Friday, May 17, 2024
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लाखामंडल.. जहाँ स्थित है यदुवंशी रानी ईश्वरा की 18 पुश्तों का शिलालेख।

लाखामंडल.. जहाँ स्थित है यदुवंशी रानी ईश्वरा की 18 पुश्तों का शिलालेख।

(मनोज इष्टवाल)

पांडवकालीन सिंहपुर अर्थात द्वापर महाभारत काल का सैंहपुर जिसके प्रथम राजा के रूप में सेनवर्मा राजा का जिक्र यदुवंशी रानी ईश्वरा के शिलालेख से ज्ञात होता है, के बाद 18वीँ पुश्त अर्थात छठी सातवीं शताब्दी में रानी ईश्वरा पर आकर समाप्त होता है के राज्य के विराट स्वरुप का अगर अध्ययन करना हो तो ब्राह्मी लिपि व संस्कृत भाषा में लिखे गये इस शिलालेख की हमें जानकारी होनी आवश्यक भी है।

कई इतिहासकारों ने इस संदर्भ में भले ही अपनी अपनी राय प्रकट की हो लेकिन सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ ने सर्वप्रथम इसका अनुवाद अपनी पुस्तक “उत्तराखंड का इतिहास भाग -1 पृष्ठ 347-348 में किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि सिंहपुर की रानी ईश्वरा ने यह शिलालेख अपने पति जालंधर (वर्तमान का हिमाचल व पंजाब क्षेत्र ) नरेश चंद्रगुप्त के हाथी से गिरकर मृत्यु हो जाने के बाद लिखवाया है। शिलालेख की अंतिम पंक्तियाँ विचारणीय हैं क्योंकि जिस क्षेत्र में शिक्षा आज से 50 बर्ष पूर्व तक अभाव रहा उस क्षेत्र के लोग छठवीँ -सातवीँ शताब्दी तक कितने शिक्षित थे यह ब्राह्मी लिपि में लिखे गये इस शिलालेख से ज्ञात होता है। रानी ईश्वरा के आदेश पर इस शिलालेख को इस क्षेत्र में शिव के पुत्र भट्टवसुदेव ने इस प्रशस्ति को लिखवाया। रौदीतक के निवासी नामदत्त के पुत्र ईश्वरणाम नाम वाले सूत्रधार ने इस प्रस्तर पर प्रशस्ति को उत्कीर्ण किया।

भले ही आज यह स्पष्ट नहीं हो सकता कि उस काल में रौदीतक ग्राम कहाँ रहा होगा लेकिन यह संदर्भ अंगीकार करने लायक़ है कि हम उस काल खंड में भी कितने समृद्ध रहे हैं। रानी ईश्वरा के पूर्णज राजाओं की वंशावली स्पष्ट दर्शाती है कि उनका राज्य किस सीमा तक फैला था व उनके काल में किस तरह की शासन व्यवस्था था। आइये जानते हैं कि लाखामंडल में यदुवंशी रानी ईश्वरा द्वारा ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण करवाए गये शिलालेख में क्या कुछ लिखा गया है :-

सर्गस्थितिलयहेतोर्विश्वस्य ब्रह्माविष्णुरूद्राणाम् मूर्तित्रयं प्रदधते संसारभिदे नमो विभवे ॥1॥ यदुवंशभुवां राज्ञां सैहपुरं राज्यमायुगाद् दधताम। श्रीसेनवर्म्मनामा राजर्षिः प्रक्रमेणासीत् ॥2॥ तनयस्तस्य श्रीमान्नृपतिरभूदार्यवर्मनामैव । आर्यव्रततां प्रथमं ख्यापितवांस्तदनुयंश्चरितैः ॥3॥ श्रीदेववर्मनामा दत्ताभयविभवविजयध्वंसः । भीतार्थिकुलारिभ्यो बभूव तस्यात्मजो नृपतिः ॥4॥ सूनुरभूत् तस्य महान्भूपालः श्रीप्रदीप्तवर्मेति । दर्पान्धशत्रुपृतनापतङ्गपटलीप्रदीप्ताग्निः ॥5॥ श्रीईश्वरवर्मेति सुतस्तस्याभूत् भूपतिः प्रदानेन । ऐश्वर्य यः कृतवान् भव इव निचयेन नार्थानाम् ॥८ ॥ श्रीवृद्धिवर्मसंज्ञस्तस्य वभूवात्मज प्रवृद्धश्रीः । चन्द्र इव तापाहारी नयनानां नन्दनो राजा ॥7 ॥ स्वभुजार्जित सौ (शौ) र्य यशोदानवतामुपरिदृष्टसामर्थ्यः । श्रीसिंहवर्मनामा तत्तनयो राजसिंहोऽभूत् ॥8॥ तस्य सुतोऽभूदाशापूरणकर्ता जनस्य तापच्छित् । श्रीजलनामा नृपतिः कलियुगदावाग्निजलवर्षः ॥ 9 ॥ श्रीयज्ञवर्मनामा तदङ्गजोऽभून्महीपतिर्येन । यज्ञाज्यधूमजलदैर्नियत्केका कृताः शिखिनः ॥10 || पुत्रस्तस्य वभूव श्रीमान्राजर्षिरचलवर्मेति । कृतयुगचरितेष्वचलो यश्च सथैर्यादिगुणसाम्यात् ॥11॥ यः समरे घड्वालाख्यामन्वर्थवर्ती दधार रणरौद्रः । अपरापगणितसंगकरिरदनाग्राड्.ि कलोरस्कः ॥12 ॥ तस्य दिवाकरनामा श्रीमांस्तनयो बभूव नृपतीशः । यस्य दिवाकरताभूत्परतेजोभिभवधर्मेण ॥13॥ वारणविषाणसंकटसंगरबलचारिणः स्मृता यस्य । अकरोदरीनशस्त्त्रान्सपदि महाघङ्गलभटाख्या ||14|| तस्य कनीयान्भ्राता श्रीभास्कर इत्यभून्नृपतिपालः । रिपुघड्. घलामिधानं यो वहदाजौ विजयमन्त्रम ||15|| स्वभुजार्जित पर राज्य द्रविण सदा दान कर्मण: पाणेः । यस्यासीद्वि मुखोऽसी रिपुपृष्ठक्षणनसंस्थितिषु ||16 || येनाभिरूह्य पद्भ्यां पतत्रि गम्यानि शैलदुर्गाणि । आक्रम्य युद्धशौण्डा हस्तिकरं दापिताः क्षितिपाः ॥17॥ तस्य गुणार्जितर्देवीशब्दा श्रीकपिलवर्धनसुताभूत् । राज्ञी प्राणेशा श्रीजयावलीत्येकपत्नीव॥18॥

तस्यास्तनया साध्वी सावित्रीवेश्वरेति नाम्नासीत् । जालन्धरनृपसूनोर्जाया श्रीचन्द्रगुप्तस्य ॥ 19 ॥ भर्तरि गतवति नाकं करिणः स्कन्धाद् भवास्पदमिदं सा । तत्पुण्यायाकारयदाचार्यानुगतमास्थानम् ॥20 ॥ यावन्महीमहीधर जलनिधयो यावदिन्दुरविताराः । तावदिदमस्तु कीर्तिस्थानं श्रीचन्द्रगुप्तस्य ॥21॥ भट्टेक्षेमशिवात्मज भट्टस्कन्दादवाप्तशुभजन्मा। भट्टवसुदेव एनां प्रशस्तिम करोदयोध्येशः ॥22॥ अश्मनीश्वरणागेन नागदत्तस्य सूनुना । आलेखि सूत्रधारेण रौदीतकनिवासिना ॥23॥

हिन्दी अनुवाद- संसार की दृष्टि और प्रलय के कारण भूत ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र इन तीन स्वरूपों को धारण करने वाले संसार का भेदन करके मोक्ष प्रदान करने वाले उस परम सामर्थ्यशाली प्रभु को नमस्कार है।।1।। इस युग के आरम्भ से ही सैंहपुर नामक राज्य को धारण करने वाले यदुवंशी राजाओं में क्रमशः सेनवर्मा नाम का एक राजा हुआ।।2।। उसका पुत्र श्रीमान् आर्य वर्मा नाम का राजा हुआ। वह अपने चरित्र के कारण श्रेष्ठ आचरण रखने वालों के रूप में प्रसिद्ध हुआ।।3।। उसका पुत्र देव वर्मा राजा हुआ, जो डरे हुए, याचकों और शत्रुओं के लिए क्रमशः अभय प्रदान करने वाला, ऐश्वर्य प्रदान करने वाला और जीतकर विनाश करने वाला था।।4।। उसका पुत्र श्री प्रदीप्त वर्मा नाम का महान् राजा हुआ। वह घमण्ड से अंधे शत्रुओं की सेना रूपी पतंगों के समूह को जलती हुई अग्नि के समान जला देता था।।5।। उसका पुत्र श्री ईश्वर वर्मा नाम का हुआ, जो शिव के समान अर्थों के द्वारा ऐश्वर्य का दान करता था।।6।। उसका पुत्र श्री वृद्धि वर्मा नाम का हुआ, उसकी राज्यलक्ष्मी बढ़ी हुई थी, और वह प्रजा के नेत्रों को आनन्दित करने वाला राजा चन्द्रमा के समान सन्ताप का हरण करने वाला था।।7।। उसका पुत्र श्री सिंह वर्मा नाम का हुआ, जो राजाओं में सिंह के समान था, उसने अपनी सामर्थ्य का प्रदर्शन करके अपनी भुजाओं द्वारा अर्जित शौर्य के द्वारा सभी दशस्वी और दानी पुरुषों के ऊपर स्थान प्राप्त किया।।8।। उसका पुत्र श्री जल नाम का राजा हुआ। वह मनुष्यों की आशा को पूरा करता था और सन्ताप को काटता था, तथा कलियुग रूपी जंगल की अग्नि को जल की वर्षा के समान शाक्त करता था।।9।। उसका पुत्र श्री यज्ञ वर्मा नाम का हुआ। वह जब यज्ञ करता था तो हवन के घी के धुएँ को मेघ समझकर मयूर हर्ष ध्वनि करने लगते थे।।10।। उसका पुत्र श्रीमान् अचल वर्मा नाम का राजा हुआ। उसका आचरण सत्य युग के समान था, और वह स्थिरता आदि गुणों की समानता के कारण अचल (पर्वत) ही था।।11।। यह युद्ध क्षेत्र में अपने रौद्र को धारण करने के कारण सार्थक घंघल नाम से भी प्रसिद्ध था, और शत्रुओं को रगड़ देने वाले युद्ध क्षेत्र में हाथियों के दाँतों और सूँड पर भी अपने वक्ष से भिड़ जाता था।।12।। उसका पुत्र श्रीमान् राजाओं का भी राजा दिवाकर वर्मा हुआ। शत्रुओं के तेज को तिरस्कृत करने की विशेषता के कारण उसका दिवाकर कहलाना सार्थक था।।13।। वह महाघंघल योद्धा नाम से भी प्रसिद्ध हुआ, जो हाथियों के दाँतों से भरे युद्ध क्षेत्र में बलपूर्वक विचरण करके शत्रुओं को शीर्ष ही शस्त्र रहित कर देता था।।14।। उसका छोटा भाई श्री भास्कर नाम का राजा हुआ जिसने युद्धक्षेत्र में विजय के मन्त्ररूप रिपुघंघल नाम को धारण किया।।15।। वह अपनी भुजाओं से शत्रुओं के राज्य और धन को जीतकर सदा दान किया करता था, और उसके हाथ का खड्ग शत्रुओं को पीठ पर प्रहार करने में विमुख रहता था।।16।। उसने पक्षियों द्वारा ही गम्य पर्वतों पर बने हुए दुर्गों पर पैदल ही जाकर आक्रमण किया और वहाँ के युद्ध करने में चतुर राजाओं को पराजित करके, कर के रूप में हाथी प्राप्त किये।।17।। श्री कपिलवर्द्धन की पुत्री जयावली उसकी एकमात्र पत्नी, रानी प्राणेश्वरी हुई, जिसने उसके गुणों से देवी पद को प्राप्त किया।।18।। उसकी पुत्री ईश्वरा नाम की हुई, जो जालन्धर के राजा के पुत्र श्री चन्द्रगुप्त की पत्नी बनी। वह सावित्री के समान पतिव्रता थी।।19।।हाथी के कन्धे से गिरकर पति के स्वर्गवास हो जाने पर उसने उनके प्रति पुण्य करने के लिए आचार्यों से अनुगत होकर इस स्थान पर शिव का मंदिर बनवाया।।20।। जब तक पृथ्वी, पर्वत और समुद्र हैं, जब तक चन्द्रमा, सूर्य और तारे हैं, तब तक श्री चन्द्रगुप्त की कीर्ति का यह स्थान विद्यमान रहेगा।।21।। इस क्षेत्र में शिव के पुत्र भट्टवसुदेव ने इस प्रशस्ति को लिखवाया।।22।। रौदीतक के निवासी नामदत्त के पुत्र ईश्वरणाम नाम वाले सूत्रधार ने इस प्रस्तर पर प्रशस्ति को उत्कीर्ण किया।।23।।

दैनिक जागरण के पत्रकार पत्रकार दिनेश कुकरेती लिखते हैं कि लाखामंडल के पुरावशेषों को सबसे पहले वर्ष 1814-15 में जेम्स बेली फ्रेजर प्रकाश में लाए थे। अपनी पुस्तक ‘द हिमालया माउंटेंस’ में उन्होंने इस स्थल पर शिव मंदिर के अलावा पांच पांडवों के मंदिर, महर्षि व्यास व परशुराम का मंदिर, प्राचीन केदार मंदिर और कुछ मूर्तियों का उल्लेख किया है। पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर ज्ञात होता है कि लाखामंडल प्राचीन काल में आबाद रहा है। ग्राम लावड़ी से प्राप्त महापाषाण संस्कृति के अवशेष इस अवधारणा को पुख्ता करते हैं। इस संस्कृति के अवशेष तत्कालीन मृतक संस्कारों पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हैं। इस पद्धति में पत्थरों से निर्मित ताबूत में मृत शरीर अथवा अवशेषों को रखा जाता था।

यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हमारे इतिहास को छिन्न -भिन्न करने के लिए मुग़ल, अंग्रेज और फिर हमारे स्वतंत्र भारत के शासकों ने सनातन हिन्दू परम्पराओं के पदचिह्नओं को मिटाने की भरसक कोशिश की लेकिन जो गलती से उनकी दृष्टि से बच गये उन्होंने उसके स्थान बोध को मिटाने का भरसक प्रयत्न किया है।

यही कारण भी है कि कई इतिहासविद्ध सिंहपुर की ढूंढ को आज भी अज्ञात मानते हैं लेकिन कई लेखकों एवं इतिहासविदों ने अपने जो तर्क दिए हैं उसके आधार पर महाभारत काल से पहले व महाभारत काल में लाखामंडल को ही सिंहपुर कहा गया है।

जाने-माने इतिहासकार डॉ. यशवंत सिंह कटौच इस पर तर्क देते हैं कि ‘महाभारत के अनुसार एक पर्वतीय नगर जिसे उत्तर दिग्विजय के समय त्रिगत, दर्व, अभिसारी, उरगा के साथ पांडव अर्जुन ने विजित किया था वह सिंहपुर ही था (समा. २४.१९.स्वा.भ.)कटोच २४९।’

सिंहपुर राजकुमारी ईश्वरा द्वारा लाखामंडल (मढा) में अपने पति के पुण्य हेतु शिब मंदिर का निर्माण प्राय: सातवीं शती ई. में करवाया गया (कील हाने. जं.रां.ए.सो. २१ पृष्ठ ४५८:बुछलर एपि.ई.१,पृष्ठ १२)

बहुत से लेखकों ने लाखामंडल को कुछ इस तरह परिभाषित किया है कि -लाखामंडल को परिभाषित करने के लिए उसका अगर संधि विच्छेद किया जाय तो वह कुछ इस तरह होगा यानी लाखा= लाख (अनगिनत) मंडल= मंदिर समूह (शिब लिंगों का समूह). इस हिसाब से भी लाखामंडल अपना भूतकाल पेश करता नजर आता है क्योंकि आज भी यह जब भी जहाँ भी खुदाई हुई बेहिसाब शिबलिंग इस धरती पर निकलते रहे।

यहाँ के इस अभिलेख को ज्यादात्तर इतिहासकार छठी एवं सातवीँ सदी का बताते हैं लेकिन कुछ का मानना है कि यहाँ से प्राप्त अभिलेखों में छगलेश एवं राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति में पांचवीँ-छठी सदी का उल्लेख है। एएसआई भी इस बात की प्रमाणिकता पर अपनी मुहर लगाता है। इससे ज्ञात होता है कि इस स्थान के पुरावशेष वर्तमान मंदिर से पूर्वकाल के हैं और मंदिर की प्राचीनता पांचवीं छठी सदी तक जाती है। राजकुमारी ईश्वरा की प्रशस्ति से भी यहां एक शिव मंदिर के निर्माण की पुष्टि होती है। मंदिर परिसर में स्थित दर्जनों पौराणिक लघु शिवालय, एतिहासिक और प्राचीन मूर्तियां पर्यटकों को अपनी ओर खींचती हैं। मंदिर में एक विशाल बरामदा है, जिसके मध्य में एक बड़ा शिवलिंग मंच पर विराजमान है।

डॉ शक्ति प्रसाद सेमल्टी ने भी अपनी पुस्तक “मध्य-हिमालय के संस्कृत अभिलेखों में गढ़वाली भाषा के स्वरुप” के पृष्ठ संख्या 179 से 185 तक इसका उल्लेख किया है।

मैंने स्वयं जौनसार बावर के दिवाली पर्व ‘दियाई’ को रानी लाखामंडल रानी ईश्वरा के इस शिलालेख से जोड़कर उनके पति जालंधर नरेश की मृत्यु को दियाई के हाथी व हिरण नृत्य से जोड़ते हुए उनकी पुत्री बिऊरी का अपनी पुस्तक व हिमालयन डिस्कवर के पूर्ववर्ती लेखों में जिक्र करते हुए इस बात को स्पष्ट करने की भरसक कोशिश की है कि जौनसार क्षेत्र में एक माह बाद क्यों दिवाली मनाई जाती है व अमावस्या की रात्रि मातम मनाने के बाद भिरूडी क्यों फ़ेंकी जाती है।

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