सूचना निदेशक रणवीर सिंह चौहान की लरजती आवाज..! शिमले नि बसणा, कसौली नि बसणा.. चम्बे जाणा जरूर…।
(मनोज इष्टवाल)
किसी भी संस्कृति का पोषक उसका समाज ही होता है। समाज चाहे तो अपनी लोकविधा व सांस्कृतिक मूल्यों को वानगी धरा से अनंत तक ले जाये और अगर चाहे तो धरा की मिट्टी में ही जमींदोज कर दे। दरअसल उत्तराखंड के कुमाऊं गढ़वाल के पलायनवादी समाज में ऐसे सुरमा पैदा हुए हैं जो यहां की मिट्टी का अन्न, जल, वायु, प्रकृति व शिक्षा लेकर आगे तो बढ़े लेकिन जरा कुछ बन क्या गये उन्होंने यहां की बोली भाषा, लोकसमाज, लोकसंस्कृति व यहां की आबोहवा ही नहीं बल्कि पहनावे का भी परित्याग कर दिया। जो पढ़ लिखकर बड़ा बना परिवार उसके साथ और बड़ा बनकर मैदानी भू भाग के रईसाना ठाठ-बाट में सिर्फ अपने तक ही सीमित रह गया व आज वह स्वयं की पहचान तक के लिए मोहताज है। ऐसे कई बड़े परिवार बड़े घर खंडहर बंजर हैं जिनके कई पुश्तों का इतिहास किताबों में दर्ज है लेकिन वर्तमान पुश्तें कहाँ हैं व क्या हैं कोई नहीं जानता।
गढ़वाल में पौड़ी और कुमाऊं में अल्मोड़ा के सबसे ज्यादा धन्नासेठों, सम्भ्रान्त घरानों ने सर्व प्रथम अपनी यह पहचान मिटाई व अब वे पहाड़ों के लिए प्रवासी कहलाने लायक भी नहीं रहे। मैदानों में भी उनकी पहचान “कठमाली”के रूप में होती है।
लेकिन रूपिन-सूपिन वैली, यमुना-तमसा घाटी, गोरी-काली नदी घाटी हो या फिर भागीरथी, नीति-माणा नदी घाटी..! इन्होंने अपनी सभ्यता व संस्कृति को पूर्णतः न सही लेकिन अभी भी 80 से 90 प्रतिशत अंगीकार कर रखा है। ये लोग अपनी लोकसंस्कृति, लोकसमाज की बुनियाद के इतने बड़े धन्नासेठ हैं कि कहीं भी मैदानी भू-भागों में निकल जाएं तो भी इनका आभामंडल उनका स्वयं में यह परिचय दे देता है कि ये लोग देवभूमि के हिमवासी हैं। जिनके प्रति समाज में हृदय से एक अलग आदर निकलता है जो एक सत्यनिष्ठ व वफादार समाज की परिकल्पना का द्योतक है।
आइए आज आपको तमसा यमुना घाटी सभ्यता के उस महत्वपूर्ण क्षेत्र की चिरायु संस्कृति व समाज के एक ऐसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी से रूबरू करवाते हैं जिसके अंग-अंग में अपनी माटी का ऐसा रंग चढ़ा है जो उतारने पर भी नहीं उतरता। तमसा अर्थात टोंस नदी के किनारे बसा जौनसार बाबर क्षेत्र का एक सम्भ्रान्त गांव है क्वाणु…. जिसके खेतों की फाट लगभग 3 किमी की समतल दूरी तय करती हुई अपनी समृद्धि का इतिहास दोहराती है। यह वह गांव है जहां के राणाओं, चौहानों ने अपनी तलवार के दम पर कई दशकों तक राजा सिरमौर व राजा गढ़वाल को कई सूरमा दिए हैं। भले ही यह घाटी व यहां के लोक समाज के मध्य वीर भड़ लोदी रिखोला, हरि-हंसा हिन्दवाण व माधौ सिंह भंडारी द्वारा सिरमौर राज्य पर बरपाए कहर की गाथाओं का आज भी कहीं न कहीं कसैलापन दिखता है व इनके हारुलो व अत्याचारों का जिक्र सुनने को मिलता है लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि दो राजाओ के आपसी युद्ध का सबसे ज्यादा खामियाजा वहां की सीमावर्ती जनता को ही भुगतना पड़ा है।
इसी क्वाणु (क्वानू) गांव के आईएएस अधिकारी (महानिदेशक सूचना उत्तराखंड शासन) रणवीर सिंह चौहान का अपनी माटी से प्यार गाहे बगाहे छलकता ही रहता है। वह अक्सर अपने लोक पहनावे के साथ सामाजिक व सांस्कृतिक मंचों पर दिखाई देते हैं। उनकी आवाज की स्वर लहरी में जब उनके कंठ की सरस्वती बहती है तो लगता है मानों तमसा नदी का बहाव थम सा गया हो। उनके सुर की गूंज तमसा अर्थात टोंस नदी आर-पार बसे उत्तराखंड-हिमाचल की लोकसंस्कृति का ऐसा जयगान करते हैं कि आप पृथ्वीलोक के परमानंद की अनुभूति करने लगते हैं।
यह उनकी आवाज की पहाड़ी खनक ही है कि उसकी खनक आपको आंखें मूँदते ही उत्तराखंड से हिमाचल के खूबसूरत शहरों व वहां की लोक संस्कृति से रूबरू करवा देती है। वे जब गाते हैं व उस गायन को अपने अंदर समाते चले जाते हैं तो उनकी आंखें खुद व खुद शब्दों की गहराई में उतरकर अनन्त तक पहुंच जाते हैं। यह एक बड़े अधिकारी के लिए बड़ा मुश्किल भरा काम है कि वह गायन के लिए वक्त निकाले व उस गायन में भी अपनी लोकसंस्कृति के अंश वंश का जयगान करे।
“माहिन मेरीये शिमले दी राहें, चम्बा कितनी दूर …!” गीत भले ही हिमाचल की लोक संस्कृति की चास में डूबा एक जलेबी की तरह रसभरा गीत है, जो हिमाचल की लोकसंस्कृति के आयामों का बखान करता है। लेकिन उसे जितने सुरीले कंठ से रणवीर सिंह चौहान जी ने प्रस्तुत किया है वह शिमला व देहरादून का फर्क मिटा देता है। ऐसा आभास होता है जैसे पूर्व में यह क्षेत्र भी जालन्धर नरेश लाखामण्डल की रानी ईश्वरा व उसकी पुत्री बिऊरी (भिरूढ़ि) का ही रहा हो। सच कहूं तो जितने कोमल कंठ से उन्होंने इस गीत के बोलों को सजाया है उतने कोमल कंठ बमुश्किल रोज रियाज करने वाले सुप्रसिद्ध लोकगायकों के ही हो सकते हैं।
मुझे इस बात का गर्व है कि हमारे प्रदेश को एक ऐसा अधिकारी मिला है जिसकी रग-रग में उसका लोकसमाज व लोकसंस्कृति रची बसी है। और…यही कारण भी है कि जौनसार बावर का लोकसमाज अभी भी अपनी मजबूत जड़ों के साथ न सिर्फ तमसा यमुना घाटी के लोकसमाज का प्रतिनिधित्व करता है बल्कि वह सम्पूर्ण उत्तराखंड के लोक समाज व लोकसंस्कृति का प्रतिनिधित्व करता दिखाई देता है। शायद ऐसे ही बिरले व्यक्तित्व हमें मजबूती से यह साबित करवाने के विकल्प हैं कि हमारा समाज व लोकसंस्कृति की जड़ें मजबूती से आदि से अंत तक यूँहीं जमी मिलेगी। वरना विश्व के इतिहास के कई संभ्रात देश जिन्होंने अपनी संस्कृति व समाज की रक्षा नहीं की वे अपना समूल नाश कर बैठे। हम सबके सामने यूनान, मिस्र, रोम इसके बड़े उदाहरण हैं।