Sunday, July 21, 2024
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“रिखुली” एक सशक्त पटकथा में प्रदर्शित गढवाल का 30 से 50 बर्ष पूर्व का अतीत

तमाम संघर्षों के बावजूद भी निर्भागी "रिखुली" न जीते जी जी सकी, न मर कर अमर हुई

 तमाम संघर्षों के बावजूद भी निर्भागी “रिखुली” न जीते जी जी सकी, न मर कर अमर हुई !

 वह कडुवा सच जिसे कह व समझ पाना उतना ही कठिन जितना घसियारियों के उतुंग शिखरों पर गूंजते बैर गीत 

 आस्था, विश्वास व अंधविश्वास के बीच झूलती एक ऐसी पटकथा जो आँखें भिगो देगी                                     

(मनोज इष्टवाल)                                                                  इस बार 26 जनवरी के दिन दिल्ली के विजय पथ पर आयोजित झांकियों में नारी सशक्तिकरण का जो आभामंडल देखने को मिला उसने जहाँ पूरे भारत की महिलाओं को आत्मविश्वास से लवरेज किया है। वहीँ हर पति पिता व भाई को गर्व व अभिमान से भर दिया है। दूसरी ओर देश के प्रधानमन्त्री कह चुके हैं कि यह दशक उत्तराखंड का दशक है व हाउस ऑफ़ हिमालयाज में नारी सशक्तिकरण की जनभागिता के साथ लखपति दीदी योजना ने सुदूर पहाड़ों के खंडहर होते गाँवों में फिर से ऊर्जापुंज जागृत कर उन्हें रिसाइकिल करना प्रारम्भ कर दिया है …..लेकिन हमें यह भी तो देखना होगा कि उन माँ बहनों का क्या? जो रिखुली जैसी हैं …बेचारी “रिखुली”!

सच कहूँ तो बर्षों बाद एक ऐसी फिल्म देखने को मिली जिसकी मुझे तलाश थी, आप देखेंगे तो आप भी यही कहेंगे और अगर आप फिल्म निर्माता या निर्देशक पटकथा लेखक कहानीकार इत्यादि हैं तो जरुर बोलेंगे – अरे यार यही तो सब्जेक्ट था, जिसकी मुझे तलाश थी। आप का अन्तस् मचलेगा व कहेगा..काश…मेरे पास ऐसी स्क्रिप्ट होती तो ?

निर्माता निर्देशक जगत किशोर गैरोला के निर्देशन में यह पहली गढ़वाली फीचर फिल्म कही जा सकती है, जिसमें सिनेफोटोग्राफर गोविन्द नेगी के सधे हाथों का कमाल स्क्रीन पर उभरकर सामने आया है।  ठेठ ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के किरदार भी सभी ग्रामीण ही हैं, न कि गढवाली या बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कोई नामी गिरामी चेहरे! लेकिन पटकथा व संवाद की मजबूती देखिये, वह आपको तनिक भी स्क्रीन से नजरें नहीं हटाने देती। मेकअप के नाम पर नाममात्र का मेकअप यह दर्शाता है कि निर्माता निर्देशक  गैरोला इसे आर्ट फिल्म के रूप में हम सबके मध्य लाना चाहते हैं। फिल्म कम बजट में बनी होगी यह कहना ठीक नहीं रहेगा लेकिन यह कहा जा सकता है कि उन गढवाली फिल्मों से 10 गुना बेहत्तर है, जिनकी न पटकथा ही ढंग की होती है न दृश्य फिल्मांकन की निरंतरता होती है न शुद्ध डायलॉग डिलीवरी …!

फिल्म का मजबूत पक्ष                                                           आप फिल्म देखने के बाद कहेंगे फिल्म की पटकथा ही फिल्म की मजबूती है. जो सत्य भी है लेकिन मैं कहूँगा फिल्म की पटकथा में शामिल वह हर ग्रामीण कलाकार बेहद मजबूती के साथ अपना किरदार निभाता दिखा, जिसने आम जीवन में शायद ही किसी मल्टीप्लेक्स सिनेमा हाल देखे होंगे। ठेठ को ठेठ कैसे लाया जाय यही कला तो एक निर्देशक की होनी चाहिए।

फिल्म निर्देशक  गैरोला की हर सम्भव कोशिश रही कि वह आज से 30 बर्ष पूर्व का चमोली गढवाल और लगभग 50 बर्ष पूर्व का पौड़ी गढ़वाल इस फिल्म के पर्दे में उकेर सके। गाँव की उस दौर की शादी, पूजा पद्धति, आम जन जीवन, खान-पान, एकाकी का जीवन जीते बुजुर्ग के लिए गाँव के हर घर से अलग-अलग दिन खाना पहुंचना, पशुधन के लिए चारा, दूर बुग्यालों में बांसुरी बजाता भेड़ पालक, बुग्यालों में गीत, ऊँचे चांठो पाखौं में घास काटती महिलाओं के घसियारी गीतों में प्रकट अपने अन्तस् की पीड़ा जिसे चमोली गढवाल में बैहर गीत या बैरा गीत के नाम से जाना जाता है, अमेल रिश्ते, सौतेली माँ का दुर्व्यवहार और घर गाँव में टाइम पास करते ताश की चौपाल, हुक्के के साथ गपियाते वे संवाद, देशी बहु का गाँव की चढ़ाई पर फूलती साँसे, रिखुली का भूत और जाने क्या-क्या ? सब ग्रामीण आवोहवा को कड़ी दर कड़ी जोडती नजर आई। यह सबसे सुखद दिखा कि पूरी फिल्म में बोले गए गढवाली के संवाद बिशुद्ध रूप से चमोली की गढवाली बोली में बोले गए और यह पहली ऐसी फिल्म कही जा सकती है जिसमें शुद्ध गढवाली के शब्द रहे हैं।

फिल्म का कमजोर पक्ष                                                         “रिखुली” पर केन्द्रित पटकथा अचानक बिन बताये ही गाँव के ऐसे आँगन में पहुँच जाती जहाँ देव नचाई हो रही होती है या फिर देवपूजा हो रही होती है। सिर्फ एक बार इस देवपूजा को रिखुली से जोड़कर नायक हरीश (प्रशांत डिमरी) की माँ नायक को लेकर पूज (पुछवाने) के लिए जाती है लेकिन यहाँ भी वह तारमतम्य जोड़ते समय संवाद शैली थोडा सा कमजोर लगती है,  क्योंकि नायक हरीश की माँ का सशक्त अभिनय के दौरान इस समय बोला या बुलवाया गया डायलाग रिखुली से जुड़े होने की जगह उसे खारिज न करते हुए भी खारिज करता दीखता है। शायद इसमें निर्देशक  की यह सोच रही हो कि नायक की माँ चाहकर भी नहीं चाहती कि उसके बेटे का  ध्यान बहु से हटकर उसकी बचपन की दोस्त रिखुली पर केन्द्रित हो।

एक सीन में रिखुली जिस तरह रोटी सिलवटे के ऊपर घिसे नाममात्र के नमक पर घिसती हुई नाड़े पर लपेटकर ले जाती है, वह पीड़ा देखने में बहुत असहनीय लगती है। रिखुली (अंजली नेगी) यही यकीनन पहाड़ का असली सच आज से तीन से पांच दशक पूर्व का था। जब पैंसा नहीं था, जी तोड़ मेहनत के साथ भूख थी। मुझे लगता है कहानी का सशक्त्त रूप जहाँ ग्रामीण परिवेश की वानगी में ताने बाने हैं, वहीँ कमजोर पक्ष में इन्ही ताने बानों का सबसे मजबूत पक्ष देव नचाई, देव पुजाई का बार-बार बेवजह दृश्यांकन है। लेकिन यह उनके लिए कमजोर पक्ष हो सकता है जिन्होंने आम जीवन में पहाड़ का वह जीवन नहीं जीया होता है, जहाँ का जन जीवन देवता तुल्य होकर भी देवताओं के भरोंसे ही होता है।

भावुकता                                                                             नायक  व नायिका के बचपन का किरदार निभाते कलाकार यकीनन वह बेहतरीन कर गए जो रंगमंच के मंझे हुए कलाकार नहीं कर पाते। सिर्फ नायक नायिका ही नहीं बल्कि गाँव का हर बच्चा अपने असली रूप में दिखा। यहाँ कैमरा पर्सन व डायरेक्टर ने यह सब कैसे करवाया होगा यह वे दोनों या उनकी सपोर्टिंग टीम ही जानती होगी, लेकिन भेड़ व कुत्ते को साथ लेकर बांसुरी बजाते शैलेन्द्र पटवाल बताते हैं कि कुत्ता मेरी बगल में लेटा रहे व भेड़ें मेरे आसपास रहें, इसे फिल्माने के लिए उनके इर्द गिर्द उनके गोसाई (पशु पालक) लडकियां हर समय मौजूद रही। शैलेन्द्र बताते हैं कि एक मेंढा (खाडू) जिसकी बड़ी-बड़ी सींगें थी, वह मारने को भी आता था, उसका भी डर था कि कहीं वह भट्टां गिर्र-गिर्र न कर दे…!

हरीश की भूमिका में मुख्य नायक की भूमिका निभा रहे प्रशांत डिमरी के पास संवाद भले ही कम थे लेकिन वह बिन संवाद के भी बेहतरीन कार्य कर गए। नायिका रिखुली (अंजली नेगी)तो संवाद शून्य ही थी। लेकिन उसने अपना किरदार बेहतर मजबूती से निभाया। उसके चेहरे पर वह गरीबी, वह सौतेली माँ का डाह व वह खामोशी रुपी बिषात साफ़-साफ़ झलक रहा था, जो उसकी सहेलियों की प्रताड़ना से उसके चेहरे के मनोभावों को पथराने के लिए काफी थे।

सच कहें बिना डायलाग डिलीवरी के भी अगर ऐसी फिल्म बन सकती है तो इसे आर्ट फिल्म कहने में कोई दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए। नायिका की चट्टान से गिरकर मौत, नायक का बर्षों बाद चट्टान में रस्सी के सहारे उतरकर नायिका की अस्थियों को बटोरना और अंत में उन्हें चिता के हवाले करना बेहद भावुक पल थे लेकिन एक कमजोर पक्ष यहाँ यह दिखा कि नायक के साथ उसकी पत्नी भी घाट पर उपस्थित रही, जहाँ नायिका की चिता जल रही थी। मुझे लगता है आज के जीवन में यह सम्भव है लेकिन आज से 30 से 50 बर्ष पूर्व यह सम्भावनाएं नहीं रही होंगी, लेकिन यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं है कि हो सकता है, उस क्षेत्र की संस्कृति में ऐसी सम्भावनाएं रही हों।

फिल्म देखने के लिए जरुरी क्या है ?                                      अगर आप सचमुच गढवाल के अन्तस् की पीड़ा व उसके लोक समाज व लोक संस्कृति की वह वानगी देखना चाहते हैं जो तीन से पांच दशक पूर्व तक थी तो आपको यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। आपको यह फिल्म उस लोक व्यवहार का वह रूप भी दिखायेगी जिसमें –चलो रे भात खाणु भी शामिल है तो गालियों में सजी नारी के कठोर बोल भी! मेरा  दावा है कि आप फिल्म देखकर यह नहीं कह सकते कि बेवजह पैंसे व समय बर्बाद करने आये हैं।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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