(मनोज इष्टवाल)
अर्द्धग्रामेश्वर का अगर भावार्थ ढूँढ़ा जाए तो आधा गाँव, आधा शहर का कहा जा सकता है क्योंकि यह शब्द ऐसा है जिसका सही अर्थ क्या हो, वह कह पाना संभव नहीं है। लगता है प्रखर विद्वान व दूरदर्शन समाचार के समाचार सम्पादक रहे स्व. राजेंद्र धस्माना ने अपने नाटक में यह कूट शब्द बतौर नाटक के सार के रूप में प्रस्तुत कर विद्वानों को सोचने को मजबूर कर दिया। 1986 में लिखा गया यह नाटक वैसे अब तक जाने कितने मंच देख चुका होगा, लेकिन 40 बर्ष बाद भी इसका रूहानी क्लेवर जीवंत रहना नाटक की सफलता को दर्शाता है।

नाटक में वे सभी स्वाद थे ज़ो पहाड़ की आवोहवा को प्रदर्शित करने ले लिए बड़े माध्यम कहे जा सकते हैं। दिल्ली, लखनऊ से गाँव लौटे नौकरशाह व उनके ताने-बाने अजब-गजब के थे। हाँ… एक आध दृश्य जरूर प्रदर्शन के समय समझने में थोड़ा मुश्किल से लगे। एकेश्वर व पाटीसैण को जोड़ते हुए स्व. राजेंद्र धस्माना जी ने बग्याळी गाँव की उकाळ उंदार का अच्छा वर्णन किया है। गाँव जाओ तो एकेश्वर उतरो, वापस लौटो तो पाटीसैण..! ताकि चढ़ाई न चढनी पड़े।

राकेश पोखरियाल लिखते हैं ‘उत्तराखंड के प्रमुख बुद्धिजीवी, प्रख्यात विचारक एवं लेखक राजेंद्र धस्माना द्वारा 1986 में लिखित एक रोचक नाटक का मंचन ‘हाई हिलर्स’ समूह द्वारा गत शुक्रवार, 29 मई को नई दिल्ली के मंडी हाउस, कॉपरनिकस मार्ग स्थित एल.टी.जी. थिएटर में किया गया।
दिल्ली-एनसीआर से पधारे अनेक रंगमंच प्रेमियों, कलाकारों, पत्रकारों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ मुझे भी इस नाटक को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। नाटक की विषयवस्तु अत्यंत प्रभावशाली थी।
यह नाटक 1986 में लिखा गया था। उस दौर में उत्तराखंड से पलायन आज की तुलना में बहुत कम था। तब जो लोग भी नौकरी के सिलसिले में दिल्ली, देहरादून या मुंबई जाते थे, उनका अपने गांव से गहरा लगाव बना रहता था और वे समय-समय पर गांव आते-जाते रहते थे। नाटक हास्य-व्यंग्य से भरपूर था और दर्शकों को खूब गुदगुदाया।
फिर आया दौर ‘म्यारा प्वां बाघा रे...। यह देखकर अच्छा लगा कि हाई हिलर्स ग्रुप के चुनिंदा कलाकारों में रंगकर्मी डॉ सतीश कालेश्वरी सिर्फ गीत लिखते ही नहीं बल्कि उनको प्रदर्शित करने का शऊर भी उनके पास है। हुड़के की थाप में उन्होंने गढ़वाल के मूर्धन्य लोकगायक स्व. चंद्र सिंह राही को जीवंत कर दिया।
यह सुखद लगा कि नाटक में स्व. राजेंद्र धस्माना ने कालजयी लेखक व कवि स्व. कन्हैयालाल डंडरियाल को भी पंचिंग लाइन्स में जीवंत किया है लेकिन आगे चलकर वह कहे देते हैं – ‘ कैका घारम ऊत-औलाद हुँयाँ पर कवि लेखक नि हुंयाँ….।
बहरहाल पूरे नाटक का लब्बोलुआब यह रहा कि बृजमोहन वेदवाल द्वारा निर्देशित ‘अर्द्धग्रामेश्वर’ ने दर्शकों को ढाई घंटे तक बैठे रहने के लिए मजबूर कर दिया।
मेरी नजर में नाटक का सबसे कमजोर पक्ष उसका वर्तमान के समय में बहुत ज्यादा लम्बा होना है क्योंकि वर्तमान में महानगरों की व्यस्तता में बंधे किसी भी व्यक्ति के पास समय का इतना आभाव है कि वह करोड़ों की लागत से निर्मित ढाई घंटे की फ़िल्म देखने सिनेमाघर तक नहीं जा पाता। दूसरा नाटक का सीक्वल विखराव सा लाता हुआ नजर आया। दृश्य पटल पर उभरने वाले. सीन कई बार गठजोड़ की कमी महसूस कराते रहे। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि इस खूबसूरत नाटक को और खूबसूरत बनाने के लिए इसके दृश्य पटल को सम्पादित कर इसे एक या डेढ़ घंटे में समेटकर प्रस्तुत करना चाहिए ताकि इसकी ताज़गी बनी रहे। हाई हिलर्स ग्रुप के सभी नाट्यकर्मियों ने अपना बेहतरीन दिया व नाटक को बांधे रखा उसके लिए सभी को साधूवाद। यह सुखद था कि मुझे राजेंद्र धस्माना जी के साथ अतीत में गुजारे पल दूरदर्शन संसद मार्ग से लेकर उनके आवास व आरके पुरम में अवस्थित गांधी फाउंडेशन तक का एक एक दिन चलचित्र की भांति तब तक आँखों में तैरता रहा जब तक मैं दर्शक मंच से लेकर दर्शक दीर्घा में रहा।
