Wednesday, March 11, 2026
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कालागढ़-राम नगर मार्ग…! क्या पहाड़ विरोधी मानसिकता वाले अधिकारियों के कारण झेलनी पड़ी दो साल तक उत्तराखण्ड वासियों को फजीहत।

कोटद्वार/देहरादून 19 दिसम्बर 2020 (हि. डिस्कवर)।

पूरे दो साल 4 माह का समय अधिकारियों की हठधर्मिता के कारण निकल गया क्योंकि न जीएमओ की बसें और न सरकारी वाहन ही इस मार्ग से गुजर पाए। कोरोना लॉकडाउन काल में एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश होकर गुजरने की जितनी फजीहत उत्तराखण्ड वासियों ने झेली वह अलग। जबकि हाई कोर्ट के आदेश में स्पष्ट था कि यह मार्ग सिर्फ निजी वाहनों के लिए उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली व उत्तराखंड के अलग अलग आदेश संख्या में साफ था कि यह मार्ग सिर्फ निजी वाहनों की आवाजाही के लिए बन्द है।

अधिवक्ता एवं समाजसेवी अमित सजवाण ने विगत दिवस वन मंत्री डॉ हरक सिंह रावत के उस बयान का संज्ञान लेते हुए जिसमें यह मार्ग पुनः गढ़वाल मंडल मोटर्स ओनर्स की बसों के लिए खोल देने की बात कही गयी है, का संज्ञान लेते हुए आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि सरकारी सिस्टम की अफसरशाही इतनी हावी है कि उन्होंने पूरे दो साल चार माह तक इस मार्ग पर गढ़वाल मंडल मोटर्स ओनर्स की बस व सरकारी गाड़ियां तक नहीं चलने दी, जबकि माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह रोक सिर्फ निजी वाहनों के संचालन पर लगाई थी।

अमित सजवाण ने मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक जे एस सुुहॉग के दिनांक 18 दिसंबर 2020 के पत्र हवाला देते हुए कहा है कि यह पत्र उत्तराखंड की जनता के लिए कई सवाल छोड़ जाता है? क्योंकि जब माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल ने अपने आदेश में कालागढ़ व रामनगर के मध्य 16 अगस्त 2018 के आदेश से केवल निजी वाहनों के संचालन पर रोक लगाई थी तो सार्वजनिक वाहनों का संचालन 2 साल 4 माह तक किस अधिकारी के आदेश से क्यों रोका गया? उन्होंने साथ ही प्रश्न भी खड़ा किया कि आखिर निजी वाहनों पर ही रोक क्यों? जनहित में इस कोविड काल में वह भी हटा दी जानी चाहिए व इस सम्बंध में वन विभाग उत्तराखण्ड की ओर से एक जनहित याचिका भी माननीय न्यायालय में दाखिल होनी चाहिए।

उन्होंने प्रश्न उठाते हुए कहा कि माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेश पर जब माननीय उच्चतम न्यायालय ने 8 अक्टूबर 2018 व 29 जनवरी 2019 को रोक लगा दी है तो अभी तक इस मार्ग पर सार्वजनिक वाहनों को संचालित करने से क्यों रोका गया और निजी वाहनों को जाने से क्यों रोका जा रहा है ?

अधिवक्ता अमित सजवाण के तर्कों जनता के हितों की आवाज उठाते हुए प्रश्न किया कि वन विभाग के अपने उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय में पैनल अधिवक्ता जो भी हैं, क्या उनका कर्तब्य नहीं बनता था कि वे न्यायालय का आदेश अपने विभाग के समझाएं,  जो पहाड़ विरोधी मानसिकता लिए हुए बैठे उत्तराखंड के वन्य अधिकारी जानबूझकर उत्तराखंड की जनता को परेशान करने के लिए न्यायालय के आदेशों की आड़ में उत्तराखंड की जनता के पारंपरिक मार्गों पर आवाजाही से रोक लगा रहे हैं ?

उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के दौरान जब इस मार्ग की प्रदेश के अंदर आवाजाही के लिए अत्यंत तीव्र आवश्यकता थी तब भी न्यायालय के आदेशों की आड़ में इस मार्ग से वाहनों को संचालित करने की अनुमति नहीं दी गई, जबकि उस दौर में गढ़वाल कुमाऊं का हर निवासी दूसरे प्रदेश उत्तर प्रदेश के मार्ग से गुजरने की बहुत सारी औपचारिकताएँ पूरी कर अपना कीमती समय व मानसिक संतुलन बिगाड़ने में लगा हुआ था।

उन्होंने कहा है कि सुहाग जैसे वन्यजीव प्रतिपालक इस प्रदेश में होने चाहिए जिन्होंने माननीय न्यायालय के आदेश को अक्षरत: पढ़ते हुवे उसका संज्ञान लेते हुए जनता का हित देखकर  निदेशक टाइगर रिजर्व रामनगर को निर्देश दिया है कि पाखरौ-मोरघाटी-कालागढ़-राम नगर वन मोटर मार्ग जनहित में खोल दिया जाय। उन्होंने वन मंत्री डॉ हरक सिंह रावत के प्रयासों की भी सराहना की और साथ ही कहा कि वन मंत्री को माननीय उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली व माननीय उच्च न्यायालय नैनीताल के आदेशों का पूर्व में ही अवलोकन कर लेना चाहिए था।

अमित सजवाण ने कहा कि 2 साल 4 माह तक मानसिक पीड़ा झेल रहे गढ-कुमाऊं के लोगों का क्या सरकार सन्दर्भ लेकर ऐसे पहाड़ विरोधी मानसिकता वाले निरंकुश अधिकारियों के खिलाफ क्या कार्रवाई करने जा रही है, जिन्होंने पूरा वन मंत्रालय को ही अंधेरे में रखा । और यदि ऐसे पहाड़ विरोधी मानसिकता वाले अधिकारियों पर सचमुच कार्यवाही हो रही है तो यह सार्वजनिक होनी चाहिए।

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