Saturday, April 13, 2024
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फसलों में मल्चिंग(पलवार) से लाभ एवं प्रयोग।

मल्चिंग(पलवार) से लाभ एवं प्रयोग।

डा० राजेन्द्र कुकसाल।

परंपरागत रूप से प्राकृतिक मल्व (पलवार) का प्रयोग फसलों में किया जाता रहा है तथा इसके लाभ से कृषक भली-भांति अवगत हैं। प्राकृतिक साधनों की कमी तथा उसकी उपयोगिता में अनेक प्रकार की कमियों के कारण पौलीथीन मल्च की उपयोगिता बड रही हैं।

मल्चिग का तात्पर्य उस क्रिया से है जिसके अन्तर्गत पौधे के जड़ के चारों ओर की भूमि को इस प्रकार ढका जाये कि पौधे के पास की भूमि में पर्याप्त मात्रा में नमी काफी समय तक संरक्षित रहे, खरपतवार नहीं उगे एवं पौधों के थावलों का तापमान सामान्य बना रहे।

मल्चिंग मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:-
1.प्राकृतिक मल्चिंग ।

2.प्लास्टिक मल्चिंग।

प्राकृतिक (जीवांश) मल्चिंग में मुख्यतया प्राकृतिक सामग्री जैसे फसलों के अवशेष, जैसे मक्का, गेहूँ, धान से प्राप्त डण्डे, पत्ते, भूसा एवं पुआल इत्यादि ,लकड़ी का छिलका एवं बुरादा, पेड़ों के पत्ते, चीड़ एवं देवदार के नुकीले पत्ते, घासपात गोबर एवं कम्पोस्ट इत्यादि से मल्चिंग । प्राकृतिक मल्च समय के साथ विघटित होते रहते हैं तथा कुछ समय पश्चात् यदि इन्हें ऐसे ही मिट्टी की सतह पर रहने दिया जाये तो ये पूर्ण विघटन के बाद मिट्टी में पोषक तत्वों को बढ़ाते हैं साथ ही केंचुओं के लिए सूक्ष्म वातावरण Micro Climate भी बनाते हैं जिससे भूमि में केंचुओं की सक्रियता बढ़ने से भूमि की उर्वरा शक्ति बडती है।

प्लास्टिक मल्चिंग पैदावार बढ़ाने, नमी बनाए रखने एवं खरपतवार की वृद्धि रोकने का सबसे आसान तरीका है। प्लास्टिक मल्च विभिन्न रंगों एवं मोटाई में उपलब्ध है तथा इसे बड़े पैमाने पर मल्चिंग हेतु उपयोग में लाया जा रहा है।

प्लास्टिक मल्चिंग का लाभ

1.नमी के संरक्षण के लिए।

2.खरपतवार की वृद्धि रोकने के लिए।

3.पानी की बचत के लिए।

4.मृदा के तापमान को नियंत्रित करने के लिए।

5.पौधे के वृद्धि एवं विकास हेतु अनुकूल वातावरण प्रदान करने के लिए।

6.जड़ के बेहतर विकास के लिए।

7.भूमि को कठोर होने से बचाने के लिए।

8.शीघ्र बीज अंकुरण के लिए।

9.कीट ब्याधि से रोकथाम एवं उपज बढ़ाने के लिए।

10.उत्पाद गुणवत्ता में सुधार के लिए।

11.शुष्क भूमि में खेती को प्रभावशाली बनाने के लिए।

प्लास्टिक मल्च के प्रकार-

रंग एवं मोटाई के उचित चुनाव से मृदा के लिए वातावरण को नियंत्रित किया जा सकता है। प्लास्टिक मल्च विभिन्न रंगों में उपलब्ध होती है। मल्च का रंग फसलों की उत्पादकता के लिए महत्वपूर्ण कार्य करता है। यह निश्चित रूप से इसलिए होता है. क्योकि विभिन्न रंग विभिन्न प्रकाश के किरणों को परावर्तित करता है।

काला
यह व्यवसायिक उद्यानिकी में खरपतवार नियंत्रण के लिए उपयोग होने वाला प्रचलित रंग है। इस रंग का मल्च सूर्य की किरणों को अवशोषित करने के साथ दृश्य इंफ्रारेड, पराबैंगनी प्रकाश को अवशोषित करता है। उष्मीय उर्जा का अधिक उत्सर्जन वायुमंडल में संवहन एवं विकीर्णन द्वारा होता है। मृदा की उष्णता उपयुक्त स्तर पर रहती है। मल्च फिल्म सूर्य प्रकाश को मृदा में प्रवेश नहीं करने देता है. जिससे खरपतवारों की प्रकाश संश्लेषण नहीं हो पाता है तथा उसकी वृद्धि फिल्म के नीचे ही रूक जाती है।

नीला

नीले रंग की मल्व में काले मल्च की तुलना में कद्दूवर्गीय सब्जियों में फलों की अधिक संख्या प्राप्त होती है। नीले रंग की मल्च से माहू एवं थ्रिप्स का प्रकोप फसलों पर कम होता है।

पारदर्शी

यह बहुत कम सूर्य किरणों को अवशोषित करती है। पानी की बूदें संघनित होकर मल्च के अंदर रहती है तथा गर्मी /उष्णता बाहर नहीं जा पाती है। यह फिल्म सूर्य किरणों को अंदर जाने देती है जिससे खरपतवार की वृद्धि इसमें मुख्य समस्या होती है।पारदर्शी प्लास्टिक मल्च मृदा सौर्य उपचार के लिए उपयोग किया जाता है। मृदाजनित रोगों को नष्ट करने के लिए अच्छी मात्रा में नमी संघटक का होने से उष्मीय संवहन एवं ढन्डी के मौसम में ठण्डी जलवायु में तापमान बढ़ाने के लिए मृदा में प्रभावशील होता है।

सफेद / काली
मृदा के तापमान को कम करने के लिए सफेद मल्च का उपयोग किया जाता है यह प्रकाश को वापस परावर्तित करता है। यह फसल को ग्रीष्म ऋतु में वृद्धि करने में मदद करता है तथा फसल को कम तापमान से ठण्डक मिलती है। मल्च का सफेद रंग उपरी सतह पर एवं काला रंग आंतरिक सतह पर फसल की उपज को बढ़ाता है क्योंकि काला रंग खरपतवार की संख्या को कम करता है तथा सफेद प्रकाश को परावर्तित करता है।

सिल्वर/काला –
यह मल्च सामान्यतः मृदा को ठण्डक देने में मदद करता है लेकिन सफेद /काली फिल्म में इतना विस्तार नही होता है। यह मल्च रसचूसक कीटों जैसे माहूआदि को हटाने के लिए लाभदायक होता है, जो की विभिन्न वायरस जनित बीमारियों को फैलाने में माध्यम का कार्य करते हैं। इस मल्च के द्वारा केनॉपी से प्रकाश को वापस परावर्तित करने से यह ग्रीष्म ऋतु में फसल को तेज प्रकाश के घातक प्रभाव से बचाता है।

लाल/काला

यह मल्व अंशतः पारदर्शी होती है जो विकिरणों को इससे होकर जाने देती है एवं मृदा को गर्म बनाती है। लाल एवं इंफ्रारेड विकिरणों को बदलकर पौधों के छत्र से वापस परावर्तित करता है। यह सब्जी, फूलों के पौधों में विकास एवं उपापचय द्वारा जल्दी फलन एवं कुछ फलों एवं सब्जियों में उपज बढ़ाने में सहायक है। लाल मल्च में यह देखा गया है कि इससे टमाटर की गुणात्मक एवं मात्रात्मक उपज में वृद्धि होती है तथा इससे टमाटर में अगेती अंगमारी होने की संभावना भी कम हो जाती है। लाल मल्च में यह भी देखा गया है की यह निश्चित रूप से मृदा के तापमान को बढ़ा देता है। इससे स्ट्राबेरी एवं खरबूजा की उपज में वृद्धि होती है।

पीला/ भूरा
यह मल्च रसचूसक कीटों जैसे माहू को आकर्षित करता है, यह मल्च विभिन्न विकिरणों को पौध वितान (केनोपी) से वापस परावर्तित करने का कार्य करता है जिससे प्रकाश संश्लेषण प्रभावित होता है। मल्च की संगतता के बीच में पीले/भूरे मल्च की संगतता सही पाई गई है। भूरा रंग काले मल्च के संगतता सही पाई गई है।भूरा रंग काले मल्च के समान कार्य करता है यह खरपतवार संख्या को कम करने का कार्य करता है।

मल्च का चुनाव

मल्च का चुनाव विभिन्न प्रकार की पारिस्थितिक स्थितियों पर निर्भर करता है ।
बागवानी एवं वृक्ष वाली फसलों में -मोटी मल्च (अधिक माइक्रोन वाली), मृदा सौर्यीकरण -पतली पारदर्शी मल्च,
खरपतवार नियंत्रण -काली मल्च,
ग्रीष्मकालीन फसलों के लिए -सफेद मल्च, कीटों से बचाव हेतु चमकीली मल्च।

मल्च फिल्म की मोटाई

प्लास्टिक मल्चिंग में मल्च फिल्म की मोटाई फसलों की उम्र एवं उनके प्रकार के अनुसार निश्चित करना चाहिए। मल्च फिल्म की मोटाई के लिए यह सुझाव दिया जाता है कि कम से कम जितना संभव हो इच्छित जीवन काल एवं मजबूती की होनी चाहिए। विभिन्न फसलों के लिए मल्चिंग फिल्म की मोटाई –

विभिन्न फसलों हेतु प्लास्टिक मल्च फिल्म की मोटाई ,एक वर्षीय फ़सल हेतु 25 माइक्रान 100गेज ,द्विबर्षी फसल हेतु 50माइक्रौन 200 गेज, बहुवर्षीय फसल हेतु 100माइक्रौन 400 गेज।

सब्जी वाली फसलों में प्लास्टिक मल्च को लगाने की विधि:-

सब्जियों वाली फसलों की खेती में मुख्यतः 25-30 माइक्रॉन पराबैंगनी अवरोध प्लास्टिक मल्च फिल्म का उपयोग किया जाता है। मल्च फिल्म श्रमिको द्वारा हाथों से लगाई जाती है। ऊंची उठी हुई क्यारियों बनाकर मिट्टी को भुरभूरा तथा पत्थर के टुकड़े आदि साफ करना चाहिए। मिट्टी चढ़ाने में दोनों साइड एक जैसी बराबर रखें।

खेत में प्लास्टिक मल्चिंग करते समय सावधानियाँ।

1. प्लास्टिक फिल्म हमेशा सुबह या शाम के समय लगानी चाहिए।

2. फिल्म में ज्यादा तनाव नही रखना चाहिए।

3. फिल्म में जो भी सल/ सिलबट हो उसे निकालने के बाद ही मिट्टी चढ़ाएँ।

4.फिल्म के किनारों को सही तरह से मिट्टी में दबा देना चाहिए जिससे वह हवा से इधर उधर न उड़ सके। ध्यान रहे मल्च फिल्म के अंदर हवा न भर पाए।

5. फिल्म में छेद सावधानी से करें सिचाई नाली का ध्यान रखें।

6. छेद एक जैसे करे और फिल्म न फटे इस बात का तो ध्यान रखें।

7. फिल्म की छिदाई हमेशा गोलाई में करें।

8. फिल्म को फटने से बचाएं, उपयोग होने के बाद उसको सुरक्षित रखें ताकि उसका उपयोग दूसरी बार भी कर पाए।

कुछ सब्जियों में मल्च का प्रभाव –

1.मल्च से खीरावर्गीय फसलों में पौध वृद्धि अच्छी होती है। काली मल्च की अपेक्षा गहरी नीली मल्च में परिणाम बेहतर मिलते है। औसतन 30 प्रतिशत बाजार योग्य उत्पादन में वृद्धि देखी गई है जबकि पीली मल्च पर उत्पादन काफी कम पाया गया है।

2.बैंगन में काली मल्च की अपेक्षा लाल और धूसर मल्च अधिक प्रभवकारी है। औसतन 12 प्रतिशत बाजार योग्य उत्पादन में वृद्धि पाई गई है।

3.तरबूज/खरबूज में पारदर्शक काली और धूसर एल.डी.पी.ई. प्लास्टिक फिल्म का उपयोग किया जाता है। मल्चिंग के उपयोग से उपज में वृद्धि होती है पारदर्शी फिल्म के उपयोग से उपज में 54 प्रतिशत धूसर के उपयोग से 62 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है।

4.प्याज की फसल में लाल, सिल्वर और काली मल्च से फसल में औसतन 24 प्रतिशत बाजारयोग्य कन्दो की उपज मे वृद्धि पाई गई है।

5 आलू की फसल में लाल, सिल्वर और काली मल्च के उपयोग से उत्पादन में लगभग 24 प्रतिशत की उपज में वृद्धि देखी गई है।

6 टमाटर की फसल में काली मल्च की अपेक्षा लाल मल्व के उपयोग से उत्पादन में 12 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई
साथ ही पौध वृद्धि की अवस्था में अगेती झुलसा का प्रकोप कम पाया गया है।

7 .चुकन्दर में मल्चिंग का उपयोग खरपतवारों के नियंत्रण, स्वच्छ स्वस्थ्य फसल तथा पाला से होने वाली हानि के बचाव और अधिक उत्पादन लेने के उद्देश्य से किया जाता है।

8 .सेम वर्गीय सब्जियाँ में प्लास्टिक मल्च के उपयोग से सेम वर्गीय फसलों की उपज में लगभग 50 प्रतिशत की उपज वृद्धि होती है बीमारियों तथा माहू के प्रकोप से भी फसल को बचाया जा सकता है।

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