गैरसैण विधान सभा भवन भराड़ीसैण। जहाँ भराड़ी देवी के साथ निवास करती थी ऐड़ी आँछरी…! दुनिया की अद्भुत चक्की …जो बिना बिजली या पानी के चलती थी।
(मनोज इष्टवाल 20 नवम्बर 2016)
चूँकि चुनाव की आचार संहिता कभी भी लग सकती है और यह भी तय है कि क्षेत्रीय विधायक डॉ. अनुसूया प्रसाद मैखुरी का यह विधान सभा क्षेत्र अब उनके लिए इतना सरल नहीं रहा जितना पहले जीतना लग रहा था। वे शायद बेहद प्रफुल्लित इस बात को लेकर थे क़ि इस दो दिवसीय सत्र में भराड़ीसैण ग्रीष्म कालीन राजधानी और गैरसैण जिला घोषित हो जाएगा तो दोनों हाथों में उनके लड्डू ही लड्डू होंगे। मैंने जिस अंदाज में इस बार उन्हें ढोल दमाऊं की धुन पर विधान सभा सत्र से पूर्व थिरकते देखा तो यही कहूंगा कि विधान सभा सत्र शुरू होने से पूर्व उनके पाँव जमीन में नहीं टिक रहे थे।
लेकिन 18 नवम्बर 2016 को मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा ऐन सत्र शुरू होने से पूर्व की गयी प्रेस कांफ्रेंस ने उन्हें ही नहीं बल्कि उस क्षेत्र की पूरी जनता को निराश कर दिया जो जाने कितने सपने देख रही थी।
यह वही विधान सभा क्षेत्र है जिसने हर बार पढ़े लिखे राजनेता ही अपने क्षेत्र से विधायक बनाये हैं जिनमेँ डॉ. शिवानंद नौटियाल, डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक और डॉ. अनुसुया प्रसाद मैखुरी इत्यादि शामिल हैं।
निराशा और हताशा इतनी क़ि जो बुजुर्ग व पत्रकार यह आंकलन कर बैठे थे क़ि जिला या ग्रीष्म कालीन राजधानी तो तय है वे ही मुख्यमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस के बाद बिना सत्र अटेंड किये पहले ही वहां से निकल चले।
एक अधिकारी तो ये तक कह गए क़ि बस बीड़ी का बंडल माचिस हो और दो चार गाय भैंस ऊपर से सरसराती गर्मियों में ठंडी हवा तो सच कहिये यहाँ मजा आ जाएगा।
एक और बात यह देखने को मिली क़ि इस क्षेत्र के व्यवसायियों में बेहद ईमानदारी दिखी चाहे गैरसैण रहा हो या दीवालीखाल दोनों ही जगह चाय खाना सब्जी या अन्य वस्तुओं के दाम एक पैंसा भी बढाए नहीं गए जबकि यहॉ सत्र किसी मैदानी भू भाग में होता तो महंगाई की मार अलग झेलनी पड़ती। सचमुच हमारे पहाड़ियों का हृदय पहाड़ जैसा ही है।
सारकोट के एक व्यक्ति से जब मैंने भराड़ी सैंण के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया साहब जाने क्या सोचकर इस वीरान जंगल में राजधानी बनाने की सोची। जहाँ रिख (भालू) बाघ और शेर का बसेरा था वहाँ अब मनुस्वाग बाघ (मैन ईटर) रहेंगे ।
फिर चश्मा ठीक करते हुए बोले साब- ओ देखो सार्यु ग्वाड़, मरोड़ा, सारकोट और परवाड़ी गॉव इन सबको पता है क़ि यहाँ भालू बाघ शेर और भमोरा होते थे। भराड़ी देवी के साथ यहाँ बसगाळ (बरसात) में ऐड़ी आँछरी (परियां) रहती थी आज देखो जाने वो ऐड़ी आँछरी कहाँ लोप (लापता) हो गयी। जरा इन पर लगती ना जो हुहुहुउहु (हूटर) करते हुए गाड़ियों में आ रहे हैं और यहाँ हग मूत कर चले जा रहे हैं।
अहा…वे अपनी पूरी रौ में थे क़ि तब तक हमारे मित्र पत्रकार विजेंद्र सिंह रावत जी ने आवाज़ दे दी। मैं थोड़ी देर उलझ क्या गया कि वे भी बिषय बदल गए।फिर बोले सच्चु होलु भैरव नाथ त…! मैंने बीच में ही टोक कर कहा यह भैरव नाथ कहाँ से आ गए?
वो लाठी मजबूती से टेक कर अपने सहयोगी की तरफ घूमे और बोले- इलैकि त ब्वदिन, नादाँ की दोस्ती..
खैर छवाडा ! फिर मेरी तरफ मुंह करके बोले- साब कना पत्रकार हो आप। अरे ब्वन क्याच् ! यहाँ थोड़ी दूर सड़क के ऊपर, जो सड़क दीवालीखाल जाती है के पास जंगली भैरव का मंदिर है। यहाँ से कोई बुजुर्ग महिला रोज दूध लेकर दीवालीखाल जाती थी जिसके पास जेवर के रूप में 45 तोला सोना होता था। इसे वक्य बार चोर ने लूट लिया लिया लेकिन भैरव देवता ने धावड़ी लगाईं और उसे लोगों ने परवाड़ी के पास पकड़ लिया।
साब ये इलाका बहुत पुण्य वाला है यहाँ भराड़ी देवी की ऐसी चक्की थी जिसमे गेहूं मंडुवा पिसवाने के लिए न वह चक्की पानी से चलती थी ना बिजली से…। जाने कैसे हवा से चलती थी। यहीं धान भी कूटते थे। कहा तो ये भी जाता है कि ये ऐड़ी आँछरी की चक्की थी। फिर उन्होंने बीड़ी सुलगायी और हाथ जोड़ते बोले – अच्छा साब चलता हूँ, जरा दूर भी जाना है क्या करें । आप छाप देना मैंने जो कहा- विधान सभा होलो यूंको खुप्रु ! माजद सर्र्या दिन खराब ह्वेगये!
स्टोरी तो क्लिक कर गयी थी लेकिन समय अभाव से इस पर मैं पूरा काम नहीं कर पाया लेकिन है भराड़ीसैण मजेदार वही अधिकारी वाला बीड़ी का बण्डल।

