Wednesday, May 29, 2024
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यरां/हिरांs देबोs…! बारहमासा लोकगीत शैली की लुप्तप्रायः एक मात्र गीत, जो भाव गिरगिट की तरह रंग बदल लेता है।

हिरांs देबोs…! बारहमासा लोकगीत शैली की लुप्तप्रायः एक मात्र गीत, जो भाव गिरगिट की तरह रंग बदल लेता है।

(मनोज इष्टवाल)

गढ़वाल की नारी के ऊपर पूर्व में एक कहावत प्रचलित थी- “गढवाळी युवती ब्याह नहीं करती, ब्याह दी जाती हैं।” फिर ऐसी स्थिति में उनसे रोमानी प्रेम की आशा नहीं की जा सकती, लेकिन विवाह के बाद एक दूसरे के प्रति दो हृदयों में धीरे-धीरे उपजा प्रेम कई आग्रहों तथा यौन आवश्यकताओं के बीच भावनात्मक रूप में एक अद्भुत भाव उत्पन्न कर प्रेम परिणति में तब्दील हो जाता है। लेकिन…. बदलते सामाजिक परिवेश ने अब यह अवधारणा बदल डाली है।

शिक्षा, स्वच्छंदता, वैचारिकता व प्रेमालाप के इस दौर में रोमानी प्रेम प्रणय सम्बन्धों में तब्दील हो रहे हैं, ऐसे में भला हम कैसे छोपति, बाजूबंद, न्योली, छपेली, लामण, भाभी, जंगू-बाजूबंद, झुमैलो, खुदेड, छोड़े , चखुल्या, बारहमासा, बसंती, चैती, घसियारी, ऋतुरैण सहित उन लोकविधाओं में रचे-बसे लोकसंसार की कल्पना कर लोकगीतों की उत्कंठा कर सकते हैं जिनमें समाहित होती हृदय पीड़ा, खुद, विरह-व्याकुलता के आँसू, आकुल मन की अबूझी प्यास, हंसी-ठिठोली का हास-परिहास इत्यादि शामिल होता है। यह तय मानिए कि वर्तमान समाज ने भौतिकी की चकाचौंध में अपना अंत:मन अंतस को भावशून्य कर दिया है। फिर ऐसे में हम कैसे नए लोकगीतों की संकल्पना कर सकते हैं जो समाज में सदियों तक अपनी उपस्थिति दर्ज कर ताजगी भर देते हैं। मुझे लगता है – यरां या  हिरांs देबोs… जैसा बारहमासी गीत भी इन्ही माँ बहनों के आकुल व्याकुल हृदय के भावविभोर कर देने वाले भावों के साथ समाप्त हो जाएंगे जिनके बारे में कहा गया है -“गढवाळी युवती ब्याह नहीं करती, ब्याह दी जाती हैं।”

ऋग्वेद में “ऋत” शब्द प्रकृति और मानव के सम्बन्धों की मूल धारणा के रूप में सैकड़ों बार प्रयुक्त हुआ है। नारी और प्रकृति का आपसी सामंजस्य समझना हो तो आपको पहाड़ी भूभागों में अवस्थित विश्व भर की नारियों पर शोध करना होगा। आप शोध में यही पाएंगे कि नारी ने हर काल में प्रकृति, वृक्ष, सम्पदा व फल पुष्पों को अपने बच्चों की तरह पाला पोसा व निश्वार्थ भाव से उनके साथ अपने मनोभाव साझा किए। अब वैदिक काल की शंकुतला को ही देख लीजिए जिसके बारे में कालिदास अपने विश्वप्रसिद्ध नाट्य शास्त्र अभिज्ञानशाकुन्तल में लिखते हैं – “आद्ये वः कुसुम प्रसूति समये यस्या भवत्युत्सवः (४-९) अर्थात कालिदास की शकुन्तला पुष्प खिलते ही उनका प्रसव उत्सव मनाती थी। यह सब इसी देवभूमि में सम्भव है जहां हर घर की अविवाहित बालिकाएं फ्योंली पुष्प के खिलते ही “फूलदेई” त्यौहार से घर व मंदिर की देहरियाँ सजाती हैं।

हिरांs देबोs… गीत मूलतः पुटबंदी शैली का बारहमासा लोक गीत श्रेणी में आता है क्योंकि यह एक ऋतु बिशेष में गाया जाने वाला गीत कतई नहीं कहा जायेगा, जैसे वासन्ती, चैती,न्योली, छपेली, ऋतुरैण इत्यादि हैं। यह बारहमासा लोक गीत शैली का वह गीत कहा जा सकता है जिसके सभी अलंकरणों में घसियारी गीत, चखुल्या गीत, छोपति, लामण, छोड़े, बाजूबंद, जंगू-भाभी व कहीं कहीं झुमैलो के पुट भी सम्माहित मिलते हैं।

हिरांs देबोs …का पुट भी तब झुमैलो जैसा लम्बा खिंचता चला जाता है जब इसमें विरह रस शामिल हो । तब इसे घसियारी गीत भी कहा जाता है। और जब इसमें श्रृंगार रस समाहित हों तो यही गीत बाजूबंद शैली की परिणति में तब्दील हो जाता है।

दरअसल बारहमासा गीत की अभिव्यक्ति कभी भी कहीं भी बिषय वस्तु के साथ अदला-बदली हो जाया करती है। हिरांs देबोs जब नारियों के मध्य युगल सुरों में जुगलबंदी करता है तब इसमें समय काल परिस्थितियों का बेजोड़ समावेश होता है। अगर वह खेतों में काम कर रही हैं या घास लकड़ी सहित अन्य श्रमसाध्य कार्यों को करती दिखती हैं तब अपने में से एक ऐसी महिला को चिन्हित करती हैं जिसका पति प्रदेश में नौकरी पर हो, महीनों या सालों से घर न आया हो, चिट्ठी पत्री ख़बरसार न मिल रही हो, ससुराल में ताने सुन रही हो, और विरह ब्यथा, प्रेमाग्नि, विरह मिलन ने अन्तस में कई गुब्बार पैदा कर रखे हों। उन्हें शांत करने के लिए उसके साथ की अन्य महिलाएं पुट बंदी के शब्द ढूंढकर उसे समर्पित करके उलाहनाएँ देते हैं ताकि गुब्बार फुटकर आंसुओं के साथ बह जाए व अशांत मन तृप्त हो जाये।

वहीं जब यही सब घर आंगन व बिना श्रम साध्य कार्यों के दौरान महिलाएं बिषय वस्तृ के आधार पर बारहमासा गायन करती हैं तब यह विरह पीड़ा की जगह हंसी ठिठोली व है परिहास का माध्यम बन जाता है। सच कहें तो यह कब किस शैली में बदल जाए कहा नहीं जा सकता। वैसे इसका जन्म बारहमासा में इसलिए भी माना जाता रहा है क्योंकि हम इसे रुदाली रूप में भी सुनते हैं क्योंकि अक्सर किसी की मृत्यु पर यही गीत रुदाली रूप धारण कर बिषय वस्तृ का बर्णन कर मन चीर देने वाला होता है। क्योंकि लोकगीतों में शब्द रूपों, वाक्य संरचनाओं, बिंबों, प्रतीकों, वाह्य व्यवहारों, व्यंजनाओं आदि की अपनी प्रयोगात्मक विशेषताएं होती हैं। और यह भी सर्वार्थ सत्य हैं कि कोई भी लोकगीत या नाटक छंद के बिना आधा अधूरा लगता है इसीलिये तो कहा गया है कि शब्द और छंद एक दूसरे के पूरक होते हैं:- “छंदहीनों न शब्दोSस्ति न छंद: शब्दविवर्जिरतम:” (१४/४५)

जहां तक खुद और बारहमासा लोकगीत शैली के गीत हिरांs देबोs की अभिव्यक्ति को परिभाषित करने की है तो दोनों एक दूसरे के पूरक लगते हैं क्योंकि खुद एक मात्र ऐसा शब्द है जो किसी भी प्रिय व्यक्ति, स्थान,वस्तु व प्राणी की लग सकती है। खुद की संवेदना को हम टाल नहीं सकते क्योंकि यह शाश्वत सत्य बनकर दिलों को आकुल करती है। यही खुद पीड़ा पैदा करती है और खुदेड गीतों की जन्मदात्री बन जाती है।

बारहमासा भी खुदेड गीतों की एक विधा है, लेकिन उनका सम्बन्ध प्रायः दाम्पत्य प्रेम से ही सम्बंधित होता है। फिर भी वे नायक या नायिका की याद में वस्तु स्थिति और प्रकृति के बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव या वैषस्य को खूब उभारते दिखते हैं। हिरांs देबोs मूलतः नारी प्रधान गीत है इसमें शक की कोई गुंजाइश नहीं लेकिन इसे पुरुष भी यादों और वायदों में बखूबी गाते हैं। यह गीत तब ज्यादा खूबसूरती ले लेता है जब नायक नायिका की याद में उस से किये गए वायदों को स्मृति पटल पर रखकर उनकी पूर्ति के लिए स्वयं में स्वयं से वायदा कर आश्वासन को आशक्त करता दिखाई देता है। आप भी सुनिए पुरुष प्रधान समाज की अभिव्यक्ति:-

यह तो माना जाता रहा है कि ऋतु गीतों की परंपरा बहुत प्राचीन काल से चलती आ रही है। संस्कृत काव्य ग्रन्थों में भी ऋतु बर्णन का विधान रहा है। इसे हम ऋतु काव्य की परम्परा का हिस्सा मान कर यह कह सकते हैं कि यह लोकगीतों की जड़ रही होगी।

हिरांs देबोs ….! लोकगीत शैली के इन गीतों को आप प्रथम दृष्टया सुनेंगे तो पाएंगे कि पुट बंदी शैली के इन गीतों की भाव व्यंजना बहुत सरल और सौम्य है जो कर्ण प्रिय तो है लेकिन इसके शब्दों में गहराई नहीं है। बस यही हमारी भूल है क्योंकि हम इन शब्दों का रस्वादन तो करते हैं लेकिन इसके गूढ़ को अंगीकार नहीं करते जबकि इसमें रूप, रस, गुण, स्पर्श, गंध, सौंदर्य, शील, सामिप्य, प्रणय, काम, जड़, अचेतन, चेतन, भाव, कामना, वस्तृ स्थिति, सुख-दुःख, आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, संवेदना, स्मृति, उल्लास, वासना, यौन आकर्षण, विकर्षण, सहानुभूति इत्यादि सभी तो समाहित होती हैं जो लोक जीवन को जीने का सबसे बड़ा माध्यम है व जो एक अटूट बंधन में बंधा जन्म-जन्मान्तर खिंचा चला आ रहा है।

हिरांs देबोs….. को अगर हम प्रणय वेदना से भी जोडक़र देखें तो पहाड़ों की प्रकृति में प्रणय के बीज तो पूर्व से ही निहित होते हैं। प्रकृति के सहचारी पहाड़ी जनमानस को प्रकृति ने स्वयं ही ये सहज गुण प्रदान किये हैं। फिर भी प्रेम की बिडम्बनाओं के बीच वस्तृ स्थिति की स्वीकृति भी यहां की नियति बन जाती है जो स्वयं में प्रकृति प्रदत्त ही है। प्रेम और यौवन को ही इन गीतों की सबसे बड़ी उपलब्धि माना गया है। पहाड़ की नारी का प्रेम प्रणय बंधन के पीछे पतिव्रता, मर्यादा, सेवाभाव इत्यादि के तहत समर्पित करता नजर आता है। वस्तुतः पूर्व में अन्न, वस्त्र व अन्य अभावों में सास-सौत का उत्पीड़न, पति के प्रदेश चले जाने के बाद साहूकारों के तकाजे को झेलती यहां की नारी की विरह वेदना उसके मानसिक व शारीरिक झंझावतों की व्यग्रता से बाहर निकलने का एक मात्र साधन यही गीत रहे हैं जो बारहों महीने उनके इर्द गिर्द वस्तुस्थिति के साथ मंडराते गाते मन मस्तिष्क पर गुंजन करते आगे बढ़ते हो जाते हैं। इसीलिए इन्हें बारहमासा गीत के रूप में माना जाता है व एक भाग में बंटकर यह घसियारी गीतों की श्रेणी में आ जाता है।

हिरांs देबोs….ऐसा नहीं है कि सिर्फ चमोली व रुद्रप्रयाग जनपद में ही गाया जाने वाला लोकगीत हो। यह पूर्व में पौड़ी जनपद टिहरी जनपद व अन्य उत्तराखंड के अन्य जिलों में भी गाया जाने वाला लोकगीत रहा है जो वक्त काल परिस्थिति में कभी भी जन्म लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज कर देता है इसलिए इसे बारहमासा लोकगीत श्रेणी का गीत कहा गया है। कालांतर में यह गीत ज्यादात्तर मृत्यु गीत के रूप में अर्थात रुदाली के रूप में भी अपने भाव व्यक्त करता रहा है व एक बौण में करुण रूदन करती नारी देवताओं को पुकारती हुई भी अपने वजूद के विनाश को कोसती हुई कहती सुनाई देती थी कि ….हिरांs देबोs।।

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