Saturday, July 13, 2024
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एक गॉव था धौंतरी गाड़ -गदना, इसी गाँव से निकले थे पहले अपर वित्त सचिव चंदोला

एक गॉव था धौंतरी गाड़ (गदना)।

(मनोज इष्टवाल 23 अप्रैल 2014)

पौड़ी जनपद में मुख्यालय से मात्र ७-८ किलोमीटर दूरी पर पैडूलस्यूं पट्टी में गहड़, डोबल्या, भेमली और केबर्ष गॉव से अपनी सीमाएं बाँटता गॉव धौंतरी गाड़ किसी जमाने में पढ़े- लिखे संभ्रांत चंदोला जाति के ब्राह्मणों का गॉव माना जाता था जिनके पूर्वज कालान्तर में कफोलस्यूं पट्टी के थापली गॉव से आकर यहाँ बिस्थापित हुए थे।

धौंतरी गाड़…! मेरा भी इस गॉव में दो-एक बार जाना इसलिए हुआ कि एक तो इसकी सरहद भेमली गॉव से लगी है, जहाँ मेरी माँ का मायका (मेरा ननिहाल) है और दूसरी बात यह कि यह डोबल्या गॉव से नजदीक पड़ता है जहाँ हमारा पुराना गॉव है, और हमारे पारिवारिक दो तीन परिवार आज भी इसी गॉव में बसे हुए हैं।

यूं तो कालान्तर में हम भी चौन्दकोट गढ़ी के नजदीक नौखंडी से इसोटी, इसोटी से कुलाणी से डोबल्या और डोबल्या से कफोल्स्यूँ धारकोट आ बसे हैं। हमारे पूर्वज पदान हुआ करते थे. लेकिन हम भी काल अंतराल के साथ साथ दशा और दिशा बदलते रहे। फिर भी हमारे सभी गॉव आज भी आवाद हैं।

धौंतरी गाड़ गॉव से मेरा लगाव और जुड़ाव इसलिए भी था क्योंकि  थापली गॉव कफोलस्यूँ से आकर यहाँ बसे चंदोला लोग हैं, और थापली मेरी फूफू की ससुराल हुई।

इस बार एक शादी में हाल ही में भेमली गॉव गया जहाँ तक अब सड़क पहुँच गई है। मन हुआ क्यों न धौंतरी गाड़ जाकर वहां के परचितों से कुशल क्षेम भी पूछ आऊं और पुरानी यादें भी ताजा कर लूँ। लेकिन जब इस गॉव पहुंचा तो देखा बड़े-बड़े भवनों की छत्तें टूट गयी हैं जहाँ साग सब्जी हुआ करती थी उन खेतों में कंडाली की आदमकद झाड़ियाँ उगी हैं। जिन पेड़ों के संतरों का रस आज भी मेरी दाड़ के कोने-कोने को रसीला बना रहा है, वो सूखकर अपनी बर्बादी की दास्ताँ सूना रहे थे।
उफ्फ….इस असहनीय मंजर को देख मेरा दिल भर आया। पलकें गीली हुई जब देखा कि पूरा गॉव सन्नाटे में तब्दील है। कई चेहरों को ढूंढती आँखें और जवानी की वह अल्हड़ता याद आ गई। गॉव बंजर और खंडहर ………………….!

हे इश्वर.. मेरे गॉव में ऐसी शिक्षा और संस्कृति मत लाना कि मेरा गॉव भी धौंतरी गाड़ जैसा गूंगा बहरा और अपाहिज हो जाय। जहाँ के नौनिहालों ने अपनी शिक्षा और विकास के ताने बाने बुनकर इस माटी में लतपत होकर इस श्रृष्टि के सुख भोगने के लिए अपने पुरानों द्वारा बनायी हवेली नुमा आवासों को छोडकर शहर में दमघोटू संस्कृति में चंद सुखों के लिए पलायन कर दिया।

.. ये तो थी पुरानी पोस्ट…।

इसी गाँव से निकले थे पहले अपर वित्त सचिव चंदोला।

बरसों बाद इस गाँव का एक होनहार आगामी 24 दिसम्बर को अपने गाँव की आवोहवा तलाशने पहुँच रहा है। लेकिन गाँव आज भी खंडहर है। सच कहें तो इसे भुतवा कहा जा सकता है। यह पौड़ी के नजदीक विगत 50 बरसों का पहला ऐसा गाँव हुआ जो मानवरहित बर्ष 2013-14 में ही हो गया था। मेरी उपरोक्त फेसबुक पोस्ट की जानकारी मिलते कई चंदोला वंशज ने फोन किया मैसेज किये व कहा कि रोजगार की तलाश व बच्चों के भविष्य के निर्माण के लिए बाहर निकलना मजबूरी है।

दूसरी ओर मेरा गाँव धारकोट आज भी सरसब्ज है। 60 परिवारों का गाँव भले ही घटकर अब 40 परिवारों के आस पास आकर अटक गया है। भले ही दो तिहाई खेती बंजर हो गई है लेकिन एक तिहाई खेत आज भी हरियाली बिखेरते हैं। आज भी रासो मंडाण, थडिया-चौंफला के स्वर आंगनों में यदा-कदा गूँजते सुनाई देते हैं।

मेरे ध्यान में यह आता है कि धौंतरी गाड़ गाँव में बर्ष 2000 से पूर्व लगभग 10 परिवार रहा करते थे लेकिन 2010 तक आते-आते यह सिर्फ़ 05 परिवारों में तब्दील हो गये व लगभग तीन साल बाद यह गाँव वीरान हो गया। यह वही धौंतरी गाड़ जो कभी पढ़े -लिखे लोगों का गाँव कहलाता था। इसी गाँव के उत्तर प्रदेश में सेल टैक्स के जॉइंट कमिश्नर रहे विजय कुमार चंदोला का नाम लोग विकास खंड कल्जीखाल पौड़ी गढ़वाल के असवालस्यूँ पट्टी के सूला गाँव के डीआईजी ठाकुर सिंह नेगी से शुमार करते हैं। जो राजस्थान पुलिस में ब्रिटिश काल में डीआईजी रहे व उन्होंने एक पूरी पल्टन ही गढ़वाली पुलिस की बना डाली थी। जॉइंट कमिश्नर विजय कुमार चंदोला ने भी गढ़वाल कुमाऊं के बहुत से लोगों को सेल टैक्स में नौकरी लगाया। इनकी गिनती बेहद ईमानदार अधिकारियों में होती थी। वैसे इन्हीं के नाम के एक चंदोला चंदोला राईं गाँव पौड़ी के भी बड़े अधिकारी रहे हैं।

इनके बारे में जानकारी मिली है कि धौंतरी गाड़ गाँव पास होने के कारण इन्होने दो बर्ष इंटर कॉलेज कंडारा, पैडुलस्यूँ में अध्यापन का कार्य भी किया। फिर ये इलाहबाद चले गये जहाँ इन्होने वकालत की व तदोपरान्त उत्तर प्रदेश सरकार में सेल टैक्स अफसर नियुक्त हुए। कहा जाता है कि इनकी कुशल कार्यक्षमता को देखते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी अक्सर अपने भाषण संसोधन का जिम्मा इन्हें सौंप दिया करते थे।  यही कारण था कि ये उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, केंद्र सरकार में वित्त मंत्री रहे स्व. नारायण दत्त तिवारी की नजरों से भी ओझल नहीं हो पाये व उनके कार्यकाल में इन्होने वित्त संबंधी कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनते ही स्व. नारायण दत्त तिवारी ने उनके लिए प्रदेश सरकार में एक नया पद सृजित किया व उन्हें जॉइंट कमिश्नर सेल टैक्स के साथ अपर सचिव वित्त की अहम् जिम्मेदारी भी सौंप डाली। सेवानिवृत्ति के बावजूद भी वे कुछ बरसों तक उत्तराखंड सरकार को अपनी सेवाएं देते रहे।

अब आते हैं इनके पुत्र अमित चंदोला व पुत्री प्रियंका चंदोला पर।

अमित चंदोला जिन्हें परिजन बंटी के नाम से जानते हैं। इनकी शिक्षा दीक्षा मेरठ दिल्ली के बाद आईआईटी कलकत्ता से हुई। ये अपने समय के आई आई टी टॉपर रहे व लंदन ऑफ़ इकोनॉमिक्स में स्कॉलरशिप लेकर इन्होने आगे की पढ़ाई जारी रखी। तदोपरान्त एचएसबीसी में बड़े अधिकारी के रूप में विदेशों में सेवा देते रहे। व कई बर्ष विदेशों में सेवा देने के बाद ये एचएसबीसी के इंडिया हेड बनकर हैदराबाद आ गये। तदोपरान्त ये कोरोना काल से पूर्व हांगकांग के एचएसबीसी में पोस्टेड रहे। पुन: इनकी नियुक्ति हैदराबाद हुई है। इनकी बहन प्रियंका चंदोला पेशे से कंप्यूटर इंजिनियर है व उनके पति भी इसी पेशे से जुड़े हुए हैं। प्रियंका अभी सपरिवार अमेरिका में सेटल हैं।

विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अमित चंदोला व उनकी बहन प्रियंका चंदोला बरसों बाद अपनी कुलदेवी के दर्शन हेतु सपरिवार ज्वाल्पादेवी धाम आ रहे हैं। इस दौरान वह अपने खंडहर गाँव की दशा देखने भी जाएंगे, जहाँ उनके परिजनों व पूर्वजों ने घर आँगन बसाया। गौ धन, पशुधन व खेतीबाड़ी की। किसी जमाने में धौंतरी गाड़ गॉव सेब, फल व सब्जियों के लिए भी प्रसिद्ध था। पैडुलस्यूँ के इस ढाल पर यह पहला गाँव था जहाँ सेब पैदा होते थे।

इस गाँव की समृद्धि का राज यह रहा कि यहाँ शिक्षा का उजाला बहुत पहले से ही था। क्योंकि इनके पुरखे थापली गाँव से यहाँ आकर बसे थे जहाँ ब्रिटिश काल में पहला प्राइमरी स्कूल व लड़कियों के लिए स्कूल था। इन्हीं के पूर्वज अध्यापन में रहे।

पौड़ी कोटद्वार रोड पर बुवाखाल से आगे गहड़ गाँव धार के पास गोदयूँ पाणी स्थान से मल्ली भीमली-धौंतरी गाड़ – तल्ली भीमली -रैदुल लिंक रोड स्व. विजय कुमार चंदोला की ही देन है। उनका विजन था कि वे धौंतरी गाड़ गॉव की सरहद में एक बड़ा एजुकेशन हब खोलेंगे ताकि इस क्षेत्र के होनहार व निर्धन बच्चे यहाँ मुफ्त में शिक्षा प्राप्त कर सकें।

बहरहाल विजय कुमार चंदोला जी के स्वर्ग सिधारने के बाद उनके पुत्री व पुत्री पहली बार अपने उस पैतृक गाँव को देखने आ रहे हैं जो उजाड़ हो गया व वहां झाड़ियां उग आई हैं। आस पास के गाँव के लोगों की माने तो अब धौंतरी गाड़ गॉव में जंगली सूअर, बाघ व भालू इत्यादि का रैन बसेरा हो गया है। शुरूआती दौर में पास के ही कांडे गाँव के किसी युवा ने यहाँ गौशाला व मुर्गी फ़ार्म खोला था लेकिन वह उसे चला नहीं पाये व रही सही कसर भी समाप्त हो गई।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या इस गाँव को पुनर्स्थापित करने के लिए यहाँ के चंदोला बंधु कुछ सामूहिक प्रयास कर पायेंगे या फिर यह गाँव एक था धौंतरी गाड़ गॉव बनकर रह जायेगा।

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