Wednesday, June 19, 2024
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झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, छाना बिलौरी में लागनी घामा…! एक गीत की पटकथा

झन दिया बौज्यू ... कारुणिक गीत व्याख्यान में डूबे एक बेटी के न्योली बोल।

  • झन दिया बौज्यू … कारुणिक गीत व्याख्यान में डूबे एक बेटी के न्योली बोल।

(मनोज इष्टवाल)

जब भी जहां भी पहाड़ की बात होगी वहां दो बातें आम सी नजर आएंगी एक बहुत ही कारुणिक धुन में सजी बांसुरी की भौण तो दूसरी दर्द व दुःखों के बखान को कारुणिक स्वर देती मातृशक्ति के वह तन्मयता पूर्ण बोल जो वह घास, लकड़ी काटते अपने अकेलेपन को भुलाते अतीत व वर्तमान का मिश्रण कर हृदय के उदगारों की अभिव्यक्ति को साझा करने का माध्यम बनते हैं।

गढ़ कुमाऊं में इन खुदेड गीतों को गढ़वाल मंडल में मूलतः झुमैलो तो कुमाऊँ मंडल में न्योली के रूप में देखा व सुना समझा जाता है। आज ऐसे ही एक कर्णप्रिय लोकगीत “छाना बिलौरी” को जब आप संगीत में ढलकर दीप चंदी ताल में न्योली के आवरण में सजाकर सुनेंगे तो बोल समझ न भी आएं लेकिन आप ठेठ उस लोक की कल्पना में खोकर अवश्य कह पाएंगे कि आह…कितना दर्द समाया है इन पंक्तियों में। लेकिन जब यही गीत अपभ्रंश होकर दादरा ताल में आपके सम्मुख आता है तब आप उस पर मनोरंजन तो कर सकते हैं लेकिन उसकी आत्मा को नहीं छू सकते क्योंकि उसकी आत्मा में तो कुमाऊँ की न्योली समाई हुई है।

छाना बिलौरी झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, लगला बिलौरी को घामा…।

(आकाशवाणी लखनऊ के लिए गाया गया श्रीमती बीना तिवारी का ओरिजिनल ट्रेक गीत- छाना बिलौरी)

नामक गीत के मुखड़े यानी स्थायी को सुनते ही आप समझ जाएंगे कि इस गीत के करुणामय बोलों में कितना दर्द छुपा है। गीत के बोलों में एक बेटी अपने प्रलाप का विलाप करती हुई अपनी रोजमर्रा की सहेली कुटली (कुदाल) दातुलि (दराँती) व नाथुली की बात करती हुई कहती है कि वह छाना-बिलौरी गांव नहीं जाना चाहती है क्योंकि वहां उसे तेज धूप लगती है

( फ़ाइल फ़ोटो- सुप्रसिद्ध लोकगायिका बीना तिवारी)

लोकगायिका बीना तिवारी ने यह 1963 में आकाशवाणी में जब गाया था तब इसको इतनी प्रसिद्धि नहीं मिली थी, ऐसे कई कुमाऊँनी गीत संगीत के शौकीन लोगों का मानना है लेकिन जब यह गीत गोपाल बाबू गोस्वामी ने प्रस्तिप्रद्धा के रूप में दूसरे शब्दों में पिरोया व उसके साथ साथ बांसुरी वादक प्रताप सिंह व सुप्रसिद्ध लोकगायक मोहन सिंह रीठागाड़ी के सुर में लोगों के बीच आया तब सबको लगा कि लोकगायिका बीना तिवारी ने गीत को उसकी आत्मा में जाकर गाया है।

लोकसमाज में व्याप्त कहानी के अनुसार जहां एक वर्ग कहता कि वह लड़की छाना-बिलौरी में तेज धूप लगती है का बहाना करके अपने ही मायके रहना पसंद करती है वहीं दूसरा पक्ष यह भी कहना है कि यह बेटी अपने मायके वालों का इंतजार करती है व कल्पना लोक में जाकर बीमार होकर यह गीत गाती है कि छाना-बिलौरी की धूप से वह बीमार पड़ गयी है वह अब यहाँ रहना नहीं चाहती। वहीं तीसरा पक्ष मानता है कि लड़की कहती है कि मेरी शादी मैदानी क्षेत्र/नदी घाटी क्षेत्र, छाना-बिलौरी मत करना क्योंकि वहां की धूप असहनीय है। मुझे तो अपने ही पहाड़ पसन्द हैं।

यहां के आम जनमानस का मानना है कि यह गीत 75 से 80 बर्ष पुराना कहा जा सकता है क्योंकि अगर नया होता तो लोगों को छाना-बिलौरी के साथ साथ उसके मायके व माँ बाप के बारे में अवश्य पाता होता। इस गीत को सर्वप्रथम लोकगायिका श्रीमती बीना तिवारी ने स्वरबद्ध कर ऑडियो के माध्यम से ठेठ न्यौली के ठेठ पहाड़ी अंदाज में गाकर इसकी आत्मा के साथ पूरा इंसाफ किया। लोकगायिका बीना तिवारी की आवाज में जो छड़, कण, मुर्की लगी उसने उस लड़की की आत्मा को जीवंत कर दिया जिसने यकीनन इस गीत को पहली बार अपने दर्द के साथ जन्म दिया है। तदोपरान्त सुप्रसिद्ध लोकगायक गोपाल बाबू गोस्वामी ने इस गीत में घालमेल कर इसके विरह पक्ष को समाप्त कर छाना-बिलौरी की असहनीय धूप में नारी के प्रलाप का अंत कर इन गांवों के प्रशंसा के कसीदे पढ़ दिए। शायद इसीलिये इस गीत की लोकप्रियता में बिना तिवारी बाजी मार गयी और गोपाल बाबू गोस्वामी जैसे लोकगायक में प्रयोग हल्के नजर आए। शायद गोपाल बाबू गोस्वामी ने इन गांवों की भौगोलिकता व सम्पन्नता के आधार पर अपने बालों में इस गीत की प्रशंसा की है।

(गोपाल बाबू गोस्वामी का अमेंडमेंट किया गया गीत-छाना बिलौरी उन्ही की आवाज में)

झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, छाना बिलौरी में लागनी घामा.. गीत बीना तिवारी से लेकर वर्तमान तक सैकड़ों आवाजों में आये दिन सजता रहता है। 2018 में वर्तमान के सुप्रसिद्ध गायक पवनदीप राज ने इसे गौचर मेले में गाया तो यह गीत कुमाऊं से चलकर गढ़वाल में भी वर्तमान पीढ़ी के नवयुवकों/युवतियों के बीच काफी पसंद किया जाने लगा।

वहीं बॉलीवुड में असमिया गायक पपोन जिन्होंने ‘लकीरें’ गीत गाकर बहुत प्रसिद्धि बटोरी, एक टीवी चैनल व नार्थ ईस्ट फेस्टिवल में नार्थ व ईस्ट को मिक्स कर दो संस्कृतियों के बोलों का मिक्सर कर जब कुमाऊँनी में “झन दिया बौजु छाना बिलौरी, छाना बिलौरी को घामा” गाते हैं तो यक़ीनन इस जादुई आवाज में यह ज्यादा ही कर्णप्रिय लगता है। उन्होंने बताया कि वे कुमाऊँ होली पर गए थे व उन्होंने जब लोक की यह आवाज सुनी तो उन्हें लगा कि असम के बोडो क्षेत्र की धुन व इसकी धुन काफी मिलती जुलती है, इसीलिए उन्होंने नार्थ व ईस्ट की धुन व बोल मैसअप कर दिये जो यकीनन लोकप्रिय हो गए।

कहाँ है छाना-बिलौरी गांव?

अल्मोड़ा -बागेश्वर सड़क मार्ग में काफलिगैर (झिरौली) एक छोटा सा बाजार है जो आस पास के गांवों की दैनिक दिनचर्या का माध्यम है। जिला बागेश्वर में स्थित छाना और बिलौरी दो अलग अलग गांव हैं जो काफलीगैर से लगभग एक किमी की दूरी पर बसे हुए हैं। सात सौ परिवार वाले इस गांव की आबादी ढाई हजार के करीब है। गांव में सड़क, बिजली और पानी की सुविधा है। आठवीं तक स्कूल भी आंगन में है और डेढ़ किमी पर इंटर कालेज। पास में काफलीगैर बाजार है, यहीं सरकारी अस्पताल और झिरोली मैग्नेसाइट फैक्ट्री भी है। इस फैक्ट्री से गांव के लगभग 80 लोगों को रोजगार भी मिला है। यहां पहाड़ के अन्य गांवों का जैसा पलायन भी नहीं है। सिंचाईं के लिए नहर होने से खेती भी अच्छी होती है।

(पवनदीप राजन की आवाज में कुछ यूं सजा ये गीत -छाना बिलौरी)

कहाँ से उपजा यह गीत।

यहां के लोगों का मानना है कि एक लड़की जिसका मायका जनपद बागेश्वर के काँडा क्षेत्र के ठंडे इलाके में था, जिसकी शादी घाटी में स्थित छाना या बिलौरी गांव में से एक में हो जाती है। उसका वहां रहने  का मन नहीं करता और अपने मायके आकर अपने पिताजी को कहती है कि वहां बहुत गर्म है इसलिए मैं वहां नहीं जाना चाहती और मायके में ही रहने लगती है। वहीं कुछ लोगों की अवधारणा है कि 75-80 बर्ष पूर्व की बात को यथावत कह पाना कठिन है लेकिन यह कहा जा सकता है कि कोई भी गीत तब न्यौली बनकर तब भावुकता बढ़ाते हैं जब उसमें कुछ अहित हुआ है। इसलिए हमारा मानना तो यह है कि वह बेटी अपनी ससुराल में ही है और वहीं कभी खेत में कुदाल से काम करती हुई अपनी भावनाओं को अभिब्यक्त करती है तो कभी जंगल में दराँती लिये घास काटती हुई कहती है कि छाना-बिलौरी की धूप उसके लिए असहनीय है और वह यहां बीमार ही रहती है इसलिए वह मायके बुला लीजिये मैं ससुराल नहीं रहना चाहती।

यहां दूसरा तर्क  यकीनन ज्यादा दमदार इसलिए लगता है क्योंकि गढ़वाल में भी झुमैलो  या खुदेड गीत जितने भी गायक में आज लोकगीत की शक्ल में हमारे सामने आए हैं वे लगभग एक सदी या 50 बर्ष पूर्व के हैं व उन में भी मातृशक्ति के विरह बोल जितने भी हैं वह विपदाओं में उपजे बेटियों के कंठों की स्वरलहरी हैं और सभी ससुराल से ही अपने मायके की ख़ुद में गाये गए गीत हैं।

झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी, छाना बिलौरी में लागनी घामा..नामक गीत मेरी नजर में भी इसीलिए प्रसिद्ध हुआ होगा क्योंकि अपनी ससुराल में वह बेटी सचमुच बेहद असहय पीडा महसूस करती रही होगी। जैसा कि आमजन का मानना ही है कि उसकी सासू माँ का व्यवहार उसके प्रति बेहद कठोर था। उस काल में ज्यादात्तर बेटियों की शादी के बाद उसकी ससुराल ही उसका सब कुछ हुआ करता था व गरीब माँ बाप उसे मायके इसलिए नहीं बुला पाते थे क्योंकि ससुराल भेजने के लिए उनके पास बेटी को देने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होते थे। उस गीत का एक पक्ष यह भी हो सकता है कि वह बेटी बीमारी में इतनी असहाय हो गयी थी कि न हाथ की दराँती सम्भाल सकने की उसमें हिम्मत थी और न कुदाल या फिर नाक की नथ ही…और जब तक उसके पिता उसकी ख़बरसार करने पहुंचे तब तक बहुत देर हो चुकी रही होगी। क्योंकि ऐसे गीत जन्म ही तब लेते है जब व्यक्ति का अस्तित्व ही नहीं बचा रहता। सुप्रसिद्ध गायिका बीना तिवारी ने  गीत के बोल कुछ इस तरह हैं-

झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी
लागला बिलौरी का घामाs।
हाथै कि कुटली हाथै में रौली
नाकै की नथुली नाके में रौली
लागला बिलौरी का घामाs।
बिलौरी का धारा रौतेला रौनी
लागला बिलौरी का घामा।
न्हे ज्यूला बौज्यू छाना बिलौरी
लागला बिलौरी का घामाs।
आसीस देयां भिटणे रैय्यां
लागला बिलौरी का घामा।।

इसी गीत के बोलों में हल्का सा अंतर कुछ इस तरह दिखने को भी मिलता है।

झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी
लागनी बिलौरी का घामा ।
छाना बिलौरी का घामा हो बौज्यू
छाना बिलौरी का घामा ।
हाथै कि कुटली हाथै में रौली –
तल्ला बिलौरी का घामा ।
छाना बिलौरी का घामा हो बौज्यू
छाना बिलौरी का घामा ।
हाथै कि दातुलि हाथै में रौली
तल्ला बिलौरी का घामा ।
झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी
लागनी बिलौरी का घामा ।
नाखै कि नथुली नाखै में रौली
तल्ला बिलौरी का घामा ।
छाना बिलौरी का घामा हो बौज्यू
छाना बिलौरी का घामा ।
झन दिया बौज्यू छाना बिलौरी
लागनी बिलौरी का घामा ॥

बहरहाल इस गीत के बोलों ने जरूर समीक्षकों को उलझाए रखा है क्योंकि बोलों के आधार पर तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस गीत में नायिका अपने पिताजी से कह रही है कि उसे छाना-बिलौरी मत ब्याहना वहां बहुत तेज धूप है उस धूप को मैं सहन नहीं कर सकती। मैं मर जाऊंगी। वहीं इसके रूप श्रृंगार में एक बहु का स्वरूप साफ साफ झलकता है जिसमें वह कुदाल, दरांती व नथ की बात कर रही है। मूलतः यह सभी वस्तुवें एक ग्रहणी के  रूपश्रृंगार में ही शामिल होती हैं। नथ कुंवारी लड़कियों का श्रृंगार कभी नहीं रहा।

छाना-बिलौरी… कुमाऊं मंडल एक ऐसा लोकगीत । जिसकी कहीं आत्मा जिंदा है तो कहीं मार दी गयी। आये दिन गायकों ने जिस तरह इसके साथ खिलवाड़ किया वह आसहनीय दर्द से कम नहीं है। इसे गायिका माया उपाध्याय ने जब गाया तो उसके फिल्मांकन से लगा मानो बाप-बेटी की चुहल चल रही हो। ऐसे ही लगभग दर्जन भर गायकों ने इसे अपने -अपने अंदाज में गाकर सचमुच इस गीत के साथ बड़ा खिलवाड़ किया है जबकि असमिया गायक इसे ठेठ इसकी लोकधुन पर सजा सँवारकर प्रस्तुत करते दिखाई दिए। आपको बता दें कि इस गीत की लोकधुन कुमाऊं रेजिमेंट भी अपने बैंड में बजाता है। व इसे कुमाऊं रेजिमेंट का बैंड राजपथ पर 26 जनवरी की परेड में बजाता दिखाई दिया है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह गीत लोकप्रियता के हिसाब से कितना लोकप्रिय होगा।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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