Saturday, May 18, 2024
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आश्चर्यजनक किन्तु अकाट्य सत्य…जौनसारी लोकसमाज के बीच से गायब हुए जौनसारी संस्कृति के रचे-बसे दर्जनों लोकगीत व नृत्य!

आश्चर्यजनक किन्तु अकाट्य सत्य…जौनसारी लोकसमाज के बीच से गायब हुए जौनसारी संस्कृति के रचे-बसे दर्जनों लोकगीत व नृत्य!

(मनोज इष्टवाल)

मात्र तीन दशक में एक जनजातीय लोक संस्कृति में रचे बसे अगर एक दर्जन से अधिक लोकगीत व नृत्य गायब हो जाएँ या उनके नाम तक उस संस्कृति के लोगों के बीच प्रचलन में न रहे गए हों तो यह समझ लेना चाहिए कि वह लोकसंस्कृति अब बमुश्किल तीन दशक और…की ही मेहमान रह गई है क्योंकि मैंने अपनी उम्र के 4 दशकों में ही पौड़ी गढवाल की नयार घाटी सभ्यता, रामगंगा घाटी सभ्यतागंगा घाटी नदी घाटी सभ्यता को चूर-चूर होते देखा है. वहां के लोक समाज की सांस्कृतिक विरासत में रचे-बसे थौळ-कौथीग, तीज-त्यौहार, लोकगीतलोकनृत्य आधी शताब्दी पार करते ही अब 90 प्रतिशत गायब हो गए हैं. भले ही वर्तमान में कई विदूषक, चिन्तक व संस्कृतिधर्मी इन्हें संग्रहित करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन ये लोकगीत जब लोकनृत्यों के साथ मंचों पर दिखाई दे रहे हैं तब इनकी तात्कालिक नृत्य व गायन कला में दिखने वाले प्रयोग असमंजस में डाल देते हैं. भले ही ये दिखने-सुनने में खूबसूरत लगते हैं क्योंकि इनमें अपनाई गई प्रयोगधर्मिता वर्तमान के नक़्शे-कदम पर चलकर उसका स्वरुप बदल देती है जो सामाजिक मूल्यों व सांस्कृतिक धरोहरों की अकाट्य कला के लिए शुभसंकेत नहीं कहा जा सकता.

जौनसारी जनजातीय लोकसंस्कृति में पिछले 25 से 30बर्षों में बेहद तेजी से परिवर्तन आये हैं क्योंकि अब इस समाज का सबसे आकर्षक पहलु “अतिथि देवो भव:” जहाँ बहुत तेजी से गायब हो रहा है वहीँ लोक समाज के ताने बानों में शामिल यहाँ की अतुलनीय सांस्कृतिक धरोहरों ने भी इस लोकसंस्कृति के प्रति यहाँ के पढ़े लिखे समाज की रूचि कम कर दी है जिससे यह डर बना हुआ है कि कहीं हो नहो यह जनजाति भी तमसा यमुना सभ्यता के उस चरम को खो दे जिसकी कई पीढ़ियों ने यहाँ के अबूझ ऐतिहासिक पहलुओं की वकालत की है व दुनिया भर के शोधार्थियों के बीच अपने लोक समाज व लोकसंस्कृति की वानगी देखने सुनने व लिखने के लिए लालायित किया है.

तमसा-यमुना नदी घाटी सभ्यता के मध्य बसे इस प्राकृतिक सौन्दर्य से भरे जनजातीय क्षेत्र का नाम जौनसार यूँही नहीं पड़ा. इसकी मिटटी की खुशबु में एक ऐसा यौवन बसा है जिसकी सारगर्विता का बर्णन कर पाना जरा मुश्किल है. इतिहासकार भले ही जौनसारी जाति के आगमन को कभी यूनानियों से जोड़कर तो कभी अन्य यूरोपियन जातियों से जोड़कर देखते हैं. लेकिन चक्रनगरी के राजा के ये वंशज जो स्वयं को पांडववंशी मानते हैं यकीनन द्वापर युगीन कहे जा सकते है क्योंकि द्रोपदी को यहीं लाखामंडल में “अक्षत यौवना” का वरदान प्राप्त हुआ था और यह सत्य आज तक भी चलता आ रहा है कि यहाँ की महिलायें “अक्षत यौवना” के लोकव्यवहार से आज भी अलंकृति हैं क्योंकि वर्तमान तक भी लगभग 80प्रतिशत महिलायें विधवा जीवन यापन नहीं करती. भले हि वैश्विक व शैक्षिक स्तर ने इस समाज की कई अवधारणाओं में बहुत तेजी से परिवर्तन आ रहे हैं जिसका नुकसान भले हि वर्तमान में नहीं दिखाई दे रहा हो लेकिन अगर इसे सम्भाला,संजोया नहीं गया तो आने वाले दो दशक बाद यह क्षेत्र भी पौड़ी गढवाल के जनमानस की तरह संस्कृति न्यूनता में आ जाएगा और यह सत्य है कि जिसने अपनी लोकसंस्कृति व लोकसमाज खो दिया वह समाज दुनिया के नक़्शे से ही गायब हो गया है ठीक उसी तरह जिस तरह हिमालय में बसने वाली यक्ष, किन्नर, गंदार्भ किरात, नाग, खस, शक, द्रविड़, कोल, भील, तंगण, कुलिंद, खस, वैदिक आर्य इत्यादि जातियां पार्श्व में खो गई हैं व इनका अस्तित्व शून्य हो गया है. उसी तेजी से कत्यूरी वंश भी आमजन में शामिल होकर अपनी पहचान मिटा रहा है जिससे स्वाभाविक तौर पर आने वाले समय में कत्युरी वंशज भी अपने इतिहास के पन्नो में ही दर्ज दिखेंगे. बहरहाल जौनसारी, बाउरी, कन्डवाणी, पर्वती, रं (शौका), बोक्सा, रवांल्टी, जौनपुरी, नागपुरी, भोटिया, जाड़, मार्छा, खम्पा,थारु, वनरावत जातियां ही अभी तक अपने अस्तित्व को गौरान्वित किये हुए दिखाई देते हैं जिसमें जौनपुरी, रवांल्टी, नागपुरी इत्यादि संस्कृतियाँ पर भी धर्मसंकट दिखाई देता है.

जौनसारी लोकसमाज की अगर बात की जाय तो यह वर्तमान में युवा जौनसारियों को स्वयं भी पता नहीं होगा कि उनकी जनजातीय संस्कृति में लगभग डेढ़ दर्जन से ज्यादा लोकगीत कला शामिल हैं व इससे जरा अधिक नृत्य कलाएं सम्मिलित हैं. जिनमें से मांगड, छोड़े, भारत, जंगू, बाजू लगभग 70 प्रतिशत लोकसमाज में जबकि हारुल, झैंता गायन ही अब यहाँ के लोक समाज के मध्य दिखाई देते हैं लेकिन इनके अलावा जागर, सीलोंग, ठुंडू, बेणी, तांदा, ठंडकिया, पूज, मातरिया, हईलार, पौणाई, छुमका, भितराया, मुंजरा इत्यादि लोकगीत शैली के बारे में वर्तमान पीढ़ी के बमुश्किल 5प्रतिशत युवा ही इनका संज्ञान रखते होंगे. युवा ही नहीं बल्कि 40 बर्ष आयु तक पहुंचे व्यक्ति भी… I

वहीँ हाल यहाँ के लोकनृत्यों का भी है हारुल, झैंता, मंड़ावणी, धुमसू, रासो, परात, पौणाई, हरिण, हाथी, थाऊड़ा, जंगबाजी इत्यादि नृत्य कला की जानकारी तो लगभग सभी को है लेकिन यहाँ के लोकसमाज में प्रचलित लोक नृत्य जिनमें धीई, मुंजरा, छुमका, घुण्डया रासो, हदिया नृत्य इत्यादि दृश्यपटल से लगभग गायब हो गए हैं वही हाल यहाँ की लोक नाट्यकला व गीतों का भी है. लोकनाट्य में बर्णित भुडियाल या भुडयात के अलावा यहाँ दिवाली पर खेलूटे दिख जायेंगे लेकिन अन्य नाट्यकलाएं लोप हो चुकी हैं. लोकगाथाओं में यहाँ के स्थानीय देवी देवताओं, पूर्वजों, अलौकिक शक्तियों व पांडवों से सम्बन्धित गाथाएँ, कथाएं, गीत व तन्त्र-मन्त्र (बागोई, बुक्साई) इत्यादि शामिल तो हैं लेकिन ये कितना काल और संग्रहित रह पाएंगी कह पाना सम्भव नहीं है. यहाँ कि लोक गाथाओं में प्रचलन में नंतराम नेगी, महासू देवता, पांडव से सम्बन्धित हि लोकगाथाएं प्रचलन में हैं जबकि दर्जनों लोकगाथाओं का इतिहास लोप होने के कगार में है. वही यहाँ के आणा-पखाणा व मुहावरों का भी हाल है जो तेजी से आम आदमी कि बोलचाल की जिन्दगी से गायब हो रहे हैं. अब इसे जौनसारी जनजाति की लोक धरोहर, लोकसमाज व लोकसंस्कृति तेजी से गिरता ग्राफ व धर्मसंकट नहीं तो और क्या कहेंगे. इसलिए इस समाज को अभी से अपने लोक को तिलिस्म को बचाए रखने के लिए कमर कसनी ही पड़ेगी अन्यथा मात्र दो या तीन दशक बाद यह क्षेत्र जनजातीय कहलाने के स्थान पर आमजातीय परिभाषित होने लगेगा.

मई 2019 में “लोकपंचायत” व 21 अक्टूबर 2021 क़ो जौनसार-बावर की खत्त -समाल्टा  में आयोजित किये गए  39 खतों के सदर सायणाओं व 35 ‘खाग’ उप सदर सयाणाओं की लोक पंचायत की अब यह जिम्मेदारी बनती है कि किस तरह जौनसार बावर के लोक समाज व लोकसंस्कृति क़ो बचाया जा सके.

बहरहाल जौनसार बावर क्षेत्र के बुद्धिजीवियों के एक बड़े तबके ने अपनी अमूल्य लोक व सांस्कृतिक धरोहर को बचाने के लिए “लोकपंचायत” के माध्यम से मुहीम छेड़ तो दी है लेकिन क्या यह लोकपंचायत अपने लोकसमाज व लोकसंस्कृति के खोये हुए स्वरूप का दस्तावेजीकरण कर पाएगी. क्या यह लोकपंचायत उस सबका विजुअल डाकुमेंट तैयार कर अपनी खोई विरासतों के लोकगीत, लोकनृत्य, लोकनाट्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं को पुनः अपने गाँवों के आंगनों में थिरकते क़दमों व चिकनी फटालों के वैभव तक लौटा पाएंगी? क्या सचमुच खोई वस्तुओं को पुनः जुटाने का साहस कर पाएंगी? यही यक्ष प्रश्न हम सबके आगे खड़ा है.

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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