Friday, May 17, 2024
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यमकेश्वर क़े डांडा मंडल क्षेत्र को क्यों बोला जाता है छोटी विलायत?

यमकेश्वर क़े डांडा मंडल क्षेत्र को क्यों बोला जाता है छोटी विलायत?

(मनोज इष्टवाल)

जो कोई जाय सुदरसन पासा, पूरन होय न ताकी आसा।

आटा चावल आफ बिकावै। और ठौर कहीं हाथ न आवै।।‘ 

सुप्रसिद्ध चित्रकार व गढ़ नरेश  क़े राज कवि  मौलाराम तुंवर की “गढ़राजवंश काव्य पर्ण 63 ब व 64 अ” का अध्ययन करते समय इन पंक्तियों क़े संदर्भ को जब गहराई से समझा तो ओंठ स्वयं गोल होकर सीटी बजाने लगे। फिर क्या था, ऐतिहासिक संदर्भ तलाशने क़े लिए पुस्तकें खंगालनी शुरू कर दी कि आखिर क्यों राजा सुदर्शन शाह क़े लिए राजदरबारी कवि मौलाराम ने इतनी तल्ख़ टिप्पणी कर डाली?  तब और आश्चर्य हुआ जब नजर राजा क़े चंडी घाट परगने पर गई…! और फिर याद हो आई अंग्रेजों की छोटी बिलायत!

 राजा सुदर्शनशाह का हियरसे क़े नाम करारनामा।

मैं राजा सुदर्शनशाह, पुत्र राजा हरदत्त शाह, पौत्र राजा अलीप (दलीप?) शाह, प्रपौत्र राजा हरदत्त शाह, शपथ पूर्वक घोषित करता हूँ कि सम्राट औरंगजेब ने मेरे पूर्वजों को, परगना दून व चंडी  की जागीर क़े फरमान प्रदान किये थे। मैंने बिना किसी क़े बहकाने में आकर, स्वेच्छा से, उक्त परगनों को, तथा उनसे संबंधित लगान, सायर, ईंधन एवं जमींदारी क़े सभी अधिकारों को, और उनके संबंध में प्राप्त शाही फरमानों को कैप्टेन हियरसे क़े पास 3005 रूपये में, जिसका आधा 1502 रूपये 8 आना होता है, बेच दिया है। मैं घोषणा करता हूँ कि मैंने यह सम्पूर्ण राशि कैप्टेन हियरसे से प्राप्त कर ली है, और उसका प्रयोग कर लिया है। मैंने उक्त परगनों का तथा  उनसे संबधित शाही फरमानों का स्वामित्व कैप्टेन हियरसे को सौंप  दिया है। हियरसे की ओर से मेरी कुछ भी राशि शेष नहीं है। यदि मेरे वंशज उक्त राशि में से कुछ शेष राशि की मांग करें तो उनकी मांग को निराधार ठहराकर  उसकी ओर तनिक भी ध्यान न दिया जावे। मैं इस विक्रय क़े लिए स्वयं उत्तरदायी हैं (हूँ )। मैंने यह पत्र इस मनतब्य से लिखा है कि यह विक्रय पत्र तथा भरपाई (रसीद) का काम दे और यदि कोई व्यक्ति विवाद (मुकदमा) करें  तो उस समय इसे लिखित प्रमाण क़े रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

दिनांक 22 जून 1811 तदनुसार 30 जमादुलसवल 1236 हिजरी तथा 17 अषाढ फसली और विक्रमजीत संवत 1868।

हस्ताक्षर एवं मोहर राजा सुदर्शन शाह.. साक्षी- चुन्नी लाल मुंशी आत्मज दयारामसहाय (ठाकुर दरबारी)

सन्दर्भ :- ह्यूग पियर्स -दि हियरसेज, पृष्ठ  59-60।

सन्दर्भ:- हियरसे का उक्त पत्र, इं. प्रिम्युटिनी रि. कुमाऊं, पी.सी., जि. १, 1815-24, ह्यूग पियर्स – दि हियरसे, पृ. ६२ , धर्मभानु – हिस्ट्री एडमिनिस्ट्रेशन आव एन. डब्लू. पी. पृ. २८

हियरसे का पत्र रौस के नाम, दिनांक २८-४-१८२०

It was merely of the sake of the proprietory (property) rights of the Jagir that had been granted to me by the Government, I was induced to purchase these furmans, which were of no use to the Rajah at that period, 9 years ago, when he was in a state of starvation and all his family naked, and it was the request of Harak Dev Joshi, who introduced the young Rajah to me at Unjanee Ghat, I assisted him with money, food and cloths.

सन्दर्भ:- बंगाल, पास्ट एंड प्रजेंट, जुलाई-सितम्बर 1934, पृ. ५४,  ह्यूग पियर्स – दि हियरसे, पृ.५९-६०, मूरक्राफ्ट – ट्रेवल्स इन हिमालयन प्रोविंस, जि. १, पृ. १६, जौन प्रेम्वेल- इनविजन ऑफ नेपाल पृ. १८३-२०४, सनवाल- नेपाल एंड ईस्ट इंडिया कम्पनी पृ. १२९-३०, मियां प्रेम सिंह – गुलदस्त तवारीख पृ. १३६-३८

जहाँ तक छोटी बिलायत अर्थात डांडामंडल क्षेत्र के लोगों की दैनिक दिनचर्या में खान-पान की बात आती है तो यहाँ का गरीब तबका भी अन्य जगह के छोटे व्यापारी व बड़े किसान की तरह का भोजन करते थे व सामान्य व्यक्ति बड़े व बड़े लोगों की तरह का भोजन तथा ठीकठाक व्यक्ति जो धनियों की श्रेणी में शामिल नहीं था वह सरकारी अधिकारियों व उच्च वर्ग के लोगों की तरह भोजन किया करते थे. ऊँचे वर्ग के लोग गेंहूँ, चावल और कई तरह की दाल, सब्जी व गुड भोजन में इस्तेमाल करते थे. निचले वर्ग में मंडुआ और झंगोरा मुख्य भोजन है जिसमें कभी कभार चावल भी शामिल हो जाता है. कुछ अपवादों को छोड़कर सभी वर्ग के लोग मांस खाते हैं और उन जानवरों का मांस भक्षण निषिद्ध था जो धर्म विरुद्ध है या वे पशु जो मांसभक्षी हैं. बकरा, पहाड़ी भेड़ व मृग का मांस खाया जाता है. आइये जानते हैं कि ब्रिटिश काल अर्थात सन 1850 गढवाल के लोगों का सामान्य मौसम में प्रतिव्यक्ति आहार की कीमत क्या थी?

निम्नतम वर्ग – आधा सेर मंडुआ (एक तिहाई आना), आधा सेर कौणी या झंगोरा (एक तिहाई आना) तथा सब्जी, दाल, नमक, तेल, लकड़ी सहित कुल सात पाई या सवा आना.

छोटे व्यापारी और बड़े किसान – आधा-आधा सेर लाल गेंहू और मोटे चावल के साथ सब्जी, दाल आदि पर कुल दो आना.

बड़े व्यापारी व धनि लोग- आधा-आधा सेर लाल गेंहू और मोटे चावल के साथ सब्जी, दाल, दूध व घी जोड़कर सवा तीन आना प्रतिदिन खाते थे.

सरकारी अधिकारी व उच्च वर्ग के लोग- सफ़ेद गेंहू का आटा, अच्छा चावल सब्जी, दाल, दूध व घी छ: आना तक प्रतिदिन खाते थे.

संदर्भ:- एडविन टी. एटकिंसन- “हिमालयन गजेटियर ग्रन्थ-तीन भाग- एक” अनुवाद-प्रकाश थपलियाल पृ. 244- 245

 

आखिर ऐसा क्यों था ? इस पर कई तरह के तर्क अंग्रेज लेखकों ने भी दिए हैं व आमजन में भी प्रचलन में है लेकिन यह भी सच है कि डांडा मंडल क्षेत्र चंडी परगने में था जो हरिद्वार से लगा हुआ परगना था व उसका मैदानी क्षेत्र गंगा भोगपुर इत्यादि सबसे उपजाऊ माना जाता था.जिसके सर्वेसर्वा तब हियरसे व अन्य ब्रिटिश थे. क्योंकि राजा सुदर्शन शाह इसे उन्हें बेच चुके थे. अत: यहाँ के लोग अपने व्यापार को गंगा किनारे हरिद्वार की मंडियों तक जैसे हर की पैड़ी तक फैलाए हुए थे व उस से खूब धनराशि भी अर्जित करते थे. इनके खेतों में तब उन्नत किस्म का धान व गेंहूँ उगता था, भेड़ बकरियों के कारोबार के साथ घोड़ों का कारोबार भी इनसे जुड़ा हुआ था.

यहाँ के बारे में बुजुर्गों का कहना है कि शाम ढलते ही डांडामंडल के ज्यादात्तर मर्द ताल घाटी में “बन्नू कलाल” की शराब की भट्टी में होते थे या फिर कंडहर मंडी में नौटंकी व मुजरा देखा करते थे व खूब कलदार लुटाते थे, जबकि इस दौर में उच्च पहाड़ी भू-भाग में सिर्फ थोकदार, मालगुजार व बड़े धनवानों के खेतों में ही लाल गेंहूँ, झीरी बासमती, सुकनंदी, बांकुली, ख्वीड इत्यादि प्रजाति के चावल होते थे व बाकी समाज मंडुआ, झंगोरा खाकर ही गुजारा करता था. वहीँ ताल घाटी में अच्छी नस्ल का गेंहू, बासमती चावल की विभिन्न प्रजातियाँ व तिलहन तथा उड़द राजमा खूब उगा करती थी. क्योंकि यह क्षेत्र हेयरसे के अधीन आ गया था और यहीं ब्रिटिश सरकार ने अपना खजाना भी कंडहर मंडी के आस-पास रखा था व “बन्नू कलाल” की शराब पीने अक्सर अंग्रेजों का यहाँ जमावड़ा जुटता था. यह भी कहा जाता था कि गोरखा काल में भी इस क्षेत्र के वासियों का बड़ा व्यवसाय हर की पैड़ी क्षेत्र में सस्ती लेबर मुहैय्या करवाने को लेकर था. कुम्भ व बद्री केदार यात्रा यहीं से गुजरती हुई आगे चट्टियों तक पहुँचती थी तब चंडी परगने के व्यवसायी खूब माल इस दौर में कमाया करते थे. चंडी परगने के मैदानी हिस्से को छोड़कर पहाड़ी इलाके में भेड़ बकरी व भैंस गाय व उन्नत बैल पालन की खूब चराचरी थी व ये लोग भी आर्थिक रूप से सम्पन्न थे, इसलिए अन्य ऊपरी पहाड़ी जनपदों के लोगों के मध्य “छोटी बिलायत” वाली  कहावत मशहूर थी. ज्यादात्तर लोगों का मानना यह है कि चंडी परगने के किमसार गाँव से लेकर अग्रेज गर्मियों में घुड़केंडा की ऊँची पहाड़ियों में ठंडक लेने जाते थे व उनके किमसार गाँव व रणचूला के असवालों से अच्छे सम्बन्ध थे. रणचूला में ब्रिटिश पटवारी चौकी हुआ करती थी व ठकुराई हिसाब को देखते हुए माना जाता था कि यहाँ के धन्ना सेठ अक्सर शांयकाल को “बन्नू कलाल” की शराब की दूकान पहुँचते व वहां नौटंकी देखने में मशगूल हो जाते! इस इलाके के लोगों में यहाँ अलग हि हनक होती थी क्योंकि ये लोग अंग्रेजों के कारण शिक्षा ग्रहण करने लगे थे. यहाँ के बुजुर्ग भी टूटी-फूटी अंग्रेजी में बतियाते तो पहाड़ का आदमी इन्हें भी उसी कद काठी का मानने लगते. ऐसे और भी कतिपय कारण हैं कि लोग इस डांडामंडल क्षेत्र को छोटी विलायत मानते थे, जिनके विवादित पहलुओं पर बात करना सर्वथा गलत है.

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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