(मनोज इष्टवाल)
सोशल मीडिया में बद्रीनाथ में हाल ही में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में डीजे साउंड व गायिका प्रियंका महर को जमकर ट्रॉल किया गया। यहाँ तक कि भाजपा के सबसे वरिष्ठतम नेता मुरली मनोहर जोशी ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘बद्रीनाथ को नाचघर बनाना, भारतीयों की आस्था पर गहरा आघात है।’ वहीं प्रदेश के धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज की शंख पर की गई टिप्पणी ने आग में घी का काम कर दिया। कलाकारों के पक्ष में खड़े दिखे ओहो रेडिओ के आर जे काव्या भी जमकर ट्रॉल हो रहे हैं। दूसरी ओर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस विवाद पर एक शब्द नहीं बोले हैं। आखिर इस विवाद पर प्रश्न यह उठता है कि जहाँ कुत्ता नहीं भोंकता, जहाँ शंख नहीं बजता। जहाँ भगवत कथा भी बिना लाउडस्पीकर के होती हैं। वहाँ उत्तराखंड गठन के बाद धर्म संस्कृति के एक अन्य स्वरूप में सांस्कृतिक कार्यक्रम की रूपरेखा में प्रकृति, संस्कृति, ध्यान, योग, अध्यात्म के विपरीत कुछ बर्षों से लाउडस्पीकर में शोर-शराबे से भरपूर इन कार्यक्रमों की बाढ़ क्यों आई? क्या यह सब विधि सम्मत व सनातन धर्म के अनुकूल है?
एक ओर इस विवाद में जिलाधिकारी चमोली अपना पल्ला झाड़ते दिखे दूसरी ओर उनसे एक गलती 56 एपीओ के कर्नल को नामजद पत्र लिखने में हुई है। वहीं सूत्रों का मानना है कि इस कार्यक्रम की पटकथा दिल्ली में लिखी गई। व वहीं तय किया गया कि बद्रीनाथ में फ़ौज द्वारा आयोजित झलसे में किन सांस्कृतिक टीमों को प्रदर्शन के लिए बुलाया जाएगा। यहाँ सरकार से यह चूक तो हुई है कि प्रशासन द्वारा धार्मिक आस्था के केंद्र के बेहद निकट संस्कृति के नाम पर ऐसे सांस्कृतिक दल चिन्हित कर भेज दिए जिनका धर्म व आस्था के मापदंडीय कार्यक्रमों से कोई वास्ता नहीं है। न ही इनकी संस्कृति को पहचान दिलाने वाले वस्त्राभूषण थे और न ही ऐसे नृत्य या गीत। यहाँ प्रियंका महर अगर ट्रॉल हुई हैं तो उसके पीछे सिर्फ साउंड सिस्टम दोषी नहीं बल्कि उनके द्वारा प्रदर्शित किया गया नृत्य व गीत भी है।
सूत्रों का मानना है कि बद्रीनाथ में इससे पूर्व भी हर बर्ष सांस्कृतिक कार्यक्रम किये जाते रहे हैं। जिनमें स्थानीय गायक किशन महिपाल ही नहीं अभिनेत्री उर्वशी रौतेला भी कार्यक्रम दिए हैं। जानकारी दे दें कि फ़िल्म अभिनेत्री उर्वशी रौतेला ने बद्रीनाथ में आजतक कोई कार्यक्रम नहीं दिया है। हाँ, एक विवाद से उनका जरूर नाम जोड़ा गया जिसमें उनके द्वारा बद्रीनाथ के पास उर्वशी मंदिर को अपने से जोड़ते हुए कोई टिप्पणी की थी।
हम सभी जानते हैं कि बद्रीनाथ सनातनी हिन्दुओं का एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, जहाँ सदियों से धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएँ, मेले, जागर, लोकनृत्य और उत्सव चलते आ रहे हैं। इनकी गिनती करना संभव नहीं, क्योंकि कई कार्यक्रम स्थानीय, मौसमी या छोटी-छोटी स्तर पर होते रहते हैं। जिनमें मुख्यत: निम्न प्रमुख हैं :-
- –केदार महोत्सव (Badri-Kedar Festival): सालाना (आमतौर पर मई-जून में) 8 दिनों का सांस्कृतिक उत्सव, जिसमें देशभर के कलाकारों द्वारा संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ होती हैं।
- माता मूर्ति महोत्सव (Mata Murti Festival): सितंबर में (वामन द्वादशी पर) मनाया जाने वाला प्रमुख उत्सव, जिसमें जुलूस और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ शामिल होती हैं। मकर संक्रांति, जन्माष्टमी और अन्य धार्मिक पर्वों पर सांस्कृतिक गतिविधियाँ।
- स्थानीय मेले/उत्सव: बद्रीश पंचायत महोत्सव, बामणी गांव का गाडू उत्सव, जागर गायन, लोकनृत्य (पांडव नृत्य, छोलिया आदि) आदि।
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देवभूमि सांस्कृतिक महोत्सव (Devbhoomi Cultural Festival):
- 2025 में आयोजित।
- 2026 में 19-20 सितंबर को टूरिस्ट अराइवल प्लाजा में भारतीय सेना (ऑपरेशन सद्भावना) और चमोली जिला प्रशासन के सहयोग से दो दिवसीय कार्यक्रम। इसमें गढ़वाली लोकगीत, लोकनृत्य, स्टॉल आदि शामिल थे। (इस पर तेज संगीत को लेकर कुछ विवाद भी हुआ।)
1- मान्यता है कि माता लक्ष्मी यहाँ तुलसी के रूप में गहन तपस्या कर रही थीं। उसी समय भगवान विष्णु ने शंखचूड़ (या शंखचूर्ण) नामक राक्षस का वध किया।
सामान्यतः विजय पर शंख बजाया जाता है, लेकिन भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के ध्यान में विघ्न न पड़े, इसलिए शंख नहीं बजाया। तभी से बद्रीनाथ में शंख बजाने की परंपरा बंद हो गई।

शंखचक्रं सकिरीटकुण्डलं सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।
सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥
• अर्थ: जिनके चार हाथों में शंख और चक्र हैं, जो सिर पर मुकुट और कानों में कुंडल धारण किए हुए हैं, जो पीले वस्त्र (पीतांबर) पहने हुए हैं और जिनकी आंखें कमल के समान सुंदर हैं; जिनके वक्षस्थल पर सुंदर हार और कौस्तुभ मणि चमक रही है, उन चतुर्भुज भगवान विष्णु को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ।
• शंख के लिए:
• श्लोक:
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृपिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन्।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो भीमस्वनोऽरेर्हृदयानि कम्पयन्॥
• अर्थ: शंखराज पाञ्चजन्य! जब भगवान कृष्ण आपको फूंकते हैं, तो आपकी भयंकर ध्वनि से शत्रुओं के हृदय कांप उठते हैं। आप यातुधान, प्रमथ, प्रेत, पिशाच और क्रूर दृष्टि वाले ग्रहों को यहाँ से भगा दीजिए।
चक्र के लिए:•
श्लोक:
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद् भगवत्प्रयुक्तम्। दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु कक्षं यथा वातसखो हुताशः॥
• अर्थ: भगवान द्वारा चलाया गया, प्रलय काल की अग्नि के समान तीव्र किनारों वाला सुदर्शन चक्र चारों ओर घूमते हुए शत्रु की सेना को उसी प्रकार तुरंत भस्म कर दे, जैसे अग्नि वायु की सहायता से सूखे घास-फूस को जला देती है।
गदा के लिए:•
श्लोक:
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिंगे निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि। कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षोभूतग्रहांचूर्णय चूर्णयोरीन्॥
• अर्थ: बिजली के समान स्पर्श और चिंगारियों वाली, अजीत भगवान विष्णु की प्रिय कौमोदकी गदा! तुम कुष्मांड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत और ग्रहों को पीस डालो, कुचल डालो और शत्रुओं का चूर्ण बना दो।
यह सब होने के बावजूद भी अगर हम धार्मिक मान्यताओं के आगे नतमस्तक नहीं हैं व यह अहम् पाले हुए हैं कि हम ही सही हैं, तब भगवन बद्रीश ही अपने कोप से ऐसे लोगों को बचा सकते हैं।



