Monday, June 24, 2024
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माँ की पीर….! नाई रे नाई तू म्यारू भाई! म्यारा लाडा थैंन पीड़ा न लाई!

(मनोज इष्टवाल)

अक्सर ये शब्द तब आपको सुनाई देते होंगे जब घर की चौखट पर बाजगी/आवजी की धुन्येल नौबत्त बज रही हो! इधर ब्राह्मण के मुख से वेद मन्त्र फूट रहे हों तो दूसरी और चमड़े की बेल्ट पर नाई अपना उस्तरा तेज कर रहा हो! तब मंगल गीत गाती गाँव की औरतें सुनाई देंगी- नाई रे नाई तू म्यारू भाई! म्यारा लाडा थैंन पीड़ा न लाई!

फोटो फाइल

ये सिर्फ शब्द मात्र नहीं हैं बल्कि कालान्तर के ऐसे अनुभव हैं जो माँ ने अपने तीन बर्षीय पुत्र या फिर पांच या सात बर्षीय पुत्र के चूडाकर्म/मुंडन संस्कार में अंतस की पीड़ा के साथ सर्वप्रथम व्यक्त किये होंगे जो बाद में मांगल गीत के रूप में सार्वजनिक हुए होंगे! आखिर माँ ही तो इस जगत की सबसे अनमोल धरोहर है जो पुत्र रत्न प्राप्ति के बाद से लेकर उसके अबोध जीवन के हर कष्ट को स्वयं झेलती है! दस धार दुग्ध अमृत पिलाने वाली माँ अबोध बेटे के रोने की आवाज में कितनी निशायें बिना सोये बिताती होगी, कितनी बार उसके मूत्र से अपने कपड़ों को गीला करती रही होंगी और जाने कितनी बार उसके मल से अपने तन के अंगों को साफ़ करती मुस्कराती रही होगी ? यह भला क्या हम महसूस कर सकते हैं ..! शायद नहीं क्योंकि अब डायपर का युग है! शायद अब वक्षस्थल से वह दुग्ध धार नहीं फूटती जिसका शुकून सिर्फ माँ ही महसूस कर सकती है क्योंकि अब फीगर मेंटेन का समय आ गया है ऐसे में ज्यादात्तर माँयें अपना स्तनपान कराने की जगह बोतल थमा देती हैं!

फाइल फोटो

आइये इस मांगल गीत के माध्यम से अपने मन का वह बोझ हल्का करें जिसमें एक माँ अपने बेटे के बालों पर डोरी या सुपारी पैंसे बांधते वक्त भी यह भरोंसा नहीं करती कि कहीं और किसी ने बाँध दिया तो हो न हो वह मेरेबेटे का दर्द महसूस न करे इसलिए वह यह जिम्मेदारी अपने भाई यानि पुत्र के मामा को सौंपती है ताकि उसे विश्वास रहे कि उसका भाई एक माँ की पीड़ा को समझ अपने भांजे की लटों पर ऐसा कसाव नहीं देगा जिस से उसे कोई परेशानी या पीड़ा हो! बाल न्योतने के बाद जब बाल काटने के लिए वह नाई का उस्तरा चमड़े पर तेज होते देखती है तो उसकी दिल की धडकनें तेज होने लगती हैं वह इतने साल अपने पुत्र को जन्म से लेकर अब तक की सारी परिकल्पनाओं को चंद पलों में ही ताजा कर लेती हैं व उस सुख दुःख की सहनशीलता का त्याग कर यह सोच में पड़ जाती हैं कि कहीं नाई ने बाल काटते समय मेरे पुत्र का सिर्फ छिल दिया तो क्या होगा इसलिए वह नाई से मिन्नत करती हुई कहती है:-

नाई रे नाई रेsss तू मेरो भाई!

नाई रे नाई रेsss धरम कु भाई!

त्वे द्योलो भाई पाऊं खडाऊ!

नाई रे नाई रेsss कानू कुंडल!

नाई रे नाई रेsss शाल-दुशाला!

नाई रे नाई रेsss जरीद कापडी!

नाई रे नाई रेsss रेशमी पगड़ी!

मेरा लाडा तैं तू पीड न लाई!

(नाई रे नाई रे तू मेरा भाई, नाई रे नाई रे, धर्म का भाई! तेरे को दूंगी मई पाँव के खडाऊ, नाई रे नाई रे, कान के कुंडल, नाई रे नाई रे शाल-दुशाला, नाई रे नाई रे जरीद के कपडे! नाई रे नाई रे रेशम की पगड़ी! मेरे पुत्र को तू पीड़ा मत देना!)

अब आप ही बताओ उस माँ की ममता का क्या आलम होगा जो सिर्फ बेटे के दुधमुन्हे बाल काटने वाले नाई की तब तक खुशामद करती रहती है जब तक उसके बाल न कट जाएँ! बेटा बाल कटते वक्त रोता है तो माँ भी अपनी साड़ी के पल्लू में अपने आंसू पोंछती हुई उसे चुप कराने का प्रयास करती है! भूल से बाल काटते समय अगर कहीं पर खून निकल गया तो जाने कितनी बार अपने स्नेहिल हाथ से आंसू बहाते हुए उस खून को साफ़ करती है! और एक हम हैं कि ज्यों ही घर ग्रहस्थी का सुख मिला तब हमारे चारों धाम सिर्फ और सिर्फ अर्धांगनी होती हैं! सत्य ही तो कहा है एक नारी की सबसे बड़ी दुशमन नारी ही होती है वह कभी यह नहीं सोचती कि आज वह जो सलूक अपनी सासू माँ के साथ करने जा रही है आने वाले कल में जब वह सासू माँ बनेगी तो यही सलूक उसकी बहु भी उसके साथ कर सकती है! यह मांगल गीत तो एक छोटा सा उदाहरण है यदि आपने चूडाकर्म संस्कार के पूरे गीत में माँ की बेटे के प्रति सोच की अभिव्यक्ति को धैर्य और ध्यान से सुन लिया तो यकीन मानिए आपकी आँखों से भी तरपर आंसू टपकने लगेंगे!

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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