Thursday, January 22, 2026
Homeलोक कला-संस्कृतिगीतों में कोरस का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

गीतों में कोरस का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

गीतों में कोरस का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

(मनोज इष्टवाल)

प्रश्न बहुत सरल सा दिखाई देता है लेकिन है बेहद कठिन! सच कहें तो यह कह पाना बेहद कठिन है कि गीत की संरचना पहले हुई है या कोरस की। अर्थात गान ने पहले जन्म लिया या समूहगान ने? यह प्रश्न दिखने में हल्का लगता है लेकिन बेहद महत्वपूर्ण व् सारगर्वित लगने के कारण महत्वकांक्षा भी बढ़ी। मजबूरन पूरी रात कई किताबें उलटनी पड़ी और उसके बाद जो सार समुख आया वह यह है कि गीत संरचना से पहले कोरस यानि सामूहिक गायन प्रचलन में आया।

कोरस का प्रयोग ट्रेवोर बेलिस और जैक चलोनेर ने 2,600,000 ईसा पूर्व घोषित किया है जबकि गीतों का लेखन इसके कई हजार साल बाद माना जाता है।
मेरा मानना है कि यह शोध उन्होंने यूरोपियन कंट्री के हिसाब से किया है जबकि एशिया या मध्य एशिया के सम्पूर्ण भू भाग में इसका चलन सतयुग यानि करोड़ों साल पहले तब हो गया था जब ब्रह्म बिष्णु और महेश ने सृष्टि की संरचना की थी। ब्रह्म की नाभि से कमल की उत्पत्ति व अन्य अंगों से ब्राह्मण राजपूत वैश्य शूद्र उत्पन्न होने के पश्चात जब शिब पार्वती विवाह हुआ तब कोरस के रूप में मांगलिक गीत प्रचलन में आये वही गीत माँ नन्दा व शिव के विवाह में भी मांगल के रूप में प्रयोग में लाये गए जिन्हें समूह गान यानि कोरस कहा जाता है जैसे –
क्यो छ याँ बुबाजी निंद सुनिन्दा, तुम्हारी चोराड़ी चोर ऐज्ञेनी।
या फिर-
हमारू बामण काशी पड्यूं छ, तुम्हारो बामण ढेबरा चारांदा हेs।

आज भी निरंतर ये मांगल गीत करोड़ों बर्षों से कोरस के रूप में जीवित् है जिनका मृत्यु काल अभी तक निश्चित नहीं हुआ है जबकि गीत संरचना के बाद उसका मृत्युकाल 1000 बर्ष अधिकतम व 20 बर्ष न्यूनतम माना गया है। जो गीत सदी पार कर जाते हैं वे गीत नहीं बल्कि लोकगीत कहलाते हैं और कभी कभी ये लोक गीत कालांतर के चलते समूहगीत यानि कोरस में तब्दील हो जाते हैं। इसलिए कोरस को किसी गीत की पुट बंदी मानना सर्वथा गलत है हाँ इसे गीत को श्रृंगारित करने का माध्यम जरूर माना जा सकता है या कहा जा सकता है।

ये कोरस गायन की प्रक्रिया आज भी सम्पूर्ण विश्व के आदिवासी व जनजातीय लोगों में निरंतर चली आ रही है। गढ़वाली जौनसारी व कुमाउनी में भी ये कोरस थड़िया चौंफला बाजूबंद हारुल झैँता, भाभी जंगू बाजू, न्यौली,चांचरी, छपेली इत्यादि में निरंतर प्रयोग में लाई जा रही है। इसलिये कोरस को किसी भी गीत का पुछलग्गू मानना सर्वथा निरर्थक है।

Himalayan Discover
Himalayan Discoverhttps://himalayandiscover.com
35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
RELATED ARTICLES