Thursday, February 29, 2024
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ताराकुंड की तालू भंडार गुफा….। इन भूलभूलैय्या गुफाओं में छुपा है धनसम्पदा का अकूत भंडार।

◆ ताराकुंड ट्रैक… भूलभुलैय्या से कम नहीं है अकूत धन सम्पदा का “तालू भंडार गुफा”।

◆ सात गुफा द्वार लेकिन घुसकर बाहर निकलना बेहद कठिन।

(मनोज इष्टवाल ट्रैकिंग 14 नवम्बर 2022 पार्ट-2)

मन्दिर के ऊपरी हिस्से में अर्थात धर्मशाला क्षेत्र में एक मटमैली सी स्वेटर व धोती पहने एक सांवला व्यक्ति दिखाई दिया जिसने ताराकुंड के सम्मोहन से मुझे बाहर निकाला। पास खड़े धीरू भाई सिरतोली गाँव से मैंने पूछा- धीरू भाई…ये व्यक्ति तो यहाँ के नहीं दिखते  धीरू बोले- ये नए महात्मा आये हैं शायद मंदिर में…।  मैं आश्चर्य में था कि इस जंगल में जिसके आस पास 5 से 7 किमी. की परिधि में कोई गाँव नहीं पड़ता, भला यह व्यक्ति कैसे इस ठंड में 9000 फिट से भी अधिक ऊँचाई में रहता होगा। फिर अचानक अतीत की टोली माई याद आ गई जो यहीं कहीं एक गुफा में रहती थी।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक व पत्रकारिता में मास्टर डिग्री व बड़े मीडिया घरानों को अपनी सेवाएँ देने वाले फैजाबाद अयोध्या निवासी रजनीश तिवारी ने आखिरकार अपने सवालों का जबाब तलाशने के लिए देवभूमि हिमालय का रुख किया और आखिरकार मन की भटकन को विश्राम देने के लिए माँ तारा व आदिदेव महादेव के श्री चरणों में आ पहुंचे।

रजनीश तिवारी अभी न पत्रकार की भूमिका में हैं न ही गृहस्थ जीवन में ही जीते नजर आये। सच कहूँ तो उनके शब्दों से लग रहा है कि वे गृहस्थ आश्रम को त्याग साधू-महात्मा जैसी आदर्श बातों के झंझावातों में उलझे नजर आते हैं  जब रतन असवाल ने उनके बारे में जानना चाहा तो वे बोले- “मैं मीडिया सवालों के जबाब ढूँढने प्रकृति के करीब जंगलों तक पहुँच गया हूँ। यही सवाल मुझे मीडिया कि नकारात्मक ऊर्जा से साकारात्मकता की ओर ले जा रहे हैं, जो मीडिया की नकारात्मक ऊर्जा थी, उसके साकारात्मक प्रमाण ढूँढने का अच्छा अनुभव मिल रहा है और मनुष्य कि चेतना का विकास जब तक नहीं हो पाता तब तक सवाल व जबाबों का यह दौर चलता रहेगा और ध्वन्ध में आप जीवन जी रहे हैं, ध्वन्ध से बाहर आये बिना इन जबाबों को ढूंढना मुश्किल है”।

रजनीश तिवारी ने ये बातें भले ही सीधे व सपाट लहजे में कहीं हों लेकिन एक ऊँचाई पर पहुँचने के बाद ऐसे शब्दों का मोल तब और बढ़ जाता है क्योंकि यहाँ निश्छल प्रकृति व शिबलोक में निर्ध्वंध विचरण हमें यह तो अहसास करवा ही गया कि रजनीश तिवारी एक पढ़े लिखे व्यक्तित्व हैं जो जीवन जीवन की वैभवता कि उहापोह से निकलकर वह मार्ग ढूँढने का यत्न कर रहे हैं जो आंतरिक ध्वंध से लड़कर आगे निकलने का मार्ग प्रशस्त करते हैं

मेरे ज्यादात्तर साथी आगे निकल चुके थे…मंदिर प्रागंण से लगे ताराकुंड झील के दूसरे छोर…..। मेरे साथ धीरू भाई व सुनील पन्त रह गये थे। ठाकुर रतन असवाल को कभी भी मैं ट्रैकिंग के दौरान पकड़ नहीं पाया। इसी ट्रैकिंग में नहीं बल्कि हर उस यात्रा में जो हमने एक साथ की हैं। वह हमेशा स्पॉट में पहुँचने की जल्दी में रहते हैं और मैं गारे-माटे का अस्तित्व ढूँढने में ही लगा रहता हूँ।

ताराकुंड झील के दूसरे छोर की दूरी मंदिर से लगभग 300 मीटर से कुछ अधिक होगी। हमने मंदिर के बायीं छोर से आगे बढ़ना शुरू किया तो पाया झील के मध्य हिस्से के ऊपरी क्षेत्र जंगल में एक जगह कुछ देवदार के छोटे-छोटे पेड़ बहुत घने से उगे हुए हैं। ये लगभग दर्जन या डेढ़ दर्जन रहे होंगे. मैंने उत्सुकता से पूछा कि यहाँ पर क्या है तो सुनील पन्त बोले- यहाँ पूर्व पर्यटन मंत्री लेफ्टनेंट जनरल टीपीएस रावत जी ने एक नर्सरी बनवाई थी।  मेरे होंठों में मुस्कान रेंग गई कि चलो इतने साल गुजरने के बाद ही सही यहाँ कुछ तो सरकारी कारोबार के निशाँ मौजूद हैं।

मेरा लक्ष्य आंछरी ढौंड पहुँचने का था क्योंकि आंछरियों पर मैं बर्षों से काम करता आ रहा हूँ। यह जगह इधर की पर्वत श्रृंखलाओं में सबसे ऊँचाई लिए थी। मेरे सहपाठी रतन असवाल, रवि शर्माअजय कुकरेती ग्रामीणों के साथ जिनका नेतृत्व पूर्व खंड विकास अधिकारी आशाराम पन्तपूर्व प्रमुख शंकर सिंह रावत कर रहे थे, उनके साथ आंछरी ढौंड की ओर बढ़ चुके थे। मेरी नजर ताल से करीब डेढ़ सौ मीटर दूरी पर स्थित एक ऊँची चट्टान जैसी पर्वत श्रृंखला पर पड़ी. जिसका ज्यादात्तर भाग झाड़ीनुमा पौधों व पेड़ों के बीच ढका हुआ था लेकिन उसके झुरमुट इस बात कि गवाही दे रहे थे कि आप मुझे इस तरह बाय पास कर आगे नहीं बढ़ सकते। मैंने धीरू भाई से पूछा- धीरू भाई ये क्या है?  धीरू बोले- सर, ये तालू भंडार है।  मुंह से बरबस हि निकल पाया – तालू भंडार…..!  तो सुनील पंत बोल पड़े- दरअसल इसके पीछे कई पीछे की कई कहानियाँ प्रचलन में हैं।

सुनील पंत बताते हैं कि तालू भंडार पर यूँ तो कई प्रचलित कहानियाँ हैं, लेकिन मूलतः पूरे क्षेत्र में एक कहानी कॉमन सी है कि जब एक महात्मा ने मिस्त्री से ताराकुंड मंदिर बनाने को कहा था तब उन्होंने मिस्त्री को बोला था कि जिस दिन वह मन्दिर पूरा कर देंगे उस दिन वह उनका घर बहुमूल्य अशर्फियों से भर देंगे। कहा तो यह भी जाता है कि वह महात्मा तब इसी गुफा में रहते थे। एक दिन जब राजमिस्त्री को पता चला कि महात्मा अभी कहीं बाहर हैं तब उनके मन में लोभ आ गया व वे उस खजाने की तलाश में उस गुफा के अंदर जा घुसे जिसे तालू भंडार कहते हैं। राजमिस्त्री गुफा में घुस तो गए लेकिन उसकी भूल-भुलैय्या सुरंगों से बाहर नहीं निकल पाए। महात्मा वापस लौटे तो पाया राजमिस्त्री भूखे प्यासे हैं व उनसे जिन्दगी कि भीख मांग रहे हैं व उन्हें अपनी गलती पर पछतावा है। यही कहानी बडेथ गाँव के बुजुर्ग भी बताने लगे। मंदिर उसी राजमिस्त्री द्वारा पूरा किया गया कि नहीं यह कोई नहीं बता पाया लेकिन कहा जाता है कि इसके बाद भी तालू भंडार में समाई अकूत धन सम्पदा न राजमिस्त्री ही हासिल कर पाए न ही कालान्तर में गोरखा काल में गोरखा व अन्य!

नाग व जहरीले सर्प करते हैं रखवाली।

अवधारणा यह भी है कि तालू भंडार गुफा कि धन सम्पदा की नाग व जहरीले सर्प रक्षा करते हैं, लेकिन सात सुरंगों के इस भूलभुलैय्या में कोई यह साहस नहीं कर पाया कि उसमें घुसकर पता कर सके कि क्या वास्तव में यहाँ अकूत धन सम्पदा है क्योंकि इस गुफा में जो भी जानवर घुसता है उसे बाहर निकलते किसी ने नहीं देखा।

बाघ व भालू का बसेरा...!

धीरू भाई व अन्य लोगों का मानना है कि यह इस क्षेत्र में सबसे खतरनाक गुफा है जिसके सात द्वार हैं व इन सात द्वारों की सात सुरंगे कहाँ-कहाँ निकलती हैं कोई नहीं जानता। लेकिन इसमें घुसने का सबसे बड़ा डर यह रहता है कि यहाँ भालू व बाघ दोनों ही आसरा लिए रहते हैं। साधू रजनीश तिवारी भी कहते हैं कि उन्हें अक्सर रात्रि पहर में मंदिर प्रांगण में जानवर टहलने का आभास होता है इसलिए वह धुनी जलाए रखते हैं व रात्रि प्रहर अपनी कुटिया से बाहर नहीं निकलते हैं।

मैंने कुछ कदम गुफा द्वार से अंदर बढ़ने की कोशिश की थी।

धीरू भाई बेहद साहसी युवा हैं। सिरतोली गाँव के धीरू भाई चाह रहे थे कि मैं व वे स्वयं इन गुफाओं के तिलिस्मी रहस्य को उजागर करने के लिए गुफा द्वार से अंदर घुसें…! मुख्य द्वार से हम कुछ कदम आगे बढे भी जहाँ से सीढियां घुप्प अँधेरे की तरफ बढती नजर आती हैं लेकिन बाहर से बड़ेथ गाँव के बुजुर्गों की आवाज ने हमें वापस लौटने को मजबूर कर दिया। उनके शब्दों में यह डर था कि कहीं गुफा द्वारों से कोई भालू या बाघ आकर हम पर न झपट पड़े।

हम बाहर निकल आये तो पाया..जिन्नी ढौंड या आंछरी ढौंड से अब तक हमारे सहयोगी वापस लौट आये थे व वे अब गुफा के शीर्ष में चढ़कर फोटो खिंचवा रहे थे  गुफा के शीर्ष में कुछ ध्वज पताकाएं भी दिखाई दे रही थी। मैंने तालू भंडार गुफा के रहस्य पर पर्दा ही डाले रखना उचित समझा क्योंकि मेरे लिए यह एक अनटोल्ड हिस्ट्री थी जिसका बखान में पूर्व में लिखे ताराकुंड के रहस्य के लेखों में अभी तक न खुद लिख पाया था न ही सुन या पढ़ पाया था। मुझे लगता है कि कोई साहसी खोजी अपनी टीम व दिशा सूचक यंत्रों के साथ इन गुफाओं में प्रवेश करे तो शायद वह यहां के अकूत खजाने के रहस्य से पर्दा उठा सकता है कि यह सिर्फ़ वहम मात्र है या वह सच जिसे यहां के जन मानस में सुना व जाना जाता है। वैसे इन भूलभुल्लैया गुफाओं में जयादात्तर के मुहाअने वर्तमान में बंद हो गए हैं। एक आध ही सुरंग है जो दूर तक जाती दिखाई दे रही हैं। जिन तक पहुंचना स्वयं भी टेडी खीर है। फिर भी साहसिक पर्यटन के उत्साही पर्यटकों के लिए यह एक अबूझ पहेली के समान ही है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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