गढ़वालियों के मध्य आकाश गंगा क्यों कहलाती है खाट-खटुली और भोर का तारा बीअणा!
इन्हीं से पता चलता था रात खुली या नहीं खुली
(मनोज इष्टवाल)
वर्तमान परिवेश में अक्सर हो यह रहा है कि हम कुछ मोबाइल में इतने उलझ गए हैं कि हमें इस बात का भी आभास नहीं होता कि देश दुनिया या घर परिवार में आखिर हो क्या रहा है. न रिश्तेदार, न दुःख-सुख और न किसी से बिशेष लगाव …! सच कहें तो हमें बाहर की दुनिया का यह भी पता नहीं चलता कि आज आकाश में बादल हैं तो लेकिन किस रंग के? हमने सुबह नाश्ता किया तो …लेकिन क्या किया होगा, शाम तक सोचना पड़ता है. आम जिन्दगी में नई पीढ़ी जिसे ZEN-Z के नाम से जाना जा रहा है वह दिन भर ऑनलाइन होकर भी अपने वर्कप्लेस में इतने फ्रस्ट्रेट से हो गए हैं कि उन्हें घर परिवार संग बात करने की फुर्सत नहीं होती. आज की पीढ़ी को सभी भौतिक सुख तो प्राप्त हो रहे हैं लेकिन शुकून भरी जिन्दगी हो यह कह पाना मुश्किल है. यह पीढ़ी अपना बोझ हल्का करने के लिए हर दिन पार्टी अरेंज करना चाहती है, कहते हैं Chill मारते हैं यार….! ऐसे में बड़ा प्रश्न यह है कि क्या हम प्रकृति प्रदत्त जल, जंगल, जमीन ही नहीं अपितु धरती, आकाश और पाताल से अपने संवाद कायम करने में सफल हो पा रहे हैं या विकास की बाढ़ में सिर्फ इनका शोषण करना ही हमारा मूल उद्देश्य रह गया है?
दरअसल पिछले दिनों जब मैं अपने गाँव में था, तब सुबह सबेरे अपने घर के बाहर बर्तन बजने की आवाज सुनाई दी. सर्द मौसम में घर के बाहर बर्त्तन बजना अपने आप में आशंका पैदा करता है. मैं बिस्तर में लेटे-लेटे ही जोर से बोला – कौन है बाहर ..! बाहर से आवाज आई- मैं हूँ. समझ गया कि हमारे जगदीश भाई साहब हैं. मैं बोला इस घुप्प अँधेरे में आप कर क्या रहे हैं. वह बोले- अबे, रात कहाँ रही . धार में बीयणा आ गया है और देख खाट-खटुली भी साथ दिन रही है. मैं तुम्हारे नहाने के लिए पानी गर्म कर रहा हूँ. खैर ये बता कि तुझे बीअणा देखे कितने बर्ष हो गए? मुझे नहीं लगता कि शहरों में तुम लोग बीअणा और खाट-खटुली देख पाते होंगे? हमारा यह सब संवाद गढ़वाली में ही हो रहा था. सच कहो तो बीअणा तो मेरी समझ आ गया था लेकिन खाट-खटुली समझ नहीं आया. मैं झट से उठा तो देखा पाली गाँव की धार में तेज रौशनी वाला ध्रुव तारा जिसे भोर का तारा भी कहते हैं , चमचमा रहा था व उसके ठेठ ऊपर सप्तऋषि मंडप यानि आकाश गंगा ! मैं ख़ुशी से चिल्ला पड़ा- वाह.. बीअनया के साथ आकाश गंगा भी…! भाई साहब बोले- ओहो हो गया रे तू पूरा देशी! कुछ दिनों बाद गढ़वाली बोलना भी छोड़ देगा. मुझे भैजी की जगह भाई जी बोलेगा, जिसमें रस न कस..! आकाश गंगा को ही हम खाट-खटुली बोलते थे. इन्दा बिंदा रांगण झोळी, घिये कमोलि टपक बिंदा ..तो तू भूल ही गया होगा. फिर मेरे आँगन में जली आग की लकड़ियों में फूँक मारकर बड़बड़ाते हुए उसमें पतीला भर पाणी चढ़ाने लगे. मैं तारों में उलझे उस अप्रितम सौन्दर्य को देखता रहा जो निश्छल निष्कपट बचपन में माँ के पल्लू के साथ इसी बेला में उठा करता था और माँ अंगुली से दिखाकर बोलती थी- यह बीअणा है और वह खाट खटुली….!
