Wednesday, June 26, 2024
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नुपुर शर्मा प्रकरण पर बोले जस्टिस ढींगरा -सुप्रीम कोर्ट को इस तरह की टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय भी कानून से ऊपर नहीं है।

  • जस्टिस ढींगरा ने कहा कि इससे नूपुर के खिलाफ सभी अदालतें पूर्वाग्रहित हो सकती हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने नूपुर शर्मा की याचिका नामंजूर करते हुए बेहद कड़ी टिप्पणी की थी।
  • नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट का ऑब्जर्वेशन ‘गैरजिम्मेदाराना’, ‘गैरकानूनी’ और ‘अनुचितहै।’

नई दिल्ली (हि.डिस्कवर एक्सक्लुसिव)

नुपुर शर्मा प्रकरण में सोशल प्लेटफार्म पर अपने मौखिक आदेशों के कारण लोगों की तल्ख़  टिप्पणियों का सामना कर रहे सुप्रीम कोर्ट के जज सूर्यकांत व राजस्थान हाई कोर्ट के जज जे बी पारदीवाला की वर्तमान स्थिति थूको तो दूध है व घूंटो तो गला जलता है वाली हो रखी है। यही कारण भी है कि आज एक कार्यक्रम में जज जे बी पारदीवाला बोल ही पड़े कि “संसद क़ो सोशल मीडिया पर नियंत्रण के बारे में सोचना चाहिए।” उनके इस बयान ने आग में घी का काम किया और  इसके बाद उन्हें सोशल  मीडिया पर और ज्यादा गुस्से का सामना करना पड़ा है। यही होता तब भी चलता लेकिन हाईकोर्ट के पूर्व जज एस एन ढींगरा ने तो बखिया ही उखेड  दी। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा ‘नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट का ऑब्जर्वेशन ‘गैरजिम्मेदाराना’, ‘गैरकानूनी’ और ‘अनुचित’ है।’

भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा पर सुप्रीम कोर्ट की एकतरफा तल्ख टिप्पणियों को गैर जिम्मेदाराना और गैरकानूनी बताते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) एसएन ढींगरा ने अहम सवाल खड़े किए हैं।
देश में होने वाली घटनाओं के लिए नूपुर शर्मा को जिम्मेदार ठहराने की शीर्ष अदालत की टिप्पणी पर न्यायमूर्ति ढींगरा ने कहा कि यह कैसे साबित होगा कि उदयपुर की घटना नूपुर शर्मा के कारण हुई है? बिना किसी जांच या गवाहों और नूपुर शर्मा की दलीलें सुने बगैर इस तरह का अवलोकन करना न केवल अवैध है, बल्कि अनुचित भी है।

ढींगरा ने कहा कि इन टिप्पणियों ने सभी अधीनस्थ अदालतों में नूपुर शर्मा के मामले को पूर्वाग्रहित किया है। डरा धमकाकर याचिका वापस करा दी गई और अब किसी भी निचली अदालत की हिम्मत नहीं होगी कि वह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के खिलाफ कुछ करे।उ

न्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट खुद अपने निर्णय में सुझाव दे चुका है कि न्यायाधीशों को अनुचित टिप्पणी करने से बचना चाहिए और संबंधित मामले पर सुनवाई करनी चाहिए।

टिप्पणी करनी ही थी तो लिखित में करते ताकि इसके खिलाफ उच्च पीठ में जाया जा सके। ढींगरा ने सवाल उठाया कि शीर्ष अदालत ने अपने निर्णय में इन टिप्पणियों का जिक्र क्यों नहीं किया?

सुप्रीम कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है इस तरह की टिप्पणी करने का।
इंडिया टीवी के एक सवाल पर जस्टिस ढींगरा ने कहा, ‘मेरे हिसाब से यह टिप्पणी अपने आप में बहुत गैर-जिम्मेदाराना है। सुप्रीम कोर्ट को कोई अधिकार नहीं है कि वह इस प्रकार की कोई टिप्पणी करे जिससे जो व्यक्ति उससे न्याय मांगने आया है उसका पूरा करियर चौपट हो जाए या उसके खिलाफ सभी अदालतें पूर्वाग्रहित हो जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने एक प्रकार से नूपुर शर्मा को बिना सुने उनके ऊपर चार्ज भी लगा दिया और फैसला भी दे दिया। न तो गवाही हुई, न जांच हुई और न ही उन्हें कोई मौका दिया कि वह अपनी सफाई पेश कर सकें।’

‘सर्वोच्च न्यायालय भी कानून से ऊपर नहीं है’
यह पूछे जाने पर कि सुप्रीम कोर्ट के ऑब्जर्वेशन पर सवाल उठ रहे हैं, जस्टिस ढींगरा ने कहा, ‘सर्वोच्च न्यायालय भी कानून से ऊपर नहीं है। कानून यह कहता है कि यदि किसी शख्स को आप दोषी ठहराना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले उसके ऊपर चार्ज फ्रेम करना होगा, इसके बाद प्रॉसिक्यूशन अपने साक्ष्य प्रस्तुत करेगी, इसके बाद उसे मौका मिलेगा कि वह उन साक्ष्यों के ऊपर अपना बयान दे। उसके बाद उसे अपने गवाह पेश करने का मौका मिलता है। उसके बाद अदालत का कर्तव्य है कि वह सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखकर अपना फैसला दे।’

मैं तो इन न्यायाधीश को अदालत में।

एसएन ढींगरा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी कानून से ऊपर नहीं है। कानून कहता है कि किसी को आप दोषी ठहराना चाहते हैं तो पहले आपको आरोप तय करने होंगे। अभियोजन और प्रतिवादी दोनों को अपनी बात रखने की अनुमति देनी होगी। मामले से जुड़े साक्ष्य और गवाह प्रस्तुत करने का मौका देना होगा। इसके बाद अदालत सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखकर अपना निर्णय देगी।

यहां तो दुष्कर्म और जान से मारने की मिल रही धमकियों को देखते हुए नूपुर शर्मा विभिन्न राज्यों में दर्ज मामले स्थानांतरित करवाने की मांग को लेकर गईं थीं, लेकिन शीर्ष अदालत ने नूपुर शर्मा के बयान पर स्वत: संज्ञान ले लिया कि बयान जनता को भड़काने वाला था।

ढींगरा ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को यह कहा जाए कि आप अदालत में आकर गवाही दीजिए कि यह बयान कैसे भड़काने वाला था तो इन न्यायाधीश को अदालत में पेश होना पड़ेगा। अगर मैं निचली अदालत का जज होता तो इन न्यायाधीश को बुलाता और कहता गवाही दीजिए। पूछता कि नूपुर शर्मा का बयान कैसे भड़काने वाला था।

क्या है पूरा मामला

नूपुर शर्मा की याचिका पर एक जुलाई को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति सूर्यकांत और जेबी परदीवाला की अवकाशकालीन पीठ ने विचार करने से इन्कार करते हुए तल्ख टिप्प्णी की थी। अदालत ने कहा था कि देश में हो रही घटनाओं के लिए नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं और उन्हें देश से माफी मांगनी चाहिए।

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