उत्तराखंड की ‘मांगल गर्ल’ नंदा सती!– विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुके पौराणिक मांगल गीतों को नयी पहचान दे रही है पिंडर घाटी की बेटी..
ग्राउंड जीरो से संजय चौहान!
(अंतराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष)
आज महिला दिवस है। पहाड़ की महिलाओं/ बेटियों नें सदा से ही विश्व के पलक पर अपने कार्यों से अपनी चमक बिखेरी है और पहाड़ का माथा ऊंचा किया है। इसी कडी में इस बार आपको महिला दिवस पर रूबरू करवाते हैं बहुमुखी प्रतिभा की धनी उत्तराखंड की मांगल गर्ल नंदा सती से, जिन्होंने बेहद छोटी उम्र में लोगों के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है कि यदि सही दिशा में प्रयास और मेहनत की जाय तो सफलता जरूर मिलती है।
सीमांत जनपद चमोली के पिंडर घाटी के नारायणबगड ब्लाॅक के नारायणबगड गांव की नंदा सती नें मांगल गीतों के संरक्षण और संवर्धन के जरिये एक नयी लकीर खींची हैं। महज 20 बरस की छोटी सी उम्र में नंदा सती द्वारा गाये जानें वाले मांगल गीतों और लोकगीतों को सुनकर हर कोई अचंभित हो जाता है। यही नहीं हारमोनियम पर उनकी पकड़ वाकई अदभुत है। नंदा की 12 वीं तक की पढाई लिखाई नारायणबगड गांव में ही हुई। वर्तमान में नंदा हेमवंती नंदन केंद्रीय विश्वविद्यालय श्रीनगर में अध्यनरत है और संगीत विषय में स्नातक की अंतिम वर्ष की छात्रा है।
दादी से विरासत में मिले मांगल गीतों को गुनगुना!
मांगल गर्ल नंदा सती कहती हैं मांगल गीत हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान है। इसके बिना हमारे लोकजीवन का कोई भी शुभ कार्य, उत्सव, तीज- त्यौहार पूर्ण नहीं हो सकता है। मांगल शुभ, उल्लास और ख़ुशी का प्रतीक है। यह उत्तराखंडी की पौराणिक लोकसंस्कृति की पहचान है। इनके बिना पहाड़ के लोक की कल्पना करना असंभव है। मैं बहुत ख़ुशनसीब हूँ की मुझे मांगल गीतों की समझ और महत्ता अपनी दादी से विरासत में मिली। बरसों से मांगल और लोकगीत एक पीढी से दूसरी पीढी को यों ही हस्तांतरित होते आ रहें हैं।
ये हैं पौराणिक मांगल गीत!
पहाड़ का का लोकजीवन उत्सवों एवं तीज त्यौहारों से अटा पडा हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक यहां उत्सव मनाए जाते हैं। लगभग प्रत्येक महीने में यहाँ कोई न कोई तीज त्योहार होता है। इसलिए यह उत्सवप्रिये समाज हर पल प्रसन्नता के क्षणों में जीता है। अपनी उत्सवप्रियता को वह गीत- संगीत के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। इन्हीं में से एक है पौराणिक मांगल गीत, जिनका जुड़ाव सीधा लोगों से होता है। मांगल गीतों में पहाड़ के लोकजीवन का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। इनकी मिठास लोगों को मंत्रमुग्ध कर देती है। पहाड के घर गांवो में सभी शुभ कार्यों शादी, चूडाकर्म इत्यादि के अवसरों पर जब मधुर कंठों में मांगल गीत गाये जाते हैं तो पूरा वातावरण महकने लगता है। या यों कहिए की मांगल गीत खुशियों के गीत हैं, देवताओं के आह्वान के गीत और पूरे लोक, समाज, परिवार को राजी खुशी रखने की कामना के गीत हैं। बदलते परिवेश और आधुनिकता की चकाचौंध में हमारे ये पौराणिक मांगल गीत भी विलुप्ति की कगार पर हैं। विगत सालों में डाॅ माधुरी बडथ्वाल, गायिका रेखा धस्माना उनियाल, लक्ष्मी शाह, पतंजलि मांगल टीम, लदोला महिला मंगल दल से लेकर केदारघाटी की महिला मंगल दलों की मांगल टीम, गायक सौरभ मैठाणी की मांगल टीमों नें जरूर पारम्परिक मांगल गीतों को सहेजने के भगीरथ प्रयासों को अमलीजामा पहनाया है। इन सबसे इतर नंदा सती युवा पीढ़ी की प्रतिनिधि मांगल गायिका है। लोग इन्हें मांगल गर्ल के नाम से जानते हैं।
मांगल गर्ल नें लाॅकडाउन में डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिये मांगल गीतों को हजारों लोगों तक पहुंचाया ..
भले ही कोरोना काल लोगों के लिए दुःस्वप्न साबित हुआ हो लेकिन नंदा सती नें इस कठिन दौर में भी अपनी मांगल गीतों के जरिये लोकसंस्कृति की सौंधी खुशबू को देश विदेश तक हजारों लोगों तक पहुंचाया। नंदा सती नें लाॅकडाउन की अवधि में विभिन्न ग्रुपों, संगठनों, फेसबुक लाइव, इंस्टाग्राम और यूट्यूब के जरिये मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति से हर किसी को मंत्रमुग्ध कर दिया था। जिस कारण लोगों को झुकाव अपने पौराणिक मांगल गीतों की ओर हुआ। खासतौर पर युवा पीढ़ी के युवाओं को नंदा की ये अनूठी मुहिम बेहद पसंद आई।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं मांगल गर्ल!
मांगल गर्ल नंदा सती बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। वो न केवल एक बेहतरीन मांगल गायिका है अपितु प्रतिभाशाली छात्रा और खिलाडी भी है जबकि एनएसएस विंग की होनहार छात्राओं में शुमार है। मांगल गीतों की शानदार प्रस्तुति पर उनकी लोक को चरितार्थ करती जादुई आवाज और हारमोनियम पर थिरकती अंगुलियां लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती है।
मांगल गर्ल नंदा सती से मांगल गीतों पर लंबी गुफ्तगु हुई।मांगल गर्ल कहती हैं कि हमारी सांस्कृतिक विरासत ही हमारी असली पहचान हैं। पुराने समय में गढ़वाल क्षेत्र में हर विवाह समारोह या फिर किसी भी शुभ कार्य के दौरान महिलाओं द्वारा मांगल गीतों को गाने की परम्परा थी। बदलते समय और आधुनिकिरण के साथ धीरे-धीरे ये परंपरा खत्म होने लगी है। समय बीतने के साथ आज इन मांगल गीतों की जगह हिंदी और पंजाबी गानों ने ले ली है। आवश्यकता है हमें अपनी पौराणिक मांगल गीतों के संरक्षण और संवर्धन की। कई लोग इस ओर प्रयासरत भी है। इस साल हरिद्धार महाकुंभ में भी मांगल गीत के कार्यक्रम आयोजित किये जायेंगे जो की हमारी लोकसंस्कृति के लिए सुखद है। यदि सभी अपने अपने स्तर से मांगल गीतों को प्रोत्साहित करने की कयावद करेंगे तो जरूर हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध कर पायेंगे। मेरा सपना है की उत्तराखंड के मांगल गीतों को संरक्षित करके उनको नयी पहचान दिला सकूं, बस अभी तो शुरूआत भर की है।
वास्तव में देखा जाए तो मांगल गर्ल नंदा सती नें अपनी छोटी सी उम्र में मांगल गीतों को सहेजने का जो बीडा उठाया है वो अनुकरणीय तो है ही अपितु नयी पीढ़ी के युवाओं के लिए उदाहरण भी है की कैसे अपनी माटी और जडो से जुडा जा सकता है। नंदा सती नें अपने मंजिल की ओर कदम बढाया हो लेकिन अभी मंजिल बहुत दूर है व बहुत लंबा फासला तय करना बाकी है। भले ही नंदा सती के घर के ठीक सामने बहनें वाली पिंडर नदी में हर दिन लाखों क्यूसिक मीटर पानी बिना शोर शराबे के यों ही बह जाता हो परंतु आने वाले समय में मांगल गर्ल के मांगल गीतों की गूंज पूरे विश्व में सुनाई देगी। जिस तरह से विगत दिनो युवा गायिका मैथिली ठाकुर द्वारा गाये गये गढ़वाली मांगल गीत को सबने सराहा था आशा और उम्मीद करते हैं कि ठीक उसी तरह आप पहाड़ की प्रतिभावान मांगल गर्ल नंदा सती को भी प्रोत्साहित और हौंसलाफजाई करने में कोई कोर कसर नहीं छोंडेगे। आप मांगल गर्ल नंदा सती के गाये मांगल और लोकगीतों को उनके यूट्यूब चैनल पर भी सुन सकते हैं। लिंक ये है:-
हमारी ओर से मांगल गर्ल को सुनहरे भविष्य की ढेरों बधाइयाँ साथ में महिला दिवस की भी। पूरे उत्तराखंड को नाज है पहाड़ की इस होनहार बिटिया पर…।

