Monday, June 22, 2026
Homeसाहित्य-समीक्षा'वो साल चौरासी' अधूरे प्रेम की पूरी कहानी

‘वो साल चौरासी’ अधूरे प्रेम की पूरी कहानी

(डॉ सुशील उपाध्याय)

मनोज इष्टवाल यायावर श्रेणी के ऐसे पत्रकार हैं, जिनका जीवन और लेखन लोक के साथ गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। वे केवल घटनाओं का विवरण नहीं देते, बल्कि अपने अनुभवों और संवेदनाओं को इस तरह विस्तार देते हैं कि पूरा परिवेश उनके कथ्य में समाहित हो जाता है। उनकी दृष्टि उन विषयों पर जाती है जो सामान्यतः चर्चा के केंद्र में नहीं होते, और जब वे उन पर लिखते हैं तो वे विषय पाठकों के बीच व्यापक संवाद का हिस्सा बन जाते हैं। यही कारण है कि उनका लेखन, जीवन के अनुभवों का जीवंत पुनर्सृजन प्रतीत होता है।

उनकी आत्म-संस्मरणात्मक कृति ‘वो साल चौरासी’ इसी लेखकीय स्वभाव का विस्तार है। यह पुस्तक स्मृतियों का सुबद्ध संकलन होने के साथ-साथ इतिहास, समाज, संस्कृति, लोकजीवन, लोकदर्शन, जीवन संघर्ष और प्रेम की बहुआयामी अनुभूतियों का दस्तावेज है। इसमें लेखक ने अपने जीवन के एक विशेष कालखंड को केंद्र में रखकर उस समय की परिस्थितियों, मनःस्थितियों और संबंधों को इस तरह उकेरा है कि वह निजी अनुभव से आगे बढ़कर सामूहिक अनुभव का रूप ग्रहण कर लेता है। यह कृति उस अधूरे प्रेम को समर्पित है, जो अपने अधूरेपन में ही एक गहरी पूर्णता का बोध कराता है। प्रेम का यह स्वरूप न तो दिखावटी है और न ही क्षणिक, यह स्मृति, प्रतीक्षा और आत्मस्वीकृति की दीर्घ प्रक्रिया से गुजरकर परिपक्व हुआ है।

साहित्यिक दृष्टि से देखें तो यह पुस्तक केवल आत्मसंस्मरण नहीं रह जाती, वरन कई स्तरों पर आत्मकथात्मक उपन्यास का सुख भी प्रदान करती है। इसमें तथ्यात्मकता और कल्पनात्मक संवेदना का ऐसा संतुलन है, जो इसे शुद्ध आत्मकथा से भिन्न साहित्यिक कृति के रूप में स्थापित करता है। लेखक अपने अनुभवों को दर्ज करते हुए उन्हें इस तरह रूपायित करते हैं कि वे एक सुघड़ कथा-संरचना में ढल जाते हैं। इसीलिए पाठक को कई बार यह अनुभव होता है कि वह किसी उपन्यास का रसास्वाद कर रहा है, जिसमें पात्र, घटनाएं और भावनाएं एक सुसंगत रूप में आगे बढ़ रही हैं।

इस पुस्तक की कहानी जीवन से गुंथा हुआ एक अटूट सत्य है। वह अधूरे, लेकिन प्रायः अलौकिक प्रेम का सत्य है। इस प्रेम की प्रस्तुति को लेकर लेखक के मन में एक सहज संकोच भी दिखाई देता है। वे लिखते हैं कि उनके सगे-संबंधी, मित्र, परिचित और यहां तक कि क्या उनके बच्चे भी यह सोच सकते हैं कि ‘वो साल चौरासी’ को पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाना चाहिए था। किंतु वे स्वयं ही इसका उत्तर देते हैं कि उनकी इस प्रेमकथा में एक आदर्श, एक सपना और एक उम्मीद थी। यह नए जमाने का सतही प्रेम यानी love नहीं था।

वे अपने आत्मराग (दो शब्द) को एक आम युवक के जीवन-संघर्ष, उसके संकोच, उसकी आत्मस्वीकृति और सह-अनुभूति का प्रामाणिक दस्तावेज बना देते हैं। 16 अध्यायों में विभाजित इस पुस्तक का प्रत्येक उप शीर्षक पाठक को एक गहरे भावनात्मक मोड़ तक ले जाता है। इसमें लड़कपन है, स्कूल-कॉलेज के दिन हैं, मां है, मेला है, परीक्षाएं हैं और प्रेमिका से मिली 160 पृष्ठों की वो कॉपी भी है। इसके बारे में लेखक लिखते हैं—‘कॉपी के एक-एक पन्ने को मैं अपने प्यार को समर्पित करता चला गया।’
वास्तव में, जब इस पुस्तक के अध्यायों को एक साथ पढ़ा जाता है, तो वे किसी कविता की लय जैसे प्रतीत होते हैं— ‘वो रात’, ‘रेल का सफर’, ‘यादों का भंवर’, ‘चिट्ठी’, ‘दिल्ली का रंग’, ‘घर वापसी’, ‘स्वागत प्यारे बंधु हमारे’, ‘प्रेम अगन’। इन्हें पढ़कर लगता है कि लेखक ने किसी कविता के शब्दों को अध्यायों के शीर्षकों में रूपांतरित कर दिया है। पुस्तक का प्रत्येक अध्याय अपने आप में एक स्वतंत्र इकाई होते हुए भी समग्र कथा से जुड़ा हुआ है। अध्यायों के शीर्षक विशेष ध्यान आकर्षित करते है, जिनमें भाव और संकेत दोनों निहित हैं। इससे पुस्तक को एक लयात्मकता प्राप्त होती है।

कथन-तकनीक की दृष्टि से यह कृति विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लेखक ने प्रथम पुरुष कथन शैली अपनाई है, जिससे पाठक सीधे उनके मनोविश्व में प्रवेश कर पाता है। यह आत्मीयता पाठक और लेखक के बीच एक जीवंत संवाद स्थापित करती है। कहीं-कहीं फ्लैशबैक का प्रयोग कथा को और अधिक प्रभावशाली बना देता है। स्मृतियां रैखिक क्रम में नहीं आतीं, बल्कि वे तरंगों की तरह उठती-बैठती हैं, जिससे कथा में समय का एक बहुआयामी बोध निर्मित होता है। यह समय-उलटाव स्मृति की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है, जो पाठक को लेखक के अनुभवों के अधिक निकट ले जाता है।

चरित्र-निर्माण इस कृति का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। यहां लेखक ही केंद्र में नहीं है, उसके आसपास के लोग भी पूरे जीवंत रूप में उपस्थित होते हैं। पिता का व्यक्तित्व अनुशासन और जिम्मेदारी का संकेत देता है, मां स्नेह और संरक्षण का प्रतीक बनकर उभरती है, मित्र जीवन-संघर्ष के सहयात्री के रूप में दिखाई देते हैं, और प्रेमिका उस अपरिमेय प्रेम की संवेदना को साकार करती है, जो पूरी कृति का भाव-केंद्र है। ये सभी पात्र केवल व्यक्ति नहीं रह जाते, बल्कि कई स्तरों पर प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण कर लेते हैं। उनकी उपस्थिति कथा को गहराई प्रदान करती है और पाठक को अपने जीवन के समानांतर पात्रों की याद दिलाती है।

मनोज इष्टवाल ने पहाड़ के जीवन, संस्कृति और परिवेश को अत्यंत आत्मीयता से चित्रित किया है। गांव का जीवन, लोक पर्वों का उत्साह, पारिवारिक संबंधों की ऊष्मा और संघर्षों की कठोरता—ये सब इतने स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत हुए हैं कि पाठक उस वातावरण को अनुभव करने लगता है, उसके साथ साधारणीकरण हो जाता है। विशेष रूप से गढ़वाली बोली का प्रयोग कथा को और अधिक प्रामाणिक बनाता है। यह प्रयोग हिंदी के प्रवाह को बाधित नहीं करता, बल्कि उसे समृद्ध करता है। आंचलिक प्रभाव के बावजूद यह कृति केवल किसी एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह जाती, इसके अनुभव सार्वभौमिक हो जाते हैं। प्रेम, संघर्ष, स्मृति और आत्मस्वीकृति जैसी भावनाएं हर मनुष्य के जीवन का हिस्सा होती हैं, इसलिए यह कथा हर पाठक को अपनी लगने लगती है।

प्रेम की अवधारणा इस पुस्तक का केंद्रीय तत्व है। यहां प्रेम केवल प्राप्ति का नाम नहीं है, बल्कि त्याग, धैर्य और स्मृति का नाम है। यह अधूरा प्रेम होते हुए भी अपूर्ण नहीं है। इसमें एक प्रकार की गरिमा और गहराई है, जो इसे साधारण प्रेम-कथाओं से अलग बनाती है। लेखक ने इस प्रेम को किसी नाटकीयता के साथ प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि उसे जीवन के स्वाभाविक प्रवाह में पिरोया है। यह प्रेम समय के साथ बदलता नहीं, वरन स्मृति में स्थिर होकर और अधिक गहन हो जाता है। यही कारण है कि यह प्रेम पाठक के भीतर भी एक दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ता है।

किताब की भाषा सरल, सहज और प्रवाहमयी है। इसमें अनावश्यक अलंकरण नहीं है, बल्कि एक सीधी और प्रभावी अभिव्यक्ति है। पत्रकार-लेखक होने के कारण मनोज इष्टवाल की भाषा में संप्रेषणीयता प्रमुख है। वे बात को घुमाते नहीं, बल्कि सीधे और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करते हैं। यही सादगी पाठक को बांधती है और उसे अंत तक जोड़े रखती है।

‘आत्मविश्लेषण’ नामक अंतिम अध्याय में लेखक ने पीड़ा को इस तरह बुना है कि कोई भी संवेदनशील पाठक अपने आप को इससे गहरे रूप में जोड़ सकता है। वे लिखते हैं, ‘मेरी कमीज के बटन धड़ाधड़ टूटकर उसकी मुट्ठी में कैद हो गए। वह पालकी से बाहर निकलकर मुझे बांहें फैलाए ऐसे बुला रही थी, जैसे मैं न जाऊं तो उसकी जान निकल जाएगी। मुझे जोर का धक्का लगा और मैं दीवार के पत्थरों से टकराते-टकराते बचा। तब तक पालकी ओझल हो गई थी। उस समय भला किसे यह ध्यान रहता कि कौन गिरा और कौन संभला।’

प्यार की टीस लिए हुए लेखक ने जिंदगी के कई दशक पहाड़ से महानगरों और फिर महानगर से घर लौटने की प्रक्रिया में बिताए, लेकिन उनके हृदय में मौजूद इस द्वंद्वात्मक भाव का कैथार्सिस तब संभव हुआ, जब उन्होंने अपनी गहन और व्यापक अनुभूतियों को ‘वो साल चौरासी’ के रूप में दर्ज किया।

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो कुछ स्थानों पर दोहराव दिखाई देता है, जिसे थोड़े संपादन के माध्यम से और सघन बनाया जा सकता था। इसी प्रकार, प्रूफ संबंधी कुछ त्रुटियां भी पुस्तक के पाठ में बाधा उत्पन्न करती हैं। हालांकि ये कमियां कृति की मूल संवेदना को प्रभावित नहीं करतीं, लेकिन उन्हें सुधारा जाता तो इसका प्रभाव और बढ़ जाता। यह पुस्तक विशेष रूप से ऐसे साहित्य प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण है जो अपने जीवन के अनुभवों को समझना चाहते हैं, जो प्रेम और स्मृति की गहराइयों में उतरना चाहते हैं, उनके लिए यह महत्वपूर्ण सहयात्री सिद्ध हो सकती है। यह केवल पढ़ने की नहीं, बल्कि महसूस करने की पुस्तक है। इसे पढ़ते समय पाठक कई बार अपने ही जीवन के उन क्षणों में लौट जाता है, जिन्हें वह शायद भूल चुका होता है।

‘वो साल चौरासी’ को केवल एक प्रेमकथा के रूप में सीमित करना उचित नहीं होगा। यह स्मृति, संवेदना, आत्मस्वीकृति और जीवन के द्वंद्वों की एक गहन यात्रा है। इसमें लेखक ने अपने अनुभवों के माध्यम से उस सत्य को व्यक्त किया है, जो व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक है। यही इस कृति की सबसे बड़ी सफलता है कि यह पाठक को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है और उसे यह एहसास कराती है कि अधूरापन भी अपने भीतर एक प्रकार की पूर्णता लिए होता है।

डॉ. सुशील उपाध्याय
लेखक एवं शिक्षाविद
9997998050

Himalayan Discover
Himalayan Discoverhttps://himalayandiscover.com
35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
RELATED ARTICLES