ये पब्लिक है सब जानती है..
हरक सिंह रावत बनाम हरीश रावत, हरीश धामी, गोविन्द सिंह कुंजवाल, प्रदीप टम्टा की बयानबाजी की धिंगा-मुश्ती में उभरते सवाल
यह टिकट बंटवारे को हथियाने की कूटनीति है या फिर भाजपा की रणनीति का चक्रव्यूह
मनोज इष्टवाल)
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में आपसी बयानबाजी का दौर अभी से शुरू हो गया है, जबकि चुनाव की तिथि अभी तय तक नहीं हुई। क्या यह वर्चस्व की लड़ाई है? या फिर टिकट के बंटवारे को लेकर घेराबंदी..? ऐन चुनाव से पूर्व उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में चाणक्य माने जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने जो महाभारत का शंख बजाया उसके किरदार संजय हैं, वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत ने प्रतिध्वनि में युधिष्ठिर की भूमिका निभाते हुए कह दिया – “अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा”
विगत 28 मार्च को पार्टी में 6 नेताओं की ज्वाइनिंग के बाद शुरू हुआ विवाद अब गहराता जा रहा है और बगावत के सुर तेज होते दिख रहे हैं। इस तकरार की शुरुआत तब हुई जब पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत रामनगर के नेता संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल कराना चाहते थे, लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई। इससे नाराज होकर हरीश रावत 15 दिन के ‘राजनीतिक अवकाश’ पर चले गए। उनके इस कदम ने पार्टी के भीतर हलचल बढ़ा दी। उनके राजनीतिक अवकाश पर हमेशा ही उनकी ढाल रहे धारचूला विधायक हरीश धामी, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोबिंद सिंह कुंजवाल व पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रदीप टम्टा के अपने बयानों से पूरे प्रकरण को गर्माहट देकर प्रदेश में राजनीतिक हलचल पैदा कर दी है।
हरीश रावत की पार्टी में अनदेखी का आरोप लगाते हुए धारचूला से कांग्रेस विधायक हरीश धामी ने सोशल मीडिया पर खुलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने हरीश रावत के समर्थन में बयान देते हुए यहां तक कह दिया कि यदि उनके आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है, तो समर्थक सामूहिक इस्तीफा देने से भी पीछे न हटें। धामी ने अपने पोस्ट में लिखा कि वह हरीश रावत का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे और जहां हरीश रावत होंगे, वहीं उनके समर्थक भी खड़े रहेंगे। उन्होंने पार्टी हाईकमान को भी चेतावनी भरे लहजे में कहा कि स्थिति को गंभीरता से लिया जाए।
इस विवाद में एक और बड़ा मोड़ तब आया जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता हरक सिंह रावत ने हरीश रावत को लेकर तीखा बयान दे दिया। हरक सिंह ने कहा कि किसी एक व्यक्ति के होने या न होने से पार्टी पर कोई फर्क नहीं पड़ता और किसी को यह गलतफहमी नहीं पालनी चाहिए कि उसके बिना पार्टी नहीं जीत सकती।
हरीश रावत के बयान पर पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ने हरीश रावत का समर्थन करते हुए कहा कि हरीश रावत को नाराज करके कांग्रेस उत्तराखंड में सत्ता में वापसी नहीं कर सकती। कुंजवाल ने यह भी स्पष्ट किया कि हरीश रावत का पार्टी के लिए योगदान बहुत बड़ा रहा है और उनकी अनदेखी करना नुकसानदायक हो सकता है।
गोबिंद सिंह कुंजवाल ने डॉ हरक सिंह रावत ने जवाब देते हुए कहा कि किसी भी नेता को घमंड नहीं होना चाहिए और पार्टी किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं रहती। उन्होंने व्यंग्य करते हुए कहा कि हरीश रावत राजनीति में लगभग सभी बड़े पदों पर रह चुके हैं और अब केवल प्रधानमंत्री का पद ही बचा है।
पूर्व राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा का भी बयान सामने आया है। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि अहंकार किसी की ताकत नहीं बल्कि कमजोरी होता है और नेताओं को एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की जरूरत है।
राजनीति के दिग्गजों का मानना है कि यह अंदरूनी विवाद भाजपा की बिछाई ऐसी जिबाळ (जाल) है, जिसमें कांग्रेस बुरी तरह उलझ गई है। यह सिर्फ संजय नेगी को कांग्रेस में शामिल करने का मामला कम बल्कि यह आगामी विधानसभा चुनाव में अपने-अपने उम्मीदवार के लिए टिकट की दावेदारी की राजनीतिक बिसात लगती है। जिसके खेल में पूर्व में भी कांग्रेस उलझ कर प्रदेश में अपना वर्चस्व खो चुकी है। उत्तराखंड कांग्रेस इस समय गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। वरिष्ठ नेताओं के बीच बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप ने पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव से ठीक पहले उभरी यह स्थिति कांग्रेस के लिए चुनावी फंदा राजनेता खुद बुनने लगे हैं। ऐसे में जनता जनार्दन यानि ये पब्लिक है सब जानती है.. के फॉर्मूले पर चलने को मजबूर रहेगी। यह कलह अगर यूँही आरोप प्रत्यारोप के दौर से आगे बढ़कर कांग्रेस हाई कमान पर टिकट बंटवारे का दबाब बनाने का यत्न करती है, तो तय मानिये भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली से नाराज चंद वोटर्स जो कांग्रेस को वोट करने का मन बना चुके थे, निराश होकर कांग्रेस की ही मिट्टी पलीत करने को आमादा दिखेंगे।
