अब यमुना तट बाड़वाला-कालसी में होगी यमुना आरती..! बनेंगे घाट, होगी गंगा-जमुना जी की आरती!
(मनोज इष्टवाल)
वाह सच कहें तो यह ने निर्णय जितना कर्णप्रिय सुनने में लगता है उतना ही दिखने में भी कितना सुखद होगा इसकी कल्पना की जा सकती है क्योंकि जिस भूमि पर कभी 3 अश्वमेघ यज्ञ हुए हैं, जहाँ चार नदियों के संगम से हमेशा बाढ़ की स्थिति बनी रहती थी, जहाँ पांडव पुत्र धनुर्धर अर्जुन ने रणथम्बा पर्वत से बाणों की बरसात कर राजा विराट की गायों को चोरी कर भगा रहे कौरव सैनिकों से गायों को आगे बढ़ने के लिए बाणों की बाढ़ की हो और जहाँ कुषाणोंत्तर काल में चक्रवर्ती सम्राट शीलवर्मन राजधानी हो व कुलिंद काल में चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अपना 13वां शिलालेख स्थापित किया हो, भला ऐसे क्षेत्र से जब यमुना नदी यमनोत्री के चंपासार ग्लेशियर से निकलकर पहाड़ों की ओट छोड़कर मैदानों में प्रवेश करती हो तो ऐसे स्थान पर भला क्यों न माँ यमुना की आरती उतारी जाय! जहाँ सम्मुख कालकूट पर्वत शिखर हो व राजा विराट का वैराट गढ़!
यकीनन यह धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का अद्भुत निर्णय है जो तन-मन को गदगद कर दे! एक ऐसा निर्णय जिसका यमुना घाटी के लोग बर्षों से इन्तजार कर रहे हैं! क्योंकि माँ यमुना जी की आरती के लिए अब ठेठ वैसे ही घाट बाड़वाला क्षेत्र में बनने जा रहे हैं जैसे हर की पैडी हरिद्वार व ऋषिकेश में गंगा जी की आरती के लिए घाटों का निर्माण हुआ है!
धर्मस्व एवं पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज का कहना है कि यह पूरे प्रदेश में ऐसा स्थान है जहाँ कई इतिहास समाहित हैं व जिनका वेद पुराणों में उल्लेख यथावत मिलता है! यहाँ आज भी जगतग्राम बाड़वाला में अश्वमेघ यज्ञ के अवशेष हैं तो कालसी में सम्राट अशोक द्वारा स्थापित 13वां शिलालेख व ब्यास भूड नामक स्थान भी जहाँ 18000 बौद्ध भिक्षुक रहते थे! धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज बताते हैं कि पुराणों में यमुना नदी को पौराणिक स्रोतों के अनुसार सूर्य की पुत्री, मृत्यु के देवता यमराज की बहन और श्रीकृष्ण इनके पति स्वीकार्य किये गये हैं, दूसरी ओर माँतुल्य यमुना जी को उत्तराखंड में माँ की जगह बहन का दर्जा ज्यादा दिया जाता है क्योंकि उनका श्रीकृष्ण जी के साथ विधिसम्मत विवाह सम्पन्न नहीं माना जाता!
यमुना का उद्गम स्थान हिमालय यमनौत्री के हिमाच्छादित श्रंग बंदरपुच्छ ऊँचाई 6200 मीटर से 7 से 8 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित कालिंद पर्वत से माना जाता है, जिसके नाम पर यमुना को कालिंदजा अथवा कालिंदी कहा जाता है, नदी सभ्यता के लोग यमुना जी को कालिंदी से जोड़कर देखते हुए इससे उत्पन्न कुलिंद वंशज को मानते हैं!
आइये जानते हैं यमुना तट के आर-पार बसे बाड़वाला व कालसी के संक्षिप्त इतिहास के बारे में!
बाड़वाला:-
(अश्वमेघ यज्ञ स्थल जगतग्राम बाड़वाला)
तीसरी सदी अर्थात कुषाणोंत्तर काल में यह क्षेत्र कुलिंद राजा शीलबर्मन की राजधानी थी। जिसका विराट इस बात की गवाही देता है कि इस राजा द्वारा तीन या चार बार अश्वमेघ यज्ञ किये व उस काल का अजेय राजा कहलाया।
यह साम्राज्य वृषगण गौत्रीय वर्मन वंश द्वारा शासित था। इस साम्राज्य का उत्कर्ष काल तीसरी शताब्दी में शीलवर्मन नामक परम शक्तिशाली राजा हुए। जिन्होंने जगतग्राम बाड़वाला में चार अश्वमेघ यज्ञ कर अपने पराक्रम का प्रदर्शन किया था। इन्हीं अश्वमेघ यज्ञों में से तीन यज्ञों की वेदिकाएं हैं और चौथा स्थल अभी खोजना बाकी है। इन यज्ञों का तिथिक्रम ज्ञात नहीं हो पाया लेकिन शीलबर्मन के राजकाल 253ई. व दूसरी तिथि 257 ई. बताई जाती है! ज्ञात होकि ईसा से दो सदी पूर्व से तीसरी ई. सदी तक यहाँ कुलिंद वंशजों का राज माना जाता है।
बर्ष 1952-54 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा उत्खनन में पक्की ईंटों से बनी यहाँ तीसरी सदी की तीन यज्ञ वेदिकाओं का पता चला, जो धरातल से तीन-चार फीट नीचे दबी हुई थीं। इन यज्ञ वेदिकाओं को एएसआइ ने दुर्लभतम की श्रेणी में रखा था। तीन में से एक वेदिका की ईंटों पर ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्णित सूचना के आधार पर जो ऐतिहासिक तथ्य उभरकर सामने आए, उनके अनुसार ईसा की पहली से लेकर पांचवीं सदी के बीच तक वर्तमान हरिपुर, सरसावा, विकासनगर और संभवत: लाखामंडल तक युगशैल नामक साम्राज्य फैला था, युगशैल मूलतः कालसी का पौराणिक नाम था!
कालसी:-
खलतिका, कालकूट व युगशैल जैसे पौराणिक नामों से सुशोभित कालसी शहर वर्तमान में अमलावा यमुना नौरा नदी के त्रिवेणी संगम से लेकर यमुना तमसा के संगम तक फैला हुआ है! यहाँ चक्रवर्ती सम्राट अशोक का 13वां शिलालेख है!
कालसी स्तूप या कालसी नगर क्षेत्र का विनाश 1254 ई. में मुगल नसीरुद्दीन मुहम्मद द्वारा किया गया बताया जाता है! सातवीं सदी में जब चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी तब उन्होंने इसका नाम सुधनगरी बताया है, जबकि महाभारत काल में इसे राजा विराट के कारण विराट नगरी कहा गया है! कालसी क्षेत्र को अपरांत कहा जाता था व यहाँ के निवासियों को पुलिंद!
कालसी शिलालेख:-
सन 1860 ई. को ब्रिटिश अधिकारी फारेस्ट ने सम्राट अशोक का 13वां शिलालेख खोजा था जिसे 1937 में ब्रिटिश जेम्स प्रिन्सेप महोदय द्वारा पहली बार पढ़ा! यह स्तूप हाथी की आकृति का है जिसे इतिहासविद्ध पहाड़ से नीचे उतरते हाथी से तुलना करते हैं! ब्राह्मी व प्राकृत भाषा में अंकित इस शिलालेख के अंत में गजेतम लिखा हुआ है! यह स्तूप 18 फुट लम्बाई व 8 फुट चौड़ाई लिए हुए है! उक्त शिलालेख में सम्राट अशोक ने आंतरिक प्रशासन के प्रति उनका दृष्टिकोण, प्रजा के साथ नैतिक, आध्यात्मिक एवं पितातुल्य सम्बन्ध, अहिंसा के लिए प्रतिबद्धता एवं युद्ध के परित्याग को दर्शाते हैं! उक्त कार्यों के लिए सम्राट अशोक ने निषेधात्मक एवं प्रयोगात्मक नीतियों की घोषणा की! निषेधात्मक नीतियों के अंतर्गत सानारिक मनोविनोद, पशुबली, अनावश्यक कार्यों में संलिप्त होना एवं महिमामंडित करना तथा प्रयोगात्मक नीतियों में आत्म-संयम, मन की शुद्धता, कृतज्ञता, माता-पिता की सेवा, ब्राह्मणों एवं सन्यासियों को दान देना, मित्रों, सम्बन्धियों, परिचितों, सेवकों एवं दासों के प्रति समभाव तथा धार्मिक बिषयों पर आपसी सामंजस्य का उद्बोधन है!
उक्त नीतियों के क्रियान्वयन हेतु सम्राट अशोक ने शासकीय भोगशाला में जानवरों के अनावश्यक वध पर प्रतिबन्ध, पशु एवं मानवों की चिकित्सा की व्यवस्था, समस्त प्राणियों के हित के लिए औषधीय वृक्षों को लगाना, धर्म महापात्रों की नियुक्ति, भेरी घोष (युद्ध घोष)के स्थान पर धर्म घोष द्वारा विजय उल्लेखनीय है! अशोक ने न केवल अपने साम्राज्य अपितु पडोसी देश चोल, पांड्य, सात्तिपुत्र, केरलपुत्र एवं सुदूर दक्षिण के ताम्रपणीके अतिरिक्त पश्चिमी देशों के समकालीन यूनानी राजाओं जिनमें सीरिया के अन्तियक द्वितीय थियोस, इजिप्ट के टाल्मी द्वितीय फिलाडेल्फस, मेसीडोनिया के अंटीगोनस गोनकिस, सीरीन के मगस तथा इपिरस के एलेक्सेंडर के साम्राज्य में भी साम्राज्य में भी धर्म विजय हेतु उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया है!
यमुना नदी:-
जैसा की पूर्व में आप सबको जानकारी दी गयी हैं कि यमुना जी का उद्गम स्थल यमनौत्री के नजदीक बंदरपुंछ शिखर के चम्पासार ग्लेशियर से होता है! यह नदी यहाँ से निकलकर लगभग 1376 किमी. चलकर प्रयाग राज में त्रिवेणी संगम में गंगा जी में समाती है! इसका जलभराव क्षेत्र 3,66,222 किमी. है! इसमें ऋषि गंगा, गिरीगंगा, कुंता, हनुमान गंगा, अमलावा, तमसा, शारदा, हिंडन,चम्बल, बेतवा, केन, सिंध सहित दर्जनों छोटी नदियाँ आकर मिलती हैं! यह बागपत, हमीरपुर, यमुनानगर, दिल्ली, मथुरा, आगरा, इटावा, कालपी जैसे महानगरों से गुजरकर प्रयागराज पहुँचती है!
यमुना नदी पर बनने वाले घाट व आरती स्थल का ऐतिहासिक महत्व:-
यह स्थान वर्तमान में बाडवाला-हरिपुर कालसी को जोड़ने वाले यमुनापुल के दाहिनी ओर जहाँ ब्रिटिश काल में लोहे का पुल अवस्थित था से लगभग एक या देश किमी. ऊपर की ओर बनाए जाने की सम्भावना है! इसके पीछे स्थानीय निवासियों का लॉजिक है कि यहाँ नजदीक ही अमलावा, नौरा व यमुना का त्रिवेणी संगम होने के कारण यह स्थान सर्वोपरि होगा!
गढ़बैराट के सम्पादक भारत सिंह चौहान “भारु” जानकारी देते हुए बताते हैं कि उन्होंने इस स्थान सम्बन्धी जानकारियाँ जुटाने के लिए नेशनल हाईवे अथॉरिटी 123, कैन्टोमेंट बोर्ड चकराता व दून सब डिविजन से ब्रिटिश काल में बने लोहे के पुल सम्बन्धी जानकारी जुटाने की भरपूर कोशिश की लेकिन उन्हें आशातीत सफलता नहीं मिल पाई! उन्होंने कहा कि इस पुल सम्बन्धी एक पौराणिक लोकगीत जरुर जौनसारी भाषा में प्रचलित है जिसके बोल हैं- “कालेसी रो पोड़ो टूटो देऊडेधारा”!
भारु चौहान बताते हैं कि यमुना नदी पर वर्तमान में जो पुल बना है वह 1978 में बनाया गया था जिसकी लम्बाई 448 मीटर है! उन्होंने बताया कि पुराने आयरन ब्रिज को तोड़ने का ठेका एक कम्पनी को दिया गया था जिसने बड़ी मात्रा में यहाँ से लोहा उठाया है! लोगों का मानना है कि यह पुल ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेजों द्वारा चकराता शहर बसाने के लिए बनाया गया था!
उन्होंने बाडवाला का व यमुना का आपसी सामंजस बिठाते हुए कहा है कि अमलावा नौरा व यमुना में जब बाढ़ आती थी तबी सबसे अधिक नुकसां इसी क्षेत्र को होता था इसलिए इसे बाढ़वाला नाम दिया गया वहीँ दूसरी किंवदन्ती को अगर आधार माना जाय तो वह यह है कि राजा विराट की जिस स्थान पर गौशालाएं थीं, आज वहां ‘गौथान’ नामक ग्राम बसा है। पहले दिन सूर्यास्त से पूर्व त्रिगर्त (वर्तमान कांगड़ा) नरेश सुशर्मा ने जो गायें चुराई थीं, वह उन्हें अमलावा नदी की ओर से ले गया तथा दूसरी सुबह कौरवों ने जिन शेष गायों का अपहरण किया था, उन्हें वे यमुना तटवर्ती हथियारी, जहां पांडवों के द्वारा अपने अस्त्र-शस्त्र छिपा रखे थे, के निकट बौसान नामक स्थान से ले आए थे। कहते हैं अर्जुन ने रणथम्बा नामक स्थान जो वर्तमान में सम्भवतः रुँडेला स्थान कहलाता है से बाण चलाकर गायों को रोकने के लिए बाणों की जहाँ बाड़ लगाई वही बाड़वाला कहलाया! उन्होंने इसके ऐतिहासिक महत्व को ब्यास नहरी जहाँ ब्यास ऋषि का आगमन हुआ था, ब्यास भूड (18 हजार बौद्धों का निवास स्थल), कल्पऋषि मंदिर (गुरु गोविन्द सिंह के गुरु), विराट गढ़, व पांडवों के अज्ञातवास के दौरान यहीं कटापत्थर के आस-पास शमसान घाट के निकट अवस्थित वृक्ष खोह (जहाँ पांडवों ने धनुष बाण छुपाये थे) इत्यादि का जिक्र करते हुए यमुना तट भूमि को ऐतिहासिक बताया है!
इस लेख को विस्तार देने के पीछे मेरा उद्देश्य यह है कि यमुना तट पर गंगा-जमुना जी की आरती की जो परिकल्पना तीर्थाटन एवं धर्मस्व पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने की है, वह उपरोक्त सभी बिषयों को ध्यान में रखते हुए बहुत शोध व वैचारिक मंथन के बाद लिया गया निर्णय कहा जा सकता है! उम्मीद है जल्दी ही आप बाड़वाला के यमुना तट पर हरिद्वार के हर की पैडी व ऋषिकेश के त्रिवेणी संगम व परमार्थ निकेतन में होने वाली गंगा आरती की भांति बाड़वाला-कालसी तट पर यमुना आरती के दर्शन कर पायेंगे!








