Tuesday, March 5, 2024
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“जागर” से ही क्यों नाचते-खेलते हैं लोक देवता व भूतगण! क्यों लगते हैं थातों/डाँडो में मेले व मंडाण!

“जागर” से ही क्यों नाचते-खेलते हैं लोक देवता व भूतगण! क्यों लगते हैं थातों/डाँडो में मेले व मंडाण!

(मनोज इष्टवाल)

यों तो बैशाखी के बाद उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश के हर उन क्षेत्रों में मेले कौथीगों का स्वरूप उमड़ना शुरू हो जाता है जहाँ आज भी देश की लोक संस्कृति के जीवन दर्शन होते हैं लेकिन उत्तराखंड हो या कोई भी हिमालयी पहाड़ी राज्य! यहाँ बसने वाली देवात्माओं को साल में एक बार पूजना जरुरी होता है ताकि आपदा जैसे अनिष्टकारी घटनाएँ न हों! खेत-खलिहान, गौ-गुठयार व घर परिवार में सब कुछ शुकून के साथ निबटे! बदलते परिवेश के साथ भले ही हमने देवताओं की जगह स्वयं ले ली है और भौतिकता के युग में विज्ञान ने ऐसा जलवा दिखा दिया है कि कई विज्ञान वर्ग से पढ़े लिखे बुद्धिजीवी कहते सुनाई देते हैं कि देवता वेवता कुछ नहीं होता ये सब ढकोसलें हैं! लेकिन ढोल की थाप में अगर मंडाण लगा हो, पंडो नृत्य चल रहा हो या धूमसू बज रहा हो तो इनके पैर सबसे पहले उसमें थिरकने लगते हैं!

आखिर जागर में ऐसा क्या समाया है कि मानव उसके बोलों को सुनकर, थाली -डौंर या ढोल-दमाऊँ के शब्द सुनकर एकाग्र मन हो जाता है और देवतुल्य आत्माएं मनुष्यों पर अवतरित होकर उन्हें उनके कल्याण की राह दिखाने लगती हैं! या ऐसा कौन सा विज्ञान सदियों से चला आ रहा है जिसमें ला-इलाज व्यक्ति देवता के बशीभूत होकर ठीक हो जाता है! या भूतात्मा के भय से मुक्त हो जाता है!

यह बिषय बहुत वृहद् है और सच कहें तो इस पर महाकाव्यखंड लिखा जा सकता है लेकिन बिषयागत बातों के सार के आधार पर हम जागर या जागरण पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं! गढ़वाल में लोकागार पद्धति में तन्त्रीय विद्या या विधि का यों तो कोई स्थान नहीं है लेकिन जब इसके तांत्रिक अनुष्ठान होते हैं तब यह सबसे दुर्लभतम कही जा सकती है! यहाँ के देवता यहाँ के सीधे सादे नागरिकों के हाथ में नारियल-पुष्प लेकर इतने ही शब्दों में प्रसन्न भी हो जाते हैं- “जस करी पणमेसुर देवता, रोटकाटी-संकट बांटी, अजाण की पूजा सजाण करी महाराज! जसकरी ईष्ट देवता महाराज, अलैs बलैs विघ्न टाळई महाराज!”

निरंकार, नागर्जा, भैरव, चंडी, नौ दुर्गा, मसाण, पंडो, दुर्योधन, कर्ण, कुकुरसी, समसू, महासू, गोरिया सहित जाने कितने देवी देवता व गण उत्तराखंड की धरती में पूजे जाते हैं! यहाँ जो पत्थर उठाओ उसी के नीचे एक देवता की उत्पत्ति हो जाती है! शायद जिस काल में इस पहाड़ में मानव जीवन अपनी रोजी रोटी की तलाश में आया होगा उसके श्रधा और विश्वास के यही पत्थर देवता के रूप में साक्षी बने और सबने अपने अपने हिसाब से अपने साथ आये या लाये देवताओं की स्तुति की व उनकी उसी हिसाब से जागरें भी लगाईं!

आपको अगर अकेले गढ़वाल क्षेत्र की बात करें तो इसमें भैरव व भूमिया के अलावा 72 क्षेत्रपाल देवता माने जाते जातें हैं जिस से यह विधित होता है कि मात्र 52 गढ़ ही गढ़वाल के नहीं थे अपितु इन गढ़पतियों के नीचे भी छोटी छोटी गढ़ियों की और थोकदारी थी जो अपने गढ़पतियों के बाद राजा के हुक्म की तामील किया करते थे! इन सभी क्षेत्रपाल देवताओं का जिक्र स्कन्दपुराण व केदारखंड में आपको मिलता है!

इस जागर व तंत्र को योग व ध्यान से जोड़ते हुए कैप्टन ई.डी. कोलोअलावाला (Capt. E.D. Coloalavala) अपनी पुस्तक Tantra the eroutic culture. के पृष्ठ संख्या 31 में लिखते हैं किin the nut shall tantra is a system of esoteric processes involving yoga, meditation, hypos is, out of fulfillment of wordily desires as well as the attainment of spiritual experience.  

तंत्र मन्त्र और शब्द जागर के वे पूरक स्वरुप हैं जिनके बिना जागर का अस्तित्व गौण हो जाता है! पहाड़ी भू-भागों में जहाँ जागर को हमेशा ही जागर कहा गया है वहीँ मैदानी भू-भागों में इसका शब्द जागर से जागरण हो जाता है व इनकी विधि भी अलग तरह की हो जाती है! भले ही वर्तमान में पहाड़ के प्रवासियों की मेहरबानी से अब पहाड़ में भी सतसंगी गुरुओं की धूम होनी शुरू हो गयी है! देवी पूजन, घडियाला, जागर, पंडो, खड़ा बाजा की लोक परम्पराओं का परित्याग कर लोग तेजी से जागरण की और बढ़ रहे हैं लेकिन देवता तो देवता होता है उसकी पूजा विधि विधान को तो उसी के हिसाब से करना ही पड़ेगा! यही कारण भी है कि सात समुद्र पार बसने के बाद भी जब देव दोष किसी को चढ़ता है तो उसे बाप बोलकर अपना गाँव खोजते हुए देवता की पूजा के लिए पहुंचना पड़ता है और तब देवता की मर्जी पर निर्भर होता है कि वह रोट प्रसाद में मान जाए या फिर बलि लेकर ही माने!

जागर या जागरण की उत्पत्ति मुख्यतः नौ प्रकार से हुई मानी जाती है जिनमें मुख सोधन, जिह्वा सोधन, मन्त्र सोधन, कुलुका, मणिपुर, सेतु, निंद्राभंग, मन्त्र चैतन्य, और मंत्रार्थ भावना है ! ये सभी क्रियाएं तांत्रिक मानी जाती हैं जबकि पहाड़ की जागर में इनके अलावा और भी उत्पत्तियां मानी जाती हैं जिनमें झीली ओबरी सीली खाड, ओबरी पूजा, गाड़-छाल सोधन, ऊँची धार डांडी सोधन, डोली-गुड्डी सोधन, अला-बला सोधन, रणभूत सोधन, मसाण सोधन, कच्या सोधन, सिमंद सोधन सहित कई जागर शैलियों की तंत्र विद्याएँ व्याप्त हैं! मूलतः जागर का शुद्ध शाब्दिक अर्थ होता है जा घर ! यानि मन कर्म वचन से किसी भी अतृप्त आत्मा, प्राण व देव मनुष्य को खुश कर नचा-खिलाकर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करना या फिर उसे कैलास भेजना! कैलाश भेजने का अभिप्राय उसे प्रसन्नता पूर्वक उसके स्थान पर ससम्मान प्रतिष्ठित ही मूलतः जागर शैली का मुख्य बिम्ब कहा जा सकता है! जागर में कई बार सहायक उपकरण जिसमें डौंर-थाली या फिर चर्म वाद नहीं बजते भी ऐसी प्राण प्रतिष्ठा के गवाह बनते हैं! मुख्यतः चर्म कांस्य वाद्ययंत्र किसी आत्मा को मनुष्य पर उतारकर उसकी इच्छाओं की पूर्ती या फिर अपने कष्टों क्लेशों के समाधान का तरीका मना गया है जिन्हें जागर गाकर अवतरित करना मूल लक्ष्य होता है!

बहरहाल यह दुर्लभ शैली धीरे धीरे हमारी लोक संस्कृति के साथ गायब हो रही है लेकिन यह भी सुखद है कि वर्तमान कर्णधारों ने इसे जीवंत करने के लिए अपने गाँवों को आबाद करने का एक तरीका बना लिया है व सभी प्रवासियों के लिए गर्मियों की छुट्टियों का यह एक लक्ष्य बन गया है कि साल में एक बार हफ्ता दस दिन गाँव में बिताया जाय जिसके लिए देव पूजन व जागर रात्री जागरण व मनोरंजन के साधन बन सकें!

Himalayan Discover
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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