Saturday, July 13, 2024
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यमुना घाटी की अनूठी संस्कृति..! जहाँ अर्थी के साथ ढोली करते हैं ढोल पैंशर नृत्य!

(मनोज इष्टवाल)

यह सचमुच बेहद अद्भुत व हैरत में डाल देने जैसा है! यमुना घाटी के रवाई क्षेत्र अर्थात नौगाँव बडकोट से लेकर यमनोत्री तक का समस्त क्षेत्र अपनी इस अनूठी संस्कृति के लिए आज भी जाना जाता है। यहाँ मृत व्यक्ति की अर्थी के साथ उसके रुतवे के अनुसार ढोल शमशान घाट तक पहुँचते हैं व हर एक गाँव का शमशान घाट से पहले एक ऐसा निहित स्थान होता है जहाँ बाजगी समाज के लोग पैंशर ढोल नृत्य के साथ हुतात्मा को अंतिम विदाई देते हैं।

विगत दो दिन पहले ही वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुसाईं ने सोशल साईट पर एक छोटी सी पोस्ट में लिखा कि अभी भी परम्परा जीवित है। उत्तरकाशी के कई इलाके हैं जहाँ  व्यक्ति के देहांत पर ढ़ोलो के साथ विदाई होती है।  पहले यह प्रथा जवान व्यक्ति के मरने पर भी थीं , लेकिन समय के साथ रोक लग गई। लेकिन बुजुर्ग व्यक्तियो के अंतिम यात्रा में है। बुजुर्ग व्यक्ति को मरने पर विदाई स्वरूप एक ढोल उनके रिश्तेदार देते हैं। इस प्रकार जिसके जितने संपन्न संबंधी उतने ढ़ोल। सदियों से यह परंपरा चली आ रही है। ढोल को उछाल कर बजाया जाता है। शव यात्रा रोकी जाती है। फिर ढोल , रंणसिंघा आखिरी ताल में बजते हैं। श्री चैन सिंह जयाडा, 87 साल , डखियाट गांव, बड़कोट सही में आज स्वर्ग चले गए। 15 जोड़ी ढोल, रंणसिंघ..!”

फोटो-शीशपाल गुसाईं

इस पोस्ट पर नजर पढ़ते ही मुझे 2007-08 की वह घटना याद आ गयी जब अपने मित्र व वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र जोशी, कैमरामैन सुहैल के साथ हम यमुना घाटी के रास्ते हर्षिल के किंग ऑफ़ हर्षिल (विल्सन) पर स्टोरी शूट करने जा रहे थे। तब बर्निगाड पुल पर पहुँचते ही मुझे दिखाई दिया कि एक डोली ढोल बाजों के साथ बर्नीगाड़ में उतर रही है। मैंने सुहैल को कहा- सुहैल फ़ौरन कैमरा सम्भालो देखो तो कोई डोली जात्रा जा रही है। यहाँ यात्रा सीजन में अक्सर यह सब होता ही है! हमें सुंदर विजुअल मिल जायेंगे। कार साइड की, सुहैल ने कैमरा सम्भाला और लगा शूट करने। अभी मैं माइक आईडी लेकर प्रश्न करने उतरा ही था कि सुहैल डोली से मेरी तरह लौटते हुए कान पर फुसफुसाया- सर, यह डोली नहीं बल्कि किसी वृद्ध व्यक्ति की अर्थी है। जिन पैरों की तीव्रता के साथ हम उतरे थे उसी तीव्रता से कार में आ बैठे। फिर तो हम लाखामंडल तक पहुँचते-पहुँचते हंस हंस कर लोट-पोट होते रहे! दरअसल यह मेरा भी पहला अनुभव था जब किसी आदमी की मृत्यु के बाद उसे अर्थी पर देखा हो।

ऐसे प्रसंग पर विजय राणा एक पौराणिक कहानी सुनाते हैं कि लोकगाथानुसार भानूकोटली ने अपनी मृत्यु का दिन पहले ही जान लिया था और इसी कारण वो नगदाड़ा के पास स्थित खराद से अपने लिए डोली (अर्थी )बनवाने लगे बादल फटने के कारण यह खराद भी इतिहास बन गई है, जैसे-२ डोली बनती वैसे-२ वो उस में बैठकर उसका निरीक्षण करते रहते और जब तक डोली तैयार हुयी तब तक 12 बनाल की जनता भी वहाँ पहुंच गई। भानू ने बनालियों व अपने गांव ,परिवार से उनका अंतिम संस्कार गंगाजी की शरण में करने का वचन मांगा और डोली में बैठते ही स्वर्ग सिधार गये|उस समय यमुना घाटी से ले जा कर गंगा घाटी में अंतिम संस्कार करने का मतलब युद्ध की तैयारी करने के समान था इसलिए बनाल के लोगों ने बुद्धि व बल दोनों का प्रयोग किया। सबसे पहले उन लोगों ने डोली के ऊपर देवता का चांदी का झामण लगाकर उसे देव पालकी की तरह दिखाया और अंतिम यात्रा में मरने के बाजे की बजाय देव पालकी के लिए बजने वाले बाजों के साथ राड़ी डांडे को पार कर कैलथ नाम के गंगा के निकट के शमशानघाट या तीथ पर पहुँच कर भानूकोटली को अग्नि व गंगा के सुपूर्द कर अपना वचन पूरा किया। वापसी में मरने के बाजे बजाकर लोगों को अपनी सूचना दी और जब स्थानीय गंगा घाटी के लोग उन्हें मारने आये तो बनाल के लोग उनका सफल प्रतिरोध कर सकुशल घर लौटे और बनालियों द्वारा कैलथ तीथ जीतने की घटना भव्य इतिहास के रुप में गीतों गाथाओं में अमर हो गई।

आज लगभग 12-13 बर्ष बाद वही कहानी तब याद आई जब वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुसाई की इन शब्दों भरी पोस्ट को वीडिओ के साथ देखा। उन्होंने अगली पोस्ट में इसे स्थानीय ढोल में बजने वाला पैन्सारा बताया। यहाँ मुझे लगा यह पैन्सारा नहीं हो सकता क्योंकि ढोल सागर में पैंसारा ताल थोड़ा इस से जुदा है भले ही उस में ढोली अपने करतब दिखाता है। वहीँ पैन्सारा अक्सर तब लगाया जाता है जब बाजगी समाज को अपने हक़ में कोई बात रखनी हो। ऐसा ही पैन्सारा बादी समाज के लोग बेड़ावृत्त भुनाते समय लगाते हैं जो एक दिन का न होने की जगह 15 दिन या फिर सात दिन का होता है।

फोटो-शीशपाल गुसाईं

यहाँ नैनीताल के पूर्व सीडीओ मदन सिंह कुंडरा भी बताते हैं कि इसे पैन्सारा खेलना कहा जाता है लेकिन मन नहीं माना। ढोल सागर के मर्मज्ञ व विद्वान् व्यक्तित्व में सबसे नजदीकी व अहम पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जी को संदेश ही नहीं भेजा बल्कि वीडिओ भी भेजा कि कृपया बताने का कष्ट करें कि यह कौन सी ताल और क्या बोल बजा रहे हैं, क्योंकि इसकी शुरुआत धुन्याळ से शुरू होती है और फिर परिवर्तन में 6 ताल बेहद तोड़ों के साथ इस वादन में शामिल हुई है। पद्मश्री प्रीतम भरतवाण ने फोन पर बताया कि इसे हम ज्यम ताल (यम ताल) कहकर पुकार सकते हैं क्योंकि यमराज के द्वार पर यह अंतिम विदाई का संदेश है। इसकी शुरुआत धुन्याल से होती है और फिर 6 ताल बजती हैं जिसके बोल हैं:- “1- झेंतकन झेंतकन (6 मात्रा), 2- रेदुझण तु झेंदा झेदुझेंणता, 3- झेगनतु झेंदा झेगन्तु झेंदा!”

इधर बडकोट के पत्रकार मित्र ओंकार बहुगुणा, इतिहासविद्ध प्रोफ़ेसर डॉ. विजय बहुगुणा इत्यादि से जितनी सम्भव जानकारी हो सकी वह जुटाई तो यह अनुमान हो गया कि सम्पूर्ण रवाई घाटी में बदस्तूर चलता रहता है। समय साक्ष्य के श्याम सिंह बोले- सर मैंने तो ऐसा चिन्यालीसौड उत्तरकाशी में भी देखा है जहाँ अर्थी की जगह डोली या पालकी में मृत व्यक्ति की अंतिम विदाई होती है व पैंशर नृत्य होता है। मुझे लगता है पैन्सारा व पैंशर में थोड़ा बहुत अंतर हैं क्योंकि ढोल सागर के अंतर्गत अगर पैंसारा की बात हो तो वह आजीविका से जुडी ताल है जिसे बाजगी अपने भरण पोषण की दृष्टि से अपनी वृत्ति के यजमान को खुश रखने के लिए बजाता है व करतब दिखाता है। ठीक वैसे ही बादी/बेड़ा/गंदर्भ समाज के लोग अपनी फिर्ती के दौरान जब बेडावृत्त करते हैं तब ढोलक पर पैंसारा खेलते हुए नाचते हैं।

मैंने इस आधे अधूरी जानकारी को पूरा करने के लिए विश्व भर की जितनी सम्भव हुई उतनी जनजातीयों के इतिहास व लोक समाज की संरचना पर पढ़ना शुरू किया व गूगल से भी हर सम्भव सहायता ली, क्योंकि डॉ. विजय बहुगुणा इसे बुद्ध धर्म केप्रवर्तन काल से जोड़ते हुए भी दिख रहे थे लेकिन वे भी असमंजस में थे कि क्या ऐसा होता होगा।

आइये आपको बता दें कि विश्व की जनजातियों में क्या कुछ इस सम्बन्ध में होता है लेकिन उस से पहले मुझे महान शास्त्रीय नृत्यांगना मृणाली साराभाई की बेटी मल्लिका साराभाई याद हो आई जिन्होंने अपनी माँ की मृत देह के अंतिम कार्यक्रम में श्रधान्जली स्वरूप नृत्य किया था।

अपने पडोसी देश चीन में इंसान की मौत के बाद लाश को एक ताबूत में डाल दिया जाता था और उसे किसी ऊंची पहाड़ी से नीचे लटका दिया जाता है। वहां के लोगों का मानना था कि ऐसा करने से मरने के बाद व्यक्ति को स्वर्ग नसीब होता है आपको बता दे कि चीन में अब यह प्रथा बंद हो चुकी है। पारसी समुदाय के लोगों में संस्कार की प्रथा काफी चौंकाने वाली है। यहां मृत्यु के बाद शरीर को नहला कर पारसियों के धार्मिक स्थान में छोड दिया जाता है। जहां गिद्ध आकर उस लाश को खाते हैं। बता दे कि पारसी समुदाय में यह प्रथा आज भी प्रचलित है। मैडागास्कर यह एक ऐसा देश है जहां मरने के बाद लाश को दफना दिया जाता है और हर साल अपने पूर्वजों को खुश करने के लिए लाश को कब्र में से निकाला जाता है और उसे सफेद कपडे पहनाकर उसके आस-पास गाकर नृत्य करते हैं। नाचने के बाद गांव का एक चक्कर लगाकर लाश को दोबारा कब्र में दफना दिया जाता है। फिजी  देश के कुछ इलाकों में जो व्यक्ति मर जाता है उसके परिवार के एक और सदस्य का गला घोंट कर मार दिया जाता है। वहां के लोगों का मानना है कि मृतक को इस दुनिया से अकेला नहीं जाना चाहिए। वहीँ तिब्बत इस देश में संस्कार की प्रथा काफी हैरान करने वाली है। बता दे कि यहां मृत्यु के बाद शरीर का और भी बुरा हाल किया जाता है। यहां मरे हुए इंसान के छोटे-छोटे टुकडे काट कर उसे ऊंची पहाडी पर रख दिया जाता है। उनके अनुसार मरने के बाद व्यक्ति का शरीर किसी काम का नहीं रहता। इसलिए उसे जानवरों और पक्षियों का पेट भरने के लिए पहाडों पर छोड दिया जाता है।

दक्षिण कोरिया में मृत व्यक्ति के अवशेषों को कंप्रेस करके एक तकनीक द्वारा उसे रंगीन मोतियों में तब्दील कर दिया जाता है जिन्हें आप शौक से गले में धारण करते हैं यह बोलकर कि ये जेम्स स्टोन हैं। मेडागास्कर के मालागासी लोग अपने प्रियजनों के शव को बाहर निकालकर उन्हें नए कपडे पहनाते हैं व उन शवों के साथ नृत्य करते हैं। इस रिवाज को टर्निंग ऑफ़ द बोन्स के नाम से जाना जाता है।पुराने काल में पापुआ न्यू गिनी के मेलनेशियन और ब्राजील के वारी लोग मौत की अवधारणा को बढ़ाने वाले डर से बचने के लिए अपने मृतकों के अवशेष खा लिया करते थे!। यानोमामी लोगों के बीच भी ऐसी ही प्रथा कायम थी ।डानी लोगों के बीच किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद उनका एक हिस्सा काट दिया जाता है! यह आत्मा को दूर भाग्नाए के लिए किया जाता है।

ऑरलियन्स का रिवाज जानकर हैरान रह जाएंगे। इनका संगीत प्रेम ऐसा है जो मरकर भी नहीं छूटता है। लोग अपने परिजनों की अंतिम की अंतिम विदाई में सबसे आगे बड़े हॉर्न वाला बैंड रखते हैं जो उदासी भरा धुन छेड़ता है जबकि इसके पीछे जैज और ब्लूज़ गानो के साथ नृत्य किया जाता है ।फिलीपीन्स के टिंगियन लोग अपने परिजनों की मृत्यु होने पर उन्हें सिगरेट पिलाने हेतु उनके मुंह में जलती सिगरेट ठूंस देते हैं।

इन सभी तर्कों को अगर देखा जाय तो कहीं न कहीं यमुना घाटी के लोग ऑरलियन्स लोक संस्कृतिसे जुड़े दिखाई देते हैं बस फर्क इतना है कि आरलियंस जिन्हें हम आर्य भी कह सकते हैं। ये लोग किसी भी मृतक से सबसे आगे बड़े हॉर्न वाला बैंड रखते हैं जो उदासी भरा धुन छेड़ता है जबकि इसके पीछे जैज और ब्लूज़ गानो के साथ नृत्य करते हैं । यमुना घाटी के रवाई क्षेत्र के लोग नहीं बल्कि यहाँ के ढोल वादक पैंशर नृत्य करते हुए मृतक की अर्थी को अंतिम विदाई देते हैं जो वास्तव में बेहद अद्भुत रिवाज है।

Himalayan Discover
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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