Saturday, May 18, 2024
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बसंत ऐग्ये हे पार सार्यो मां, रूणक झुणक ऋतु बसंत गीत लगांदि ऐग्ये…।

बसंत ऐग्ये हे पार सार्यो मां, रूणक झुणक ऋतु बसंत गीत लगांदि ऐग्ये…।

ग्राउंड जीरो से संजय चौहान!

आज से बंसत का आगमन हो गया है। सभी मित्रो को सपरिवार बसंत पंचमी की ढेरों बधाईयां। आशा करते है ये बसंत आपके लिए खुशियों की सौगात ले के आये। बसंत पंचमी खुशियों की शुरुआत का त्यौहार है। हरे-हरे खेतों में सरसों के पीले-पीले फूलों को देख हृदय फूला नहीं समा रहा। आखिर वसंत जो आ रहा है। वसंत को ऋतुओं का राजा माना गया है। बसंत को प्रकृति का उत्सव भी कहा गया है। वसंत पंचमी, निराशा, नीरसता एवं निष्क्रियता को त्यागकर सदैव प्रसन्न रहना चाहिए, ताकि जीवन में यौवन, सौंदर्य एवं स्नेह का संचार हो का संदेश देती है।

बंसत पंचमी नयें कार्यों के आधारशिला रखने का पावन पर्व है। आज ही के दिन शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्थापना की थी। आज नरेंद्रनगर के राजमहल से बैकुंठ धाम बद्रीनाथ के कपाट खुलने की तिथि तय होती है। आज छोटे छोटे बच्चों के नाक, कान छेदतें हैं। परम्परा के अनुसार आज जौ की पत्तियों को घर के दरवाजे, खिडकियों, देहरी, देवस्थानो, गौशाला से लेकर भूमि का भूमियाल, मोरी नारायण, खोली का गणेश में चढाते है। खुद भी धारण करते है। साथ ही गुड तिल का प्रसाद बांटते है। इस दिन लोग कुंडली देखते हैं तो कुमाऊँ में बैठकी होली की शुरुआत होती है। पंचमी पर पीले वस्त्र पहनने के साथ ही लोग वसंती हलुवा, पीले चावल एवं केसरिया खीर खाकर इस उत्सव का आनंद लेते हैं। पंचमी के दिन विद्या एवं वाणी की देवी सरस्वती का आभिर्भाव हुआ माना गया है। इसलिए सरस्वती ही हमारे जीवन का मूल है। वसंत पंचमी के दिन तेल एवं उबटन लगाकर स्नान करना चाहिए। अच्छे वस्त्र एवं आभूषण धारण करने चाहिएं तथा गुलाल, चंदन, पुष्प, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करनी चाहिए।

बसंत के आगमन पर प्रकृति के चितेरे कवि चंद्रकुंवर बर्त्वाल कहते हैं कि ‘अब छाया में गुंजन होगा वन में फूल खिलेंगे, दिशा-दिशा से अब सौरभ के धूमिल मेघ उठेंगे, जीवित होंगे वन निद्रा से निद्रित शैल जगेंगे, अब तरुओं में मधु से भीगे कोमल पंख उगेंगे। प्रकृति नये श्रृंगार को तैयार हो चुकी है। चारों दिशाओं में नया रंग, नई उमंग, उल्लास एवं उत्साह का माहौल है।

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