Sunday, March 3, 2024
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पौड़ी गढ़वाल के सीरौं गांव में जन्में थे “जवाहर बास्कट” के जन्मदाता अमर सिंह रावत। 1926 में डिज़ाइन हुई थी पहली पिरूल से बनी जवाहर बास्कट..!

पौड़ी गढ़वाल के सीरौं गांव में जन्में थे “जवाहर बास्कट” के जन्मदाता अमर सिंह रावत। 1926 में डिज़ाइन हुई थी पहली पिरूल से बनी जवाहर बास्कट..!

(मनोज इष्टवाल)

बचपन से ही हमारे मुंह में ये शब्द अपने बुजुर्गों के माध्यम से ठूंसे गए से पैदा हुए लगते हैं। ठूंसे गए इसलिये कि जब भी दादा या अन्य ने कभी कपड़े की आवश्यकता जताई या फिर दर्जी (मूलतः गांवों में औजी बाजगी ही हमारे पुरखों के दर्जी भी हुआ करते थे) घर आया हो तो डिमांड यही होती थी कि एक जवाहर बास्कट बना देना। पैदा इसलिए क्योंकि आज भी हम टेलर के पास जाते हैं तो अक्सर मुंह से जवाहर कट बास्कट निकल ही आता है।

भले ही वर्तमान समय में फैशन के साथ-साथ हाफ जैकेट (फतवी/बास्कट) का स्टाइल बदला हो लेकिन गांधी टोपी व जवाहर बास्कट शब्द अभी तक ज्यो का त्यों जिंदा है। जवाहर बास्केट का निर्माण काल मूलतः भांग या सूत के रेशे या ऊनि रेशे से नहीं माना जा सकता क्योंकि इसके अविष्कारक अमर सिंह रावत ने इसे पिरूल अर्थात चीड़ की पत्तियों से महीन भांग के रेशों के सपोर्ट से तैयार किया था। जिसका निर्माण काल 1926-27 माना जाता है, लेकिन इसे जवाहर कट या जवाहर बास्कट तब नाम दिया गया जब इसे देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1952 में अंग वस्त्र के रूप में धारण किया था। यह नाम सिर्फ गढ़वाल मंडल में ही प्रचलन में आया या फिर पूरे देश में..! यह कह पाना सम्भव नहीं है। लेकिन यह तय है कि खादी एवं ग्रामोद्योग की स्थापना से 5 बर्ष पूर्व ही उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जनपद के पट्टी असवालस्यूँ विकास खण्ड कल्जीखाल के ग्राम- सीरौं में अमर सिंह रावत की डिज़ाइन की हुई जैकेट को “जवाहर बास्कट” का नाम सार्वजनिक रूप से 1952 में तब मिल गया था जब स्वतंत्र भारत के गढ़वाल सांसद भक्त दर्शन ने 1952 में पिरूल निर्मित अमर सिंह रावत के स्वावलंबन सदन में बनी बास्कट जवाहर लाल नेहरू को भेंट की व उसका नाम रखा गया “जवाहर बास्कट।”

यह आश्चर्यजनक है कि तब से लेकर अब तक न पूर्ववर्ती सरकार ने लघु उद्योगों के रूप में स्व. अमर सिंह रावत के कृतित्व को ही संग्रहित किया और ना ही उनके अन्वेषण, अविष्कारों की किसी बड़े मंच पर चर्चा की। 1957 में मुंबई में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग की स्थापना के बाद खादी वस्त्र बनने शुरू हुए जबकि उससे पूर्व गढ़वाल में ही उन्नत भांग, कंडाली, सेलु के रेशों से खादी वस्त्र निर्माण शुरू हो गया था। आइए जानते हैं कौन है इस सबका जन्मदाता…। क्या महात्मा गांधी के चर्खे से काति गयी खादी का जन्म पहले हो गया था या फिर अमर सिंह रावत की तकली से काति गयी रेशों से…! प्रश्न बड़ा है व इसके अविष्कार इस बिषय पर तरह -तरह की दलीलें भी दे सकते हैं लेकिन एक आर्य समाज के प्रचारक रहे अमर सिंह रावत इसलिए किनारे कर दिये जा सकते हैं कि उन्होंने गरीबोत्थान के लिए आर्य समाज का प्रचार प्रसार किया। इंटर कालेज जखेटी के पूर्व प्रबंधक व उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे स्व. बलदेव सिंह आर्य के समधी ग्राम धारकोट कफोलस्यूँ पौड़ी गढ़वाल के स्व. वृंदावन पथिक जो स्वयं भी आर्य समाजी थे, बताया करते थे कि स्व. अमर सिंह रावत उनसे अग्रिम पांत के आर्यसमाज के प्रचारक थे व उनसे ही प्रेरित होकर उन्होंने भी आर्य समाज अपनाया था। वे कहा करते थे कि “जवाहर बास्कट” का अविष्कार उन्होंने ही किया है।

कौन थे अमर सिंह रावत।

प्रबुद्ध साहित्यकार व यायावर व्यक्तित्व के धनि अरुण कुकसाल स्व. अमर सिंह रावत के बारे में जानकारी देते हुये बताते हैं कि उत्तराखंड के महान अन्वेषक और नवाचारी उद्यमी अमर सिंह रावत का जन्म 13 जनवरी 1892 को पौड़ी (गढ़वाल) के असवालस्यूं पट्टी के सीरौं ग्राम में हुआ था। उन्होने कंडारपाणी, नैथाना तथा कांसखेत से प्रारम्भिक पढाई की। मिडिल में फेल होने के बाद स्कूली पढाई से उनका नाता टूट गया। उन्होंने जीवकोपार्जन की गाड़ी सर्वे ऑफ इण्डिया, देहरादून में क्लर्की से प्रारम्भ की। नौकरी रास नहीं आयी तो रुडकी में टेलरिंग का काम सीखा और दर्जी की दुकान चलाने लगे। विचार बदला तो नाहन (हिमांचल) में अध्यापक हो गये। वहां मन नहीं लगा दुगड्डा (कोटदा्र) में अध्यापकी करने लगे। वहां से लम्बी छलांग लगा कर लाहौर पहुंच कर आर्यसमाजी हो गये। फिर कुछ महीनों बाद अपने मुल्क गढ़वाल आ गये और आर्य समाज के प्रचारक बन गांव-गांव घूमने लगे। इस बीच डीएवी स्कूल
दुगड्डा में प्रबंधकी भी की। संयोग से जोध सिंह नेगी (सूला गांव) जो कि उस समय टिहरी रियासत में भू-बंदोबस्त अधिकारी के महत्वपू्र्ण पद पर कार्यरत थे से परिचय हुआ, फिर उन्हीं के साथ टिहरी रियासत के बंदोबस्त विभाग में कार्य करने लगे। जोध सिंह नेगी जी ने पद छोडा तो उन्हीं के साथ वापस पौड़ी आ गये। जोध सिंह नेगी जी ने ‘गढ़वाल क्षत्रीय समिति’ के तहत ‘क्षञीय वीर’ समाचार पञ का प्रकाशन आरम्भ किया। अमर सिंह उनके मुख्य सहायक के रूप में कार्य करने लगे। लेकिन गढ़वाल क्षत्रीय समिति के कुछ कार्य उन्हें रास नहीं आये तो मन-मयूर फिर नाचा और अमर सिंह जी करांची चल दिये और आर्य समाज के प्रचारक बन वहीं घूमने लग गये। इस दौरान कोइटा (बलूचिस्तान) में भी प्रचारिकी की लगभग 20 साल की घुम्मकड़ी के बाद ‘जैसे उड़ि जहाज को पंछी, फिर जहाज पर आयो’ कहावत को चरितार्थ करते हुए सन् 1926 में वापस अपने गांव सीरौं सदा के लिए आ गये।

ऐसे शुरू होता उनका असल काम।

सीरौं आकर रावत जी ग्रामीण जनजीवन की दिनचर्या को आसान बनाने और उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए नवीन प्रयोगों में जुट गये. विशेषकर स्व:रोजगार के लिए उनके अभिनव प्रयोग लोकप्रिय हुये। उन्होने अपने घर का नाम ‘स्वावलम्बन सदन’ रखा। नजदीकी गाँवों यथा – नाव, चामी, देदार, ऊंणियूं, रुउली, कंडार, सुरालगांव, डुंक, किनगोड़ी के युवाओं के साथ मिलकर स्थानीय खेती, वन, खनिज एवं जल सम्पदा के बारे में लोकज्ञान, तकनीकी और उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया। उसके बाद इन संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए नवीन एवं सरल तकनीकी को ईजाद किया। अमर सिंह रावत ने नवीन खोज, प्रयोग एवं तकनीकी से अधिक सुविधायुक्त सूत कातने का चर्खा, पनचक्की, पवनचक्की आदि का निर्माण किया। लोगों को इन उत्पादों को बनाना और इस्तेमाल करना सिखाया।

अमर सिंह रावत जी ने अपने आविष्कारों में इस विचार को प्रमुखता दी कि ग्रामीण जनजीवन के कार्य करने के तौर-तरींकों में सुधार लाया जाय तो इससे आम आदमी के समय, मेहनत और धन को बचाया जा सकता है. महिलाओं के कार्य कष्टों को कम करने के दृष्टिगत उन्होने दो तरफ़ा अनाज कूटने वाली गंजेली बनाई। यह गंजेली एक पांव से दबाने पर बारी-बारी से दोनों ओर की ओखली में भरे अनाज को आसानी से कूटती थी। अनाज पीसने के लिए ‘अमर चक्की’, जगमोहन चक्की’ और ‘हवाई चक्की’ बनाई। गांव की ऊंची धार पंचायत घर के पास उन्होने ‘पवन/हवाई चक्की’ को स्थापित किया। अनाज पीसने के लिए उनकी बनाई ‘हवाई/पवन चक्की’ का उपयोग कई गांवों के ग्रामीण किया करते थे। उन्होने सुरई के पौधे से वार्निश, विभिन्न झाडियों से प्राकृतिक रंग, खुशबूदार पौंधों से इञ और साबुन, वनस्पतियों से कागज बनाया। उन्होने मुलायम पत्थरों से सीमेंट बना कर कई घरों का निर्माण किया जिनके अवशेषों में आज भी मजबूती है।


अमर सिंह रावत जी ने भीमल, भांग, कंडाली, सेमल, खगशा, मालू तथा चीड़ आदि की पत्तियों से ऊनी तागा और कपड़ा तैयार किया. चीड के पिरूल से ऊनी बास्कट (जैकेट) बनायी।  जिसे वे और उनके साथी पहनते थे। पिरुल से बनी एक जैकिट उन्होंने जवाहर लाल नेहरु जी को भेंट की। इस बास्कट को उन्होने ‘जवाहर बास्कट’ नाम दिया। नेहरु ने इसे सराहा। नेहरू ने इस काम को आगे बड़ाने के लिए मदद का भरोसा दिलाया। सन् 1940 में नैनीताल में आयोजित राज्य स्तरीय प्रदर्शनी में अमर सिंह रावत जी ने अपनी टीम एवं उत्पादों के साथ भाग लिया। इस प्रदशनी में बम्बई के प्रसिद्ध उद्योगपति सर चीनू भाई माधोलाल बैरोनत भी आये थे. अमर सिंह जी के स्थानीय वनस्पतियों यथा- कंडाली, पिरुल, रामबांस से ऊनी और सूती कपड़ों के उत्पाद जैसे बास्कट, कमीज, टोपी, मफलर, कु्रता, दस्ताने, मोजे, जूते बनाने के फार्मूले और कार्ययोजना को उद्योगपति सर चीनू भाई ने 01 लाख रुपये में खरीदना चाहा अथवा अमर सिंह जी को बम्बई आकर उनके साथ साझेदारी में उद्यम लगाने की पेशकश की थी। स्व. रावत ने चीनू भाई को दो टूक जबाब दिया कि ‘यदि यह उद्योग चीनू भाई गढ़वाल में लगायें तो वे उनके साथ फ्री में काम करने को तैयार है। रावत की मंशा यह थी कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार मिलेगा। उद्योगपति चीनू भाई बम्बई में ही उद्यम लगाना चाहते थे। अत: बात नहीं बन पायी। उसके बाद रावत जी खुद ही अपने गांव के आस-पास उद्यम लगाने के प्रयास में लग गए। उल्लेखनीय है कि अप्रैल, 1942 में तत्कालीन जिला पंचायत, पौड़ी ने उनके कंडाली, रामबांस, पिरुल, भांग, भीमल आदि से कपड़ा बनाने की कार्ययोजना के लिए 8 हजार रुपये का अनुदान मंजूर किया। यह तय हुआ कि पौड़ी गढ़वाल की कंडारस्यूं पट्टी के चौलूसैंण में अमर सिंह जी के सभी प्रयोगों को व्यावसायिक रूप देने के लिए यह उद्यम लगाया जायेगा। लेकिन वाह रे… ! हम पहाड़ियों की बदकिस्मती! दिन-रात की भागदौड़ की वजह से रावत जी तबियत बिगड गयी। कई दिनों तक बीमार रहने पर सतपुली के निकट बांघाट अस्पताल में 30 जुलाई 1942 को अमर सिंह जी का निधन हो गया। सारी योजनायें धरी की धरी रह गयी। उनके सपने उन्हीं के साथ सदा के लिए चुप हो गये।

उनकी मृत्यु के बाद उनके परम मिञ और गढ़वाल के प्रथम लोकसभा सदस्य भक्त दर्शन जी ने सन् 1952 में अमर सिंह रावत जी के खोजों की कार्ययोजना बना कर प्रधानमंत्री नेहरु के सामने प्रस्तुत की। नेहरु जी ने सकारात्मक टिप्पणी के साथ संबधित अधिकारियों को फाइल भेजी. इस पर सरकार की ओर से कुछ सकारात्मक प्रयास भी हुये, पर बात आगे नहीं बढ़ पायी।

अमर सिंह रावत जी ने सन् 1926 से 1942 तक लगातार स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए नवीन तकनीकी एवं उत्पादों का विकास किया उनका घर नवाचारों की प्रयोगशाला थी। अपने आविष्कारों की व्यवहारिक सफलता के लिए उन्होने घर की जमा पूंजी तक खर्च कर डाली थी। उन्होने अपने आविष्कारों पर आधारित पुस्तक ‘पर्वतीय क्षेत्रों का ओद्योगिक विकास’ को तैयार किया। जिसे उनकी मृत्यु के बाद भक्त दर्शन जी ने प्रकाशित किया था। इस किताब में अपनी मार्मिक व्यथा को व्यक्त करते हुए उन्होने लिखा है कि ‘मैं जिन अवसरों को ढूंढ रहा था, वे भगवान ने मुझे प्रदान किये। परन्तु मैं कैसे उनका उपयोग करूं, यह समस्या मेरे सामने है। मेरी खोंजों को व्यवहारिक रूप देने के लिए यथोचित संसाधन नहीं है। अब तक इस पागलपन में मैं अपनी संपूर्ण आर्थिक शक्ति को खत्म कर चुका हूं। यहां तक कि स्ञी-बच्चों के लिए भी कुछ नहीं रखा है। अब केवल मेरा अपना शरीर बाकी है।

उन्हें उनकी 80 वीं पुण्यतिथि पर मेरी ओर से श्रद्धा सुमन। मुझे लगता है कि उनके कृत्यों को लेकर हम सबको प्रयास करना चाहिए ताकि इस श्रमजीवी, कर्मयोगी के अविष्कारों का लाभ हम उत्तराखंड़ी उठा सकें व फक्र महसूस कर सकें कि “जवाहर बास्कट” का जन्मदाता हमारे उत्तराखंड में जन्मा है।

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