Sunday, July 21, 2024
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ग्लोबल समिट’ में अपना गडेरिया कहां!

ग्लोबल समिट’ में अपना गडेरिया कहां!

(व्योमेश जुगराण)

आइए, पंवाली के उन गडेरियों की भी बात कर ली जाए जो दूर-दूर से अपनी भेड़-बकरियों को लेकर यहां पहुंचते हैं। लेकिन आगे बात करने से पहले कुछ संदर्भ उत्तराखंड में आगामी दिसम्बर माह में होने जा रहे ‘ग्लोबल इन्वेस्टर समिट’ का लें।

समिट के बारे में पूर्वावलोकन कार्यक्रम (कर्टन रेजर) 14 सितम्बर को नई दिल्ली के होटल ताज मानसिंह में हुआ। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इस मौके पर मौजूद थे। उन्होंने उत्तराखंड के औद्योगिक वातावरण और संभावनों का एक शानदार चित्र पेश किया। हालांकि राज्य में टूरिज्म, हॉस्पिटैलिटी, हॉर्टीकल्चर, प्लास्टिक उत्पाद, स्थानीय दालें, जड़ी-बूटी, स्टार्ट अप्स, लॉजिस्टक और कई अन्य सेक्टरों में निवेश की आशाओं पर अच्छी/सार्थक चर्चा हुई। लेकिन व्यावहारिक नजरिए से देखें तो पहाड़ में बहुत से ऐसे उद्यमी क्षेत्र हैं, जो इस ग्‍लोबल समिट के मद्देनजर निराशा के भंवर में हैं। भेड़ पालन व ऊन ऐसा ही एक उद्यम है जो पहाड़ में पूरी तरह उपेक्षित है।

पंवाली कांठा के चरागाह में हमारी मुलाकात कुछ गद्दियों यानी भेड़ पालकों से हुई। संदीप सिंह कुंवर करीब 500 भेड़-बकरों के साथ इन दिनों पंवाली कांठा बुग्याल में हैं। वह अपने तीन सहायकों के साथ इस चारागाह में आए हैं। भेड़े चरने गई हैं और संदीप सिंह दोपहर का भोजन कर पन्नियों से बने अस्थाई टेंट में सुस्‍ता रहे हैं। उनका सहायक तेज सिंह कुंवर काली-सफेद ऊन के छोटे-छोटे गुच्छे जमीन पर बिछे एक मोटे कपड़े पर फैला रहा है। कच्ची ऊन/ कपास से ठुंसे कुछ बोरे पास ही पड़े हैं।

हमने ऊन पर ही बातचीत शुरू की तो इन ग‍ड़ेरियों का सारा दर्द छलक उठा। कपास के बोरों की ओर इशारा कर संदीप कुंवर ने बताया कि भेड़ों से उतारी गई करीब 15 क्विंटल ऊन खुले में पड़े-पड़े सड़ रही है। इसका कोई खरीदार दूर-दूर तक नहीं है। पहले पानीपत का कारखाना कच्‍ची ऊन ले लिया करता था, मगर अब वहां से भी मनाही हो चुकी है। उत्तराखंड में ऐसा कोई प्लांट नहीं है, जो इस को ऊन खरीद सके। हम तो ऋषिकेश अथवा देहरादून तक भी पहुंचाने को तैयार हैं, बशर्ते मेहनत का ठीक-ठाक मुनाफा मिल जाए।

गौरतलब है कि इस क्षेत्र में उत्पादों को निकटतम सड़क मार्ग तक पहुंचाने के लिए रज्जु मार्ग (रोपवे) की भी सुविधा उपलब्ध है। संदीप बताते हैं कि सीजन में अपनी भेड़ों से तीन बार ऊन निकालनी ही पड़ती है। उन्‍होंने यह भी बताया कि भेड़पालकों की करीब दो दर्जन टोलियां क्षेत्र के विभिन्न चरागाहों में मौजूद हैं। ऊन को लेकर सबकी यही व्यथा है।

स्वयं उनका परिवार या गांव के कुछ परिवार मिलकर छोटे पैमाने पर ही सही, ऊन कातने का उद्यम क्यों नहीं करते, इस प्रश्न पर उन्‍होंने बताया कि कताई की बारीकियां हमें नहीं आतीं। हां, सरकार विधिवत प्रशिक्षण की व्यवस्था करे तो हम जरूर कातेंगे। संदीप कुंवर जैसे गद्दियों (भेड़ चारकों) ने अब ऊन की बजाय सारा ध्यान भेड़-बकरियों के प्रजनन और बिक्री पर केंद्रित कर दिया है। इसके सिवाय इनके पास विकल्प है भी नहीं।

पारंपरिक पशु चारण के इन ‘सजीव पुरावशेषों’ की उत्तराखंड के आगामी ‘ग्‍लोबल समिट’ के मद्देनजर कितनी अहमियत है, इसकी मीमांसा जरूर करें। ….

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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