Tuesday, May 19, 2026
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राणी कर्णावती ने की थी मवालस्यूँ के बिनसर की स्थापना।

राणी कर्णावती ने की थी मवालस्यूँ के बिनसर की स्थापना।

(मनोज इष्टवाल)
पूरे 391 बर्ष पूर्व जब संवत १६९० के माघ मास (जनवरी सन् १६३४) में गढ़वाल नरेश महिपत शाह स्वर्ग सिधारे तब राज सिंहासन की बाग़डोर पर बड़ा असमंजस बना रहा। क्योंकि उस समय उनका पुत्र पृथ्वीपति शाह की उम्र मात्र 07 बर्ष थी।
ऐसे राज्य की बागडोर महारानी कर्णावती के हाथों में आ गई। महारानी कर्णावती हिमाचल के राजपरिवार से थीं, इसलिए शासन कला में वह सिद्धहस्त थीं। लेकिन, एक महिला को शासन करते देख काँगड़ा का मुगल सूबेदार नजाबत खान ने मुगल बादशाह शाहजहाँ से आज्ञा लेकर 1635 में गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर पर आक्रमण करने के लिए बढ़ चला। उसे पता था कि गढ़राज वंश शोक में डूबा हुआ है। रानी ने अपने सबसे वफ़ादार सिपहसलार पुरिया नैथानी से मंत्रणा की और पृथ्वी शाह को पुरिया नैथानी के सुपुर्द कर वह स्वयं अपने अंगरक्षकों के साथ चौथान परगना के दूधातोली जंगल होती हुई मवालस्यूँ चौंदकोट गढ़ी क्षेत्र जा पहुंची। यहाँ भी मुग़ल सेना ने उनका पीछा किया।

मुगल सैनिक जब शिवालिक की तलहटी से ऊपर चढ़ना शुरू किया, तब गढ़वाली सैनिकों ने गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया। महारानी कर्णावती पर्वत की चोटी पर मौजूद अमेली डांडा के गुप्त स्थान से दुश्मनों के खिलाफ सेना का संचालनकर रही थीं। कहा जाता है कि उन्होंने जहाँ तम्बू लगाए थे वहीं उन्हें आकाशवाणी सुनाई दी कि तू मेरे बिनसर क्षेत्र में है, यहाँ मेरा मंदिर बना और सच मन से पूजा अर्चनाकर। मैं तेरा बाल भी बांका नहीं होने दूंगा। राणी कर्णावती ने ऐसा ही किया। ऐसे विकट समय में जब उनकी स्थिति कमजोर होने लगी व सैन्यबल क्षीण हो गया था तब अचानकआकाश में बादल मंडराये और घनघोर ओलावृष्टि शुरू हो गई। ओले इतने बड़े थे कि जिस भी मुग़ल सैनिक को लगते वह वहीं हताहत हो जाता । आखिर मुग़ल अपनी जान बचाकर भागे।

हिमालयन डिस्ट्रिक्ट्स जि० २ पृष्ठ ७१९ में एटकिंसन इसका जिक्र करते हुए लिखते हैं :- कर्णावती के शत्रु जब दूधातोली की पूर्वी ढाल पर मवालस्यूँ -चौथान परगने के मध्य में स्थित बिनसर महादेव के निकटवर्ती क्षेत्र में पहुँचे तो ओलों के एक भीषण तूफ़ान से उसके समस्त शत्रु नष्ट हो गए। इसे विनसर महादेव की कृपा समझकर राणी कर्णावती मंदिर का नवनिर्माण करवाया।
डॉ शिव प्रसाद डबराल ‘चारण’ अपनी पुस्तक उत्तराखंड का इतिहास भाग ४ *गढ़वाल का इतिहास -१, संसोधन परिवर्द्ध’न पृष्ठ ६३१ में लिखते हैं :- टिहरी राजवंश के कैप्टेन शूरवीर सिंह ने एटकिंसन के अनुमान को सही माना है।

बाद में स्थिति सामान्य होने पर राणी कर्णावती ने श्रीनगर पहुँचकर मंदिर में पुजारी निहित कर उन्हें ताम्रपत्र दिया व साथ में चांदी की छड़ी भेंट कर बिनसर की पूजा अर्चना का कार्यभार सौंपा व ड्यूल्ड़ गाँव को अकरी घोषित किया। कालंतर में मूर्ती स्थापना के लिए दुशांत में दूधातोली स्थित बूढा बिनसर से चट्टी मालिक पधान जामा-शकुनि इष्टवाल बंधु को बूढा बिनसर से मिट्टी लाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। जिसे बेहद चालाकी के साथ वे अपनी फड़वा छड़ी के साथ लेकर आये थे। और फिर विधिवत बिनसर की प्राण प्रतिष्ठा की गई।

हाटगाँव से प्राप्त ताम्रपत्र के अनुसारइसी बिनसर महादेव के आशीर्वाद से संवत् १६९७ के कार्तिक मास अर्थात् नवंबर १६४० तक राणी कर्णावती अपने अवयस्क पुत्र कुंवर पृथ्वीपति शाह को सिंहासन पर बिठाकर स्वयं अभिवाहक के रूप में राजकाज संभालती रही और नाककट्टी राणी के रूप में प्रसिद्ध हुई। यह वही राणी थी जिसने मुग़ल सेनापति नजावतखां मिर्जा शुजअ सहित हजारों मुग़ल सैनिकों की नाक काट दी थी जिसका जिक्र मुहम्मद साफी मुस्तइद्दखां के ग्रंथ ‘मआसिर -उल -उमरा’, जि० ३ पृष्ठ ४९३ में वर्णित है।

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