दैड़ा डांडा ट्रैक रूट..! जहां बुथाड कोली को ऊँचे आसमान तक उड़ा ले गई थी परियां/आँछरियाँ।
(मनोज इष्टवाल 26/10/2020)
(नंदा देवी मंदिर दैड़ा डांडा पयासू गांव)
वह बुक्साड विद्या का महान तांत्रिक था। कुछ विद्वानों का मानना था कि वह आगम तंत्र, यामल तंत्र और मुख्य तंत्र, आगम में शैवागम, रुद्रागम और भैरवागमन में से कई अन्य तंत्र विद्याओं का जानकार भी था। भूत-प्रेत और क्रूर आत्माएं उसका नाम सुनते ही थर्र-थर्र कांपती थी। वह शमशानी साधक था, जिस शमशान घाट में प्रवेश कर लेता था वहां की मृत आत्माएं रात्रि प्रहर में दुबक जाया करती थी। लेकिन एक दिन ऐसा भी आया कि यही विद्याएं उसके लिए काल बन गयी क्योंकि उसने नौ बैनी आँछरियों, आगासिया परियों को अपना दुश्मन जो बना लिया था। नाम था बुथाड कोली।
कफोलस्यूँ पट्टी के ग्राम नौली निवासी बौरंगी कोली के तीन पुत्र कल्या (कल्याण सिंह), बुथाड व औसन कोली में बुथाड बीच के थे। महान तांत्रिक बुथाढ़ कोली के पौत्र वरिष्ठ पत्रकार जगमोहन आजाद से प्राप्त जानकारी के अनुसार कल्या कोली के तीन पुत्र, बुथाड कोली के छः पुत्र व ओसन कोली के तीन पुत्र हुए। बुथाड कोली के छः पुत्रों में प्यांर सिंह, दलीप सिंह, ठाकुर सिंह, उम्मेद सिंह, प्रसन्न सिंह व आनंद सिंह हुए। जिनमें प्रसन्न सिंह ने नौकरी के बाद अपनी पुस्तैनी वृत्ति संभाली जो उनके पिता बुथाड़ कोली से उन्हें विरासत में प्राप्त हुई। उनके अलावा उनके पुत्र दिलबर सिंह, बिक्रम सिंह और भजन सिंह ने इस विद्या को संभालेे हुुुए हैं।
वहीं बुथाड कोली के बड़े भाई प्यार सिंह के पुत्र साबर सिंह व जसपाल सिंह ने भी वृत्तिबाड़ी सम्भाली है। वर्तमान में यह परिवार व इसके वंशज अच्छे -अच्छे पदों पर सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थानों में कार्यरत हैं।
बुथाड कोली के लिये वह दिन शायद उनके लिए काल बनकर आया था, जब उन्हें दैड़ा डांडा ट्रैक रूट से गुजरना पड़ा। यह पर्वत शिखर पयासू, ध्वीली, सिलेथ, सरक्याणा व मासों गांव की सरहदों को आपस में बांटती है। और इसी के लगभग मध्य भाग में पयासू गांव की सरहद में माँ नन्दा का मंदिर है। जहां हर चैत्र मास में ये आगासिया परियां व नौ बहन आँछरियाँ अपनी हाजरी लगाने आती थी। तब न यहां पेड़ हुआ करते थे न इतना विशाल मंदिर ही था। हैं इसके पास ही ध्वीली गांव का एक घना चीड़ वृक्षों का जंगल जरुर था लेकिन इनका इस मंदिर से कोई वास्ता भी नहीं था। बताया जाता है कि इन नौ बहन आँछरियाँ का ठऊ-ठिकाना सिलेथ गांव की उतुंग शिखर में स्थित एक चट्टानी गुफा में था।
विकास खंड कल्जीखाल के बारहस्यूँ मंडल के पौडी गढ़वाल के इस दैड़ा डांडा से जुड़ी हुई यूँ तो कई कहानियां हैं लेकिन यह सबसे अद्भुत है क्योंकि यहां रह रही परियों/आँछरियों से बुथाड़ कोली ने दुश्मनी जो मोल ले ली थी। चलिये इस सारे प्रसंग पर जाने से पूर्व थोड़ा तंत्र विद्या के बारे में आपको जानकारी दे दें।
साधारण अर्थ में तंत्र का अर्थ तन से, मंत्र का अर्थ मन से और यंत्र का अर्थ किसी मशीन या वस्तु से होता है। तंत्र का एक दूसरा अर्थ होता है व्यवस्था। तंत्र मानता है कि हम शरीर में है यह एक वास्तविकता है। भौतिक शरीर ही हमारे सभी कार्यों का एक केंद्र है। वाराही तंत्र के अनुसार तंत्र के नौ लाख श्लोकों में एक लाख श्लोक भारत में हैं। तंत्र साहित्य विस्मृति के चलते विनाश और उपेक्षा का शिकार हो गया है। अब तंत्र शास्त्र के अनेक ग्रंथ लुप्त हो चुके हैं। वर्तमान में प्राप्त सूचनाओं के अनुसार 199 तंत्र ग्रंथ हैं। तंत्र का विस्तार ईसा पूर्व से तेरहवीं शताब्दी तक बड़े प्रभावशाली रूप में भारत, चीन, तिब्बत, थाईदेश, मंगोलिया, कंबोज आदि देशों में रहा। तंत्र को तिब्बती भाषा में ऋगयुद कहा जाता है। समस्त ऋगयुद 78 भागों में है जिनमें 2640 स्वतंत्र ग्रंथ हैं। इनमें कई ग्रंथ भारतीय तंत्र ग्रंथों का अनुवाद है और कई तिब्बती तपस्वियों द्वारा रचित है।
तंत्र से ही सम्मोहन, त्राटक, त्रिकाल, इंद्रजाल, परा, अपरा और प्राण विद्या का जन्म हुआ है। तंत्र से वशीकरण, मोहन, विद्वेषण, उच्चाटन और स्तम्भन क्रियाएं भी की जाती है। जौनसारी तंत्र विद्या में सुनने को मिलता था कि वे अपनी तंत्र विद्या से व्यक्ति को बकरी बना देते थे। यह बात सिर्फ जौनसार में नहीं बल्कि 199 तंत्र विद्याओं में से एक विद्या जरूर है जिसमें इसी तरह मनुष्य से पशु बन जाना, गायब हो जाना, एक साथ 5-5 रूप बना लेना, समुद्र को लांघ जाना, विशाल पर्वतों को उठाना, करोड़ों मील दूर के व्यक्ति को देख लेना व बात कर लेना जैसे अनेक कार्य ये सभी तंत्र की बदौलत ही संभव हैं।
बुथाड़ कोली के बारे में अगर संक्षेप में कहा जाय तो उनके लिए ये दो श्लोक ही काफी हैं-
शांति, वक्ष्य, स्तम्भनानि, विद्वेषणोच्चाटने तथा।
गोरणों तनिसति षट कर्माणि मणोषणः॥
अर्थात शांति कर्म, वशीकरण, स्तंभन, विद्वेषण, उच्चाटन, मारण ये छ: तांत्रिक षट् कर्म।
इसके अलावा नौ प्रयोगों का वर्णन मिलता है:-
मारण मोहनं स्तम्भनं विद्वेषोच्चाटनं वशम्।
आकर्षण यक्षिणी चारसासनं कर त्रिया तथा॥
अर्थात: मारण, मोहनं, स्तम्भनं, विद्वेषण, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण, यक्षिणी साधना, रसायन क्रिया तंत्र के ये 9 प्रयोग हैं।
तंत्र साधना में देवी काली, अष्ट भैरवी, नौ दुर्गा, दस महाविद्या, 64 योगिनी आदि देवियों की साधना की जाती है। इसी तरह देवताओं में बटुक भैरव, काल भैरव, नाग महाराज की साधना की जाती है।
उक्त की साधना को छोड़कर जो लोग यक्षिणी, पिशाचिनी, अप्सरा, वीर साधना, गंधर्व साधना, किन्नर साधना, नायक नायिका साधान, डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर आदि की साधनाएं निषेध है।
सीधी सी बात है कि बुथाड़ कोली सिर्फ तंत्र विद्या तक ही सीमित नहीं थे बल्कि वे इनके अलावा अघोरी तंत्र भी जानते थे जिनमें यक्षिणी, पिशाचिनी, अप्सरा, वीर साधना, गंधर्व साधना, किन्नर साधना, नायक नायिका साधान, डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर साधनाएं प्रमुखता से उनके पोथी तंत्र में शामिल थे।
बुथाड़ कोली के बारे में किंवदंती है कि उन्होंने समैणा (भूतनी) को या भूतों के रानी को गन्थर मन्त्र से उन्होंने घिसकुली पत्थर पर चिपका दिया था जो प्रमाणिकता के तौर पर आज भी जखेटी- जाखाली पैदल मार्ग में तल्ला समनख्यात से लगभग 30 मीटर दूरी पर स्थित है। बाद में क्षमा याचना के बाद बुथाड़ कोली ने उसे अभय दान दे दिया। बदले में भूतनी उसे अपना 7 हाथ लम्बा बाल दे गई और कहा कि आज से कोई भी दुरात्मा तुम्हारे नाम से ही भाग खड़ी होंगी। इस घटना के बाद बुथाड़ कोली का नाम चारों ओर फैल गया। उनके समकक्ष तांत्रिक उनसे जलने लगे। कहा जाता है कि किसी तांत्रिक ने उन्हें उलाहना दिया और कहा कि तू इतना ही बड़ा तांत्रिक है तो नौ बहन आँछरियों व आगासिया परियों को वश में करके दिखा।
बुथाड़ कोली के तंत्र पिटारे में 7 हाथ लम्बा बाल ही नहीं बल्कि मैमंदा वीर, चार बीर चौरासी सिद्ध, मैमंदावरी माता पिंगला, मैमंदा वीर, चौरासी चेड़ा, मड़-मसाणी, कुढोणा होटमणा, मारकंरवां, उल्लुपाक उखेला , रात सुइलो को नरग, मूल्या-की- माटी, चौबाट-की-धूल, धुनि की चुंगटी, काल़ा मासा, पिंगला धानोवला, बीर भनैडा, बार वीत्या , छतीस रोग, माता तुरकरणी का बोल इत्यादि जाने क्या क्या कैद था।
बस यहीं आकर बुथाड़ कोली की बुद्धि दिग्भर्मित हो गयी क्योंकि जिन ऐड़ी, आँछरी, लहु-पिपासिनी व आगासिया परियों पर स्वयं तंत्र के देवता त्रिकाल शिब भी वश में करते करते थक गए उन्ही से बुथाड कोली ने पंगा ले लिया था। वह हर रोज नानसु धार की बालकुंवारी-थापली डांडा- जाख की जाख डाली-चौडयूँ की बालकुंवारी- दैड़ा डांड़ा की नन्दा- कड़ैखाल की माता-टँगरोली की नन्दा से लेकर अदवाणी के प्रभाती तक रोज इन्हीं की तलाश में चक्कर काटने लगे।
बुजुर्गों का मानना है कि इन से बुथाड कोली का कई बार आमना-सामना हुआ भी लेकिन इन सभी देवियों के साधक बुथाड़ की इन्हीं देवियों ने रक्षा की। लेकिन धीरे धीरे बुथाड़ ने इन्हें भी गौण मानना शुरू कर दिया। कहा जाता है कि एक दिन नौ बहन आँछरियाँ व आगासिया परियां चैत्र मास भ्रमण में इनसे खफा हो ही गयी। बुथाड़ अपनी विद्या से इन्हें साधने का प्रयास करते रहे और ये परियां इन्हें लपेटने के चक्कर में इनके पीछे पड़ी रही। आखिर बुथाड़ घण्टों इनसे उलझते रहे। उनकी आवाज पयासू गांव, गुण्ड्ररु की साली बूंगा गाँव के ग्रामीणों तक लगातार पहुंचती रही। लेकिन भँवरों के बीच फंसे बुथ्याड़ को बाहर निकालने की हिम्मत किसी की नहीं हुई। आखिर आगासिया परियां अपने भंवर में बुथाड़ कोली को उड़ाकर आसमान में ले उड़ी लेकिन जैसे ही उनकी गांव की सरहद शुरू हुई बुथाड़ कोली ने अपनी पोथि के सभी तंत्रों को व भूतनी के बाल को दुहाई दी जिन्होंने भंवर रूप लेकर आगासिया परियों के साथ खूब संघर्ष किया। आखिर आँछरियों व आगासिया परियों को उन्हें अपने भंवर से आजाद करना पड़ा। लेकिन आगास की ऊंचाई से गिर रहे बुथाड़ कोली पर उनकी रक्षित विद्याओं का ध्यान नहीं गया। और जमीन पर गिरते ही बुथाड़ कोली की हड्डियां चकनाचूर हो गयी। कहते हैं कुछ दिन बुथाड़ जिंदा तो रहे लेकिन आगासिया परियों से ये उनका आखिरी संघर्ष उनके प्राण लेकर ही छूटा।
कहा जाता है कि नंदा देवी मंदिर पयासू के पास हुई घटना से आम लोगों के बीच यह रास्ता दिन में चलने के लिए भी भय पैदा करने वाला होता था क्योंकि इसकी हवाओं में तरह-तरह की सुगंधों के मिश्रण से एक भय का तिलिस्मी माहौल बना रहता था। लोगों का मानना है कि पयासू के मलासी जाति ब्राह्मणों ने इसी कारण बर्षों तक माँ नन्दा के मन्दिर का मेला बन्द कर इसकी अपने अपने गरों में ही पूजा शुरू कर दी थी। इसके पुजारी धारकोट गांव के पन्डित स्व. रुद्रीदत्त धौंडियाल थे जो घीड़ी गांव से आकर धारकोट गांव आ बसे।
पयासू गांव के बृजमोहन मलासी बताते हैं कि उन्होंने ग्रामीणों से सम्पर्क साधकर उन्होंने माँ नन्दा की पूजा या मेले को लेकर पहल करना प्रारम्भ किया। जिसके साकारात्मक परिणाम निकले और 2014 से वर्तमान तक लगातार हम लोग यहां मेला आयोजित करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा इस मेले के आयोजन से सबसे बड़ा साकारात्मक परिणाम ये निकला कि पलायन की जद में आये हमारे गांव में फिर से रौनक लौटने लगी है। उन्होंने कहा हमारे बाप दादाओं के जमाने में पंडित रुद्रीदत्त धौंडियाल यहां पुजारी के रूप में आया करते थे अब उनके पुत्र पन्डित कल्पानंद धौंडियाल व पंडित सुनील धौंडियाल यहां हर साल नन्दाष्टमी के मेले में बतौर पुजारी आते हैं।
बहरहाल अब यहां ग्रामीणों ने विशाल मंदिर बना दिया है व अब साथ ही यहां घना जंगल उग आया है। सच कहें तो यह रूट वर्तमान में साइकिल बाइकर्स के लिए स्वर्ग जैसा साबित हो सकता है क्योंकि पूर्व में भी यह राजपथ ट्रैक रूट के रूप में बेहतरीन राजपथ कहलाता था जो नानसुधार से लेकर आदवाणी तक तीन पट्टियों को बहुत संक्षेप पैदल पथ के रूप में जोड़ता है जो ज्यादात्तर शिखर की ऊंचाइयों से होकर गुजरता है। इसमें पटवालस्यूँ, पैडुलस्यूँ व कफोलस्यूँ की सीमाओं को आपस में जोड़कर डांग-थापला, टँगरौली, नलई-तुंडेढ़ कड़ैखाल-मासों, सिलेथ-सरक्याणा, अनन्तपुरी- पयासू, बूंगा-नौली, धारकोट-थपलखेत, जाखाल-नौडियालगांव-पाली, जाख-थापली-तोलवाड़ी, केबर्ष-गौंतपाणी, टिमरी-नानसु, गहड़-ख्वीड-पल्ली इत्यादि दर्जनों गांव हैं।
कहाँ कैम्पिंग कर सकते हैं:-
पहला कैम्प अदवाणी। दूसरा कैम्प कड़ैखाल (लगभग 8 से 10 किमी. दूरी) तीसरा कैम्प चौडयूँ डांडा या जाखाल (अदवाणी से 13 से 15 किमी. दूरी), अंतिम कैम्प नानसु धार (आदवाणी से लगभग 18 से 20 किमी) ।
वैसे ट्रैकर्स इसे दो या तीन दिन में भी बांट सकते हैं व हिल बाइकर्स मात्र एक दिन में। आप आदवाणी पौडी से या सतपुली कोटद्वार से सड़क मार्ग पहुंच सकते हैं। जबकि नानसु धार पहुंचने के लिए आपको कोटद्वार -सतपुली-पाटीसैण-ज्वाल्पादेवी-पीपलपानी -आमडाली से बाएं मुड़कर गहड़-पल्ली सड़क मार्ग पकड़ना होगा। पौडी से आप बुआखाल/बुबाखाल, घोड़ीखाल-गरुडा कैम्प परसुंडाखाल से कड़ैखाल पहुंच सकते हैं।


