Sunday, July 21, 2024
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“लोकगीतों में कोरस” का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

लोकगीतों व गीतों में कोरस" का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

“लोकगीतों व गीतों में कोरस” का प्रयोग कब और कहाँ से शुरू हुआ?

(मनोज इष्टवाल)

सच कहें तो यह प्रश्न बहुत सरल सा दिखाई देता है लेकिन है बेहद कठिन!क्योंकि आप किसी भी लोक संस्कृति के धनि लोक गायक से अगर इस प्रश्न का जबाब मांगेंगे तो वह बगलें झाँकने लगेगा। हम जाने क्यों वर्तमान के परिदृश्य में चार छ: गीत गाकर ट्रेंड में आये किसी भी गायक की प्रशंसा में उसे बड़े बड़े मंचों से लोकगायक का तमगा पहना देते हैं जबकि स्वयं नहीं जानते कि लोक का अर्थ है क्या ? यह प्रश्न मेरे लिए भी अचम्भित करने वाला था क्योंकि जिस शख्स ने “लोकगीतों व गीतों में कोरस” प्रश्न उठाकर मेरे समुख रखा उसे झेलना भी उतना ही कठिन है। शैलेंद्र जोशी नामक श्रीनगर के इस लोकसंस्कृति के चितेरे व्यक्ति से मिला तो नहीं हूँ, अब प्रश्न दिखने में हल्का लगता है लेकिन बेहद महत्वपूर्ण व् सारगर्वित लगने के कारण महत्वकांक्षा भी बढ़ी। मजबूरन पूरी रात कई किताबें उलटनी पड़ी और उसके बाद जो सार समुख आया वह यह है कि गीत संरचना से पहले कोरस यानि सामूहिक गायन प्रचलन में आया।
कोरस का प्रयोग ट्रेवोर बेलिस और जैक चलोनेर ने 2,600,000 ईसा पूर्व घोषित किया है जबकि गीतों का लेखन इसके कई हजार साल बाद माना जाता है।

मेरा मानना है कि यह शोध उन्होंने यूरोपियन देशों के हिसाब से किया है जबकि एशिया या मध्य एशिया के सम्पूर्ण भू-भाग में इसका चलन सतयुग यानि करोड़ों साल पहले तब हो गया था, जब ब्रह्म बिष्णु और महेश ने सृष्टि की संरचना की थी। ब्रह्म की नाभि से कमल की उत्पत्ति व अन्य अंगों से ब्राह्मण राजपूत वैश्य शूद्र उत्पन्न होने के पश्चात जब शिब पार्वती विवाह हुआ तब कोरस के रूप में मांगलिक गीत प्रचलन में आये वही गीत माँ नन्दा व शिव के विवाह में भी मांगल के रूप में प्रयोग में लाये गए जिन्हें समूह गान यानि कोरस कहा जाता है जैसे –
क्यो छ याँ बुबाजी निंद सुनिन्दा, तुम्हारी चोराड़ी चोर ऐज्ञेनी।
या फिर-
हमारू बामण काशी पड्यूं छ, तुम्हारो बामण ढेबरा चारांदा हेs।


हाँ भी कई विद्वान हमारे तर्कों को झुठलाने की कोशिश में कई वितर्क देंगे लेकिन उनके पास सृष्टि संरचना के प्रमाण के रूप में देने के लिए कुछ नहीं है जबकि हमारे शास्त्र पुष्टि करते हैं कि सृष्टि के विस्तार के लिए नारायण का अवतार हुआ।नारायण की नाभि से ब्रह्मा (सृष्टि का प्रथम प्राणी कमल योनि से उदभव् बिना नारी से उत्पन्न)जी उत्पन्न हुए, उनके तप से सनकादिक ऋषि उर्बरता मुनि व उनसे चार स्वरूप १) सनातन २) सदान्द ३) सनन्द ४) सनतकुमार के रूप में जाने गये। जिसे ब्रह्म स्वरूप भी माना जाता है। उनके विराट स्वरूप से १) ब्रह्मा की भौहों से रुद्र, २) ब्रह्मा की छाया से कर्दम ऋषि, ३) स्तन से धर्म और पीठ से अधर्म, ४) हृदय से काम, ५) नीचे की ओर से लोभ, ६) मुख से वाणी की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती, ७) लिङ्गसे समुद्र, ८) गुदा से पाप का निवास स्थान (राक्षसोंका अधिपति) निर्ऋति) ९) मन से मरिचि का जन्म माना गया है।

ब्रह्मा की मानसिक सृष्टि से कई ऋषियों ने जन्म लिया जिनमें मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, अथर्वा, दक्षनारद ने जन्म लिया। मरीचि का विवाह कला, अत्रि का अनुसुया, अंगिरा का श्रद्धा, पुलस्त का हर्विभू, पुलह का गति, क्रतु का क्रिया,भृगु का ख्याति, वशिष्ठ का अरूंधति, अर्थवा का शांति, दक्ष का प्रसूति से विवाह हुआ जबकि नारद ब्रह्मचारी रहे।

सृष्टि संरचना को कैसे बढ़ाया जाय इसके लिए ब्राह्म ने “मैथुनि सृष्टि” का प्रारंभ किया जिस्मवन उनके बाएं अंग से शतरूपा (नारी) पत्नी व दाहिने अंग से मनु का जन्म हुआ। इन दोनों से देवहूति (कन्या) , आकूति (कन्या), प्रसूति (कन्या), उत्तानपाद (पुत्र), प्रियव्रत (पुत्र) पैदा हुए। देवहूति ने पति के रूप में कर्दम, आकूति ने प्रजापति रूचिप्रसूति ने प्रजापति दक्ष का वरण किया जबकि दक्ष पुत्रों में उत्तानपाद ने पत्नी के रूप में सुनीता सुरूचि, व प्रियव्रत ने बहिर्मति का वरण किया। उत्तानपाद व सुनीता से पुत्र ध्रुव, व उत्तम ने जन्म लिया। इनसे फिर नौ रूद्र जन्मे। फिर देवहुर्ति -कर्दम का वंश जन्मा जिसमें नौ कन्यायें व एक पुत्र जन्मा। 10 ऋषियों में मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ठ, अथर्वा, दक्ष की संतानो से फिर सृष्टि की संरचना की पूर्ती हुए। 11वें ऋषि नारद कुंवारे रहे इसलिए उन्हें सृष्टि के समस्त मण्डलों का अधिपति नियुक्त किया गया और वे विश्व के पहले संवादवाहक कहलाये।

आज भी निरंतर ये मांगल गीत करोड़ों बर्षों से कोरस के रूप में जीवित् है जिनका मृत्यु काल अभी तक निश्चित नहीं हुआ है, जबकि गीत संरचना के बाद उसका मृत्युकाल 1000 बर्ष अधिकतम व 20 बर्ष न्यूनतम माना गया है। जो गीत सदी पार कर जाते हैं वे गीत नहीं बल्कि लोकगीत कहलाते हैं, और कभी कभी ये लोक गीत कालांतर के चलते समूहगीत यानि कोरस में तब्दील हो जाते हैं। इसलिए कोरस को किसी गीत की पुट-बंदी मानना सर्वथा गलत है। हाँ…. इसे गीत को श्रृंगारित करने का माध्यम जरूर माना जा सकता है या कहा जा सकता है।

ये कोरस गायन की प्रक्रिया आज भी सम्पूर्ण विश्व के आदिवासी व जनजातीय लोगों में निरंतर चली आ रही है। गढ़वाली, जौनसारी व कुमाउनी में भी ये कोरस थड़िया, चौंफला, बाजूबंद, हारुल, झैँता, भाभी, जंगू-बाजू, न्यौली,चांचरी, छपेली इत्यादि में निरंतर प्रयोग में लाई जा रही है। इसलिये कोरस को किसी भी गीत का पुछलग्गू मानना सर्वथा निरर्थक है। यह कहना कि कोरस का प्रयोग ट्रेवोर बेलिस और जैक चलोनेर ने 2,600,000 ईसा पूर्व घोषित किया है,सर्वथा गलत है! क्योंकि सनातन परम्पराओं में कोरस अर्थात समूह गान की परम्परा सृष्टि संरचना से पूर्व अर्थात सतयुग के आरम्भ से ही शुरू हो गयी थी, मनु के जन्म के बाद तो युग बदले जबकि इससे पूर्व सतयुग के अंतिम चरण में इंद्र के दरबार, वैदिक काल में राजा दुष्यंत के दरबार में देवदासियां व भाट -चारण व अप्सराएं सामूहिक नृत्य के साथ-साथ सामूहिक गान भी किया करती थी जिसका वर्णन हमें वेद पुराणों में वर्णित है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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