Wednesday, June 19, 2024
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तमसा यमुना घाटी के जौनसार बावर क्षेत्र में जन्मी वैज्ञानिक डॉ लीला चौहान।

तमसा यमुना घाटी के जौनसार बावर क्षेत्र में जन्मी वैज्ञानिक डॉ लीला चौहान।

(मनोज इष्टवाल)

वह छोटी मोटी गोल मटोल जब घर छोड़कर जवाहर नवोदय विद्यालय पुरोला के निकली तो उसके बाबा व माँयें ही नहीं बल्कि गाँव समाज के लोग उसे विदा करते समय गुमसुम तो थे ही लेकिन खुश भी थे कि हमारे गाँव की एक छोटी सी जान ने इतनी छोटी सी उम्र में ही नवोदय विद्यालय के लिए अपने आप को चयनित करवा दिया। यूँ तो उसके बाबा ने उसे पढ़ाने की जिद जो ठान ली थी। तभी तो गाँव से मीलों दूर डामटा के प्राथमिक विद्यालय में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। ये कहानी लाखामंडल अर्थात यमुना नदी के बहाव के दाहिनी ओर बसे जौनसारी जनजाति के ग्राम च्यामा, तहसील चकराता, जिला देहरादून, उत्तराखंड की रहने वाली डॉ. लीला चौहान की है, जो आज इस जनजातीय क्षेत्र के लिए एक मिशाल बन गई है।

डॉ लीला ने देहरादून जिले के दूरस्थ क्षेत्र उत्तरकाशी से सीमा बांटते ऐसे गाँव में जन्म लिया जहाँ प्रकृति ने अपना अद्भुत प्यार न्योछावर किया है, जहाँ के जनमानस का मुख्य व्यवसाय क़ृषि व भेड़ बकरी पालन रहा है। जहाँ के सुंदर बुग्याल मानथात में नुणाई जैसा लोक पर्व मनाया जाता है। जहाँ बेटियों की उन्मुक्त हंसी से घाटियां वादियाँ गुंजायमान रहती हैं। जहाँ अबोध बचपन की किलकारियों में मासूम बचपन आपको युवा बनाता है, व जहाँ अतिथि देवो भव: की परम्परा से पूरा समाज लवरेज रहता है। जहाँ शिक्षा का उजाला बहुत देर से फैला लेकिन उसकी उजली किरण ने ऐसी लीला रचाई कि उसी उजली किरण की तपिश में जन्मी डॉ लीला चौहान ने जवाहर नवोदय से इंटर मीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात्  कृषि अभियांत्रिकी गोविन्द बल्लभ पंत विश्वविद्यालय पंतनगर कुमाऊं मंडल से बी टेक, फ़ूड प्रोसेसिंग IIT खड़गपुर से फ़ूड प्रोसेसिंग एंड इंजीनियरिंग एम टेक, प्रोसेसिंग एंड फ़ूड इंजीनियरिंग गोविन्द बलल्भ पंत विश्वविद्यालय पन्तनगर से पीएचडी करने के साथ साथ  3 बार नेट एग्जाम क्वालिफाइड, गेट एग्जाम क्वालिफाइड किया और तो और नेशनल एंड इंटरनेशनल जर्नल में रिसर्च पेपर एवं आर्टिकल्स का प्रकाशन किया।

पिता सूरत सिंह चौहान ,श्रीमती फूलो देवी, श्रीमती नको देवी (बायोलॉजिकल माँ) एवं श्रीमती राजो देवी अर्थात तीन माँओं की लाड़ली डॉ लीला चौहान के पिता मूलत: कृषक हैं, इसीलिए पहाड़ी क़ृषि व उद्यानीकरण डॉ लीला चौहान की रग-रग में दिखने को मिल जायेगा। जब लीला गाँव में होती हैं तो खेतोँ में हल की मूठ थामे, ओखली में धान कूटते व चौक खलिहान में बूढ़े बुजुर्गों व बच्चों के साथ गप्पें हाँकते दिख जाएंगी।

एक दौर वो भी रहा जब इंटरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नही थी, अपनी होनहार बेटी को आगे कैसे पढ़ाया जाय इस बात की चिंता पिता को सता रही थी। गाँव के बूढ़े बुजुर्ग यही कहते कि बहुत हुआ 12वीँ पास तो कर ही लिया है बेटी ने। लेकिन डॉ लीला चौहान की आँखों में तैरते सपने व यमुना नदी के फैलाव के साथ फ़ैलते ख्वाब, कुछ कर गुजरने की चाह को पिता सूरत सिंह चौहान ने भली भांति देख लिए थे। बेटी ने गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर में बी टेक का एग्जाम जो पास कर लिया था। भला सूरत सिंह कहाँ बेटी की इस यात्रा को रोकना चाहते। उन्होंने खेत बेचे व बेटी को कहा – तेरा भविष्य तुझे निहार रहा है। हमें तुझ पर गर्व है।

बी टेक करने के बाद डॉ लीला का पंजाब नेशनल बैंक में कृषि अधिकारी के रूप में चयन हुआ। लेकिन लीला भला यहीं कहाँ रुकने वाली थी, आँखों में तैरते ख्वाब अभी कसमसा ही रहे थे। कृषि अधिकारी के पद को त्यागकर भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर से फ़ूड प्रोसेसिंग इंजीनियरिंग में M.Tech किया। उसके पश्चात नेशनल फेलोशिप फ़ॉर हायर एजुकेशन में चयन होने से Ph.D करने में आर्थिक सहायता मिली जिस कारण पंतनगर विश्वविद्यालय से Ph.D सम्पन्न हुई।

हम सभी यह तो भले से जानते हैं कि उत्तराखंड सरकार ने चीड़ की पत्तियों से फ्यूल निकालने की एक परियोजना का शुभारम्भ किया था लेकिन यह कोई नहीं जानता कि डॉ लीला चौहान नें Ph.D Thesis के विषय पर चीड़ की पत्तियों से बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग मटेरियल विकसित किया। जिसका पेटेंट डॉ. लीला के नाम दर्ज है। जो कि आने वाले समय में उत्तराखंड में चीड़ की पत्तियों की समस्या के समाधान हेतु मील का पत्थर साबित होगा। डॉ लीला इसी दौरान 2 माह के लिए फ्रांस में इंटर्नशिप हेतु चयन हुआ। वह अब तक कुल 10 नेशनल एवं इंटरनेशनल जर्नल्स में रिसर्च पेपर एवं आर्टिकल्स प्रकाशित हो चुके हैं।

वहां से लौटने के पश्चात डॉ लीला नें 6 माह पंतनगर विश्वविद्यालय में सिविल डिपार्टमेंट में अध्यापन का कार्य भी किया। इसके पश्चात 16 माह तक चंडीगढ़ ग्रुप ऑफ कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्य किया।बीते 4 माह से भारत सरकार के अधीन, कृषि विज्ञान केंद्र में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं।

एक किसान की बेटी जिसने 2019 में उत्तराखण्ड स्टेट काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी ने यंग साइंटिस्ट का अवार्ड दिया और तथा आज वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (Council of Scientific and Industrial Research- CSIR-CFTRI, मैसूर) में वैज्ञानिक के पद पर चयन हुआ।। विपरीत परिस्थितियों में हमेशा अपना मुकाम हासिल किया । यह सभी लोगो के लिए प्रेणादायक है।

सबसे छोटे भाई के आकस्मिक देहांत के बाद जब पूरा परिवार टूट चुका उसके बाद भी लीला ने अपने लक्ष्य को हासिल किया। पिछले दो साल से सब्जेक्ट मैटर स्पेशिलिट के पद पर कृषि विज्ञान केंद्र शिवहर जिला, बिहार में कार्यरत है

स्टेट काउंसलिंग फ़ॉर साइंस एंड टेक्नोलॉजी द्वारा वर्ष 2019 में यंग साइंटिस्ट अवार्ड के रूप में सम्मानित किया गया।
किसान परिवार में जन्मी डॉ लीला चौहान की इस उपलब्धि के लिए बहुत बहुत शुभकामनायें।

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