Sunday, June 23, 2024
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काकभुसन्डी ताल यानि पूरे विश्व के कौवों का कब्रगाह।

काकभुसन्डी ताल यानि पूरे विश्व के कौवों का कब्रगाह। 

(मनोज इष्टवाल)
देवभूमि उत्तराखंड वास्तव में कई विविधताएं और विषमताओं का अद्भुत मिश्रण है। इस देवभूमि में देह त्यागना स्वर्ग समान सिर्फ मनुष्य ही नहीं मानते बल्कि पक्षी भी अपने को धन्य समझते हैं।
जोशीमठ से जैसे ही आप सामने की पहाड़ियों पर नजर डालते हैं तब बिष्णु प्रयाग पर आपके दाहिने ओऱ काक भुसन्डी पर्वत श्रृंखला दिखाई देती है। उन्हीं के पार जब आप इन पर्वत श्रृंखलाओं पर विचरण करते हुए पहुँचते हैं तब आप हिमालयी भूभाग के उस अतुलनीय क्षेत्र में पहुँचते हैं जहाँ बर्फीले पहाड़ों के बीच में लंबी नीली झील दिखाई देती है जिसके एक सिरे से रिसता पानी ऐसे लगता है मानों चांदी पिघल रही हो।

काकभुसन्डी  पर्वत श्रृंखला में  कहीं न कहीं काग या कौवे के जन्म से मृत्यु तक के कई रहस्य आज भी छुपे हुए हैं जिन पर अभी ब्यापक शोध किया जाना जरूरी है। पहाड़ी जनमानस ने सर्व प्रथम कौवे की महत्तता को पहचानते हुए उसके गुणों को अपने लोक में उतारा है । कौवे को पुरातन से ही सबसे तेज डाकिया माना गया है। लोक में प्रचलित कथाओं में कौवा किस दिशा से उड़कर आया और किस दिशा में कांव-कांव कर सन्देश दे रहा है इसे आमजन बड़े आराम से समझ लेता था। उसे शुभ और अशुभ दोंनो सन्देशों को कौवे की काँव-काँव से ही पता चल जाता था इसीलिए तो सन्देशवाहक कई गीतों में कौवे को प्राथमिकता दी गयी है जैसे-

तेरी ठंगरियूं म राधा बसी जालो काणु, मी लद्दाख जाणु राधा मिल अभी नि आणू। या फिर “काड़ा बसा कौवा तेरे आंगनै”  जैसे कई गीत लोक में प्रचलित हैं। कौवे को पितृ लोक से जोड़कर यमराज का दूत भी माना गया है जिसकी श्राद्ध पक्ष में बहुत महत्तता बताई गई है। धर्म शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी लोक में श्राद्ध पक्ष के दौरान कौवा सबसे अधिक ब्यस्त होता है वह पितरों के लिए तर्पण की हर वस्तु उन तक पहुंचाता है। श्राद्ध के लिए पके भोज्य पदार्थ सर्व प्रथम कौवे को खिलाए जाते हैं और यह माना जाता है कि यह सब वह पितृ लोक में हमारे पितरों को सौंपता है।
यह लोकपर्वहलित प्रचलित व शास्त्र 

सम्मत गाथाएं कहीं न कहीं काकभुसन्डी से जुड़ी हुई है जिसका यकीनन वैज्ञानिक शोध किया जाना चाहिए कि आखिर कौवे मरने काकभुसन्डी झील ही क्यों जाते हैं। आप भी अगर इस पर्वत श्रृंखला को पार कर जॉयेंगे तो पाएंगे हजारों हजार कौवे वहां अपनी देह त्यागे हुए हैं। यहाँ देह त्यागने वाले कौवे सत्कर्मों के आधार पर ही यहाँ तक का सफर करते हैं। इसे कागः स्वर्ग भी कहा जाता है और कागः कब्रगाह भी। धरोहर के सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर चन्द्रशेखर चौहान बताते हैं क़ि काक भुसन्डी तक पहुंचने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर जोशीमठ से आगे गोविन्द घाट से भ्युंडार और फिर भ्युंडार से रूपढून्गा, कर्गिला, सेमारतोली, डांग खरक, राज खरक, काकभुशंडी खाल होते हुए यहाँ पहुंचा जा सकता है……।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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