(वेद उनियाल )
ज्योति और नीरजा उप्रेती उत्तराखंड और उससे बाहर भी उप्रेती सिस्टर के नाम से जानी जाती है। दोनों बहनें लोक मंच, थियेटर और विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों में गीत संगीत के साथ प्रस्तुति देती है। सोशल मीडिया में भी उनकी प्रस्तुति प्रभावित करती है। कभी किसी पुराने गीत या कभी अपने किसी नए गीत के साथ प्रस्तुति देती हैं तो वह सबके मन को भाता है। बहुत कम समय में उन्होंने यह पहचान बनाई है कि लोग उनकी नई रचना की प्रतिक्षा करते हैं। ज्योति और नीरजा ने नया गीत गाया है… “पहाडी छां हम पहाड़ी रुनेर”। गीत मन को छूता है।
गुरुवार दून में एक आयोजन में इस गीत को रिलीज किया जा रहा है। ज्योति और नीरजा ने पहाड़ी राग पर इस गीत को गाया है।
गीत को उत्तराखंड के परिवेश में उन्मुक्त शैली में गाया गया है। पहाड़ी छा हम रुनेर गीत को उन्होंने स्वयं लिखा है। इस गीत में पहाड़ों की मिट्टी की खुशबू है। आशय यही कि हम ऊंचे हिमालयी क्षेत्र में ठंडी हवाओं में रहने वाले स्वाभिमानी मेहनती लोग है। पहाडों के इस सुंदरता जीवन शैली परंपरा की हम दूर प्रदेशों तक अपने बंधुओं को इन गीतों से याद दिलाते हैं। गीत में गहरी भावुकता है और गायकी में शब्दों का सुंदर अहसास। इसका संगीत चंदन ने दिया है।
स्वीडन की दो बहनें जोहाना और क्लारा इसी तरह वहां के लोकगीतों को मिलकर गाती है और उनके गायन को पसंद किया जाता है। बिल्कुल इसी तरह ज्योति नीरजा ने खासकर कुमाऊंनी लोक संगीत को नई पहचान दी है। यह गायकी का नया स्वरूप है।
ज्योति और नीरजा ने अपने गायन से उत्तराखंड के पारंपरिक छपेली, झोड़ा, सेदई गीत को देश दुनिया तक पहुंचा रही है। होरी के गीतों को भी वह पूरी तन्मयता से गाती हैं। ऐसे समय जब लोक संगीत को बनाए रखने की बात हो रही है तब दूरदर्शन के कार्यक्रम में मासी कू फूल , खोल देमाता खोल भवानी गीत को उनसे सुना गया। सांस्कृतिक विरासत की पहचान बनाने के लिए बेडू पाको बड़मासा गाती नजर आईं तो कही उन्हें सुना गया यो बाटो का जाणों होलू। निर्वाण षटकम गंगा स्त्रोतम , न मंत्र नो यंत्र को पहाड की स्वरागनी कही जाने वाली इन बहनों ने शुद्ध और मधुर शब्द दिए है।
वह पहाडों के गीत गाते हुए लोकमंगल की गायिका हैं और मंत्र श्लोक को कहते हुए अध्यात्म की ओर ले जाने वाली कलाकारा हैं । मोहन उप्रेती गायन के जिस स्वरूप को कभी गोपाल बाबू गोस्वामी में देखते थे, वो कला आज के समय इन बहनों में मुखरित हुई है। जी के इंडिया यूथ समिट में उनसे देवी स्तुति सुनना और जय देव भूमि उत्तराखंड सुनना दूर देश से आए लोगों को भी भाया। दिल्ली दूरदर्शन के लिए शिव भजनों की उनकी रिकार्डिंग अपना प्रभाव रखती हैं । गांदा हम जय गौरव गान गाने वाली उप्रेती बहनें जब होरी को फगवा दे हो आशीष . दो शीशी भर दे गुलाल , हरी धरे मुकुट खेले होरी गाती हैं तो फाग सज जाता है। हिंदी फिल्मों के गीत ये दिल और उनके, हुस्न पहाडों का , कोरा कागज था ये मन मेरा जैसे गीत कभी सुनिए।
ज्योति आकाशवाणी की कलाकार हैं और उनकी छोटी बहन नीरजा फिजियोथेरेपिस्ट हैं। संगीत के प्रति उनका रुझान बचपन से रहा है। पहाडों के जीवन सामाजिक परिवेश गीत संगीत से वह बहुत प्रभावित रही हैं। उप्रेती बहनों ने अपने सहगायन में जब भी कोई नई प्रस्तुति दी उसे उत्तराखंड के लोगों ने भाव विभोर होकर सुना।
सुमधुर आवाज के साथ शब्दों की स्पष्टता और लय ताल का तो वह ख्याल रखती ही हैं लेकिन गीतों के प्रस्तुतिकरण में उनकी भाव भंगिमा भी अद्भुत होती है। यही वजह है कि उनकी हर नई प्रस्तुति को सराहना मिलती है। ज्योति और नीरजा प्रफुल्लित मन से गाती है। गाना उत्तराखंड की वेदना ,संघर्ष या जीवटता का हो तो उसे उसी भाव में गाती हैं। हर्ष उल्लास लोक परंपरा का हो तो उसे उसी भाव में गाया है। संस्कृत के मंत्रों श्लोंको को भी ऐसा स्वर दिया है कि जिसकी खासकर अध्यात्म वाली देवभूमि में हमेशा अपेक्षा रही है।

