठ संख्या 47-48 में लिखते हैं कि गोरखा नरेश पृथ्वीनारायण शाह ने मय नेपाल उपत्यका के महत्वपूर्ण नगर कीर्तिपुर को लक्ष्य बनाकर अपना विजयाभियान प्रारम्भ किया। सं० 1820 ( सन 1763) में उसने धुलिखेल, चौकोट, पनौती, खड्गुर तथा बेनपा पर अधिकारकर के समस्त बेनपा- उपत्यका को हस्तगत कर लिया। उसकी बढ़ती हुई शक्ति से आतंकित होकर लमजुङ् सहित चौबासी की ठकुराइयों की सम्मिलित सेना ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। किन्तु उसे गोरखालियों ने पराजित करके भगा दिया।

संवत 1821 में (सन 1764) के आश्विन में राजा पृथ्वीनारायण के भ्राता सुरप्रताप के नेतृत्व में गोरखाली सेना ने कीर्तिपुर पर दूसरी बार आक्रमण किया। पहली बार के आक्रमण में पृथ्वीनारायण को प्राण बचाकर भागना पड़ा था लेकिन इस बार पृथ्वीनारायण पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरे थे । किन्तु  इस बार भी कीर्तिपुर के वीरों के सम्मुख गोरखालियों का कुछ बस न चला। सुरप्रताप के नेत्र पर तीर लग जाने तथा अनेक गोरखाली सरदारों के मारे जाने के कारण गोरखाली सेना को पीठ दिखाकर भागना पड़ा। तब पृथ्वीनारायण ने कीर्तिपुर को चारों तरफ से घेर लिया। वहां किसी भी प्रकार की सामग्री जाना बंद करके वहां के निवासियों को तड़पाना बंद कर दिया। वह अपनी कुछ सेना को कीर्तिपुर दुर्ग में प्रविष्ट करवाने में सफल हो गया। गोरखाली राजा की ओर से समस्त नगर एवं दुर्गवासियों को क्षमा प्रदान करने की घोषणा की गई। दीर्घकाल के घेरे से व्याकुल कीर्तिपुर के निवासियों ने गोरखालियों को घोषणा पर विश्वास करके आत्मसमर्पण कर दिया। दो दिन पश्चात् पृथ्वीनारायण ने नुवाकोट से अपने भ्राता सुरूपरत्न के लिए आदेश भेजा कि ‘गोद के बच्चों को छोड़कर कीर्तिपुर के समस्त निवासियों के होठों और नाक को काट डाला जावे। केवल उन व्यक्तियों को, जिनका कार्य बीन बजाना है, इस सार्वभौम दण्ड से मुक्त रखा जाए  क्योंकि बीन बजाने के लिए होठों का होना आवश्यक है। कटे हुए होठों और नाकों को सम्भालकर रखा जाए। मैं उन्हें आकर देखूंगा।  नगर के प्रमुख व्यक्तियों को प्राणदण्ड दिया जावे, तथा कीर्तिपुर का नाम बदलकर नासकटापुर ( नास= नासिका) रखा जाए।

पृथ्वीनारायण के इस घादेश का भीषण क्रूरता एवं बर्बरता के साथ पालन किया गया । कई व्यक्तियों ने विकृताकृति बनकर जीवित रहने की अपेक्षा आत्महत्या करना श्रेयष्कर समझा। पादरी माइकेल एजिलो ने नगर के अभागे व्यक्तियों पर दया दिखाने के लिए सुपरत्न से प्रार्थना की, किन्तु उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। कहते हैं कि कटे हुए होंठों और नाकों का भार 17 धरनी निकलाया अब इस धरनी का मापक क्या रहा होगा कह पाना असम्भव है क्योंकि धरनी मूलत: पृथ्वी को कहा जा सकता है। हो न हो पृथ्वीपति शाह के राज्यकाल में उन्ही के नाम से कोई मापक का नाम धरनी रहा हो जैसे गढ़वाल के राजा फतेपतिशाह के राज्यकाल में उन्होंने अपने नाम का उद्बोधन करते मापक पाथा निकाला था।

बहरहाल इस प्रकार विकृताकृति बनाए गए अगणित व्यक्ति अपनी चिकित्सा के लिए कपूचिन पादरियों के पास पहुचे थे । होंठ और नाक कटवाने के कारण उन जीवित व्यक्तियों की मुखाकृतियां मृतकों को खोपड़ियों के समान दिखाई देती थी।

पृथ्वीनारायण के इस जघन्यकृत्य पर लीपापोती करना व्यर्थ है। उसकी राजसभा के कवि ललितवल्लभ ने अपने पृथ्वीन्द्रवर्णनोदयकाव्य में उसके इस कुकृत्य का भी उसकी प्रशस्ति के रूप में वर्णन किया है:-

सर्वान दुर्गवरान स भूपतिवरो भित्वा चतुर्दिक स्थितान,

रम्य कीर्तिपुरेति विश्रुतपुरं अग्राह भूरिश्रवा:।

हत्वा शत्रुमनस्विनः कति पुनः अच्छिद्य नाशदिकम,

कृत्वा कोश्च विरुपिण: कुपुरुखान कीर्तिस्वरूप द्विषः ।

                  पृथ्वीन्द्रवर्णनोदयकाव्य, उ. राहुल- पूर्वोक्त पृष्ठ 199

वहीं दूसरी ओर ढूंढीराज भंडारी अपनी पुस्तक “नेपाल की ऐतिहासिक विवेचना पृष्ठ 183″ में लिखते हैं कि – “हैमिल्टनलै आपुनो ‘ऐन अकाउंटस आब नेपाल’ मा मकवानपुर-आक्रमण को घटनामाथि प्रकाश गर्दे पृथ्वीनारायण शाह को चरित्रमाथि कालो दाग लगाउने असफल प्रयत्न गरिका छन । यस सम्बन्ध मा प्रायः सबै अंग्रेजइतिहासकारहरू यौर्टे थैला का चट्टा बट्टा – जस्ता देखिन्छन । अतः गोरखाराज्यका जन्मजात शत्रु अंग्रेजहरूले पृथ्वीनारायणशाहको चरित्रमाथि जस्तो सुकै लांछन लगाए तापनि नेपाल को इतिहासको क ख ग जान्ने व्यक्ति पनि अंग्रेजहरुको भनाईमा विश्वास गर्न सकदेन ।” नेपाल के इतिहासकार ढूंढिराज भंडारी के इस संदर्भ से तो यह प्रतीत होता है कि जितने भी अंग्रेज इतिहासकार थे सभी ने कलुषित मानसिकता के साथ राजा पृथ्वीनारायण शाह के कीर्तिपुर विजय अभियान का बर्णन किया है लेकिन नेपाल के कवि ललितवल्लभ द्वारा लिखे गये अपने ग्रंथ पृथ्वीन्द्रवर्णनोदयकाव्य तो वही इशारा कर रहा है जो संदर्भित निम्न लेखकों ने लिखा है। इससे साफ जाहिर होता है कि नेपाल राजसत्ता के दौरान उत्तराखंड व हिमाचल में जितने भी संदर्भ इनकी क्रूरता के इतिहासकारों ने दिए हैं वे कहीं न कहीं उन आमजन की बातों का समर्थन करते हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी हम सुनते आ रहे हैं। फिर भी यह आवश्यक है कि अगर नेपाली इतिहासकार इसे अंग्रेजों की फिजूल मानसिकता बताते हैं तो इस पर और अधिक शोध की आवश्यकता है। संदर्भ:-
1- बालचंद्र शर्मा -नेपाल को ऐतिहासिक रूपरेखा पृष्ठ 279
2- एशियाटिक रिसर्चेज जि. 2, उ0-किर्कपैट्रिक (एन अकॉउंटस आब दि किंगडम ऑफ़ नेपाल। उ0 पूर्वोक्त पृष्ठ 385
3- राहुल सांस्कृयायन – गढ़वाल पृष्ठ 199
4- हैमिल्टन – ऐन अकाउंटस आब दि किंगडम ऑफ़ नेपाल पृष्ठ 165
5- बाल चंद्र शर्मा – नेपाल की ऐतिहासिक रूपरेखा पृष्ठ 205
6- के सी चौधरी – एंग्लो -नेपालीज रिलेशनशिप पृष्ठ 10
7- ढूंढीराज भंडारी – नेपाल की ऐतिहासिक विवेचना पृष्ठ 183

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