Thursday, February 29, 2024
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उत्तराखंड और आदमखोर…इस बार नौनिहाल बना निवाला।

(पार्थसारथि थपलियाल)

सावन के उमड़ते घुमड़ते बादल जहाँ पहाड़ों में खुद (टीसभरी याद) लेकर आते थे वहां अब दुःख लेकर आते हैं। कहीं पहाड़ों के दरकना और कहीं बाढ़ में बह जाना। इन आपदाओं से पहाड़ वासियों ने जीवन के साथ जोड़ दिया है। मनुष्य ने प्रकृति के साथ जो किया उसे प्रकृति लौटा रही है।
इससे भारी कष्ट तो पर्वतीय जन जीवन में सरकार की वे नीतियां पहुंचा रही हैं जिससे अपने घरों में भी जीवन सुरक्षित नही है।

इस बार पौड़ी जिले के ढैजुली पट्टी के बड़ेथ गाँव के लाल सिंह नारायण का पांच वर्षीय पुत्र आर्यन गुलदार (बाघ) का निवाला बना। घटना 28 जुलाई 2022 की बताई जा रही है। अपने माँ-बाप की आंखों का तारा मासूम आर्यन अब इस दुनिया मे नही है। तीन बहनों का इकलौता भाई को सरकार की नीतियों ने एक मासूम बच्चे को बाघ का निवाला वन दिया। बच्चा आर्यन शाम के वक्त अपनी मॉ के साथ गौशाला के निकट था तभी एक गुलदार नें अबोध आर्यन पर झपट्टा मारा और माँ के सामने झाड़ियों में ले गया। रात के अँधेरे में झड़ियों में बच्चे को ढूंढना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि सावन के बादलों से घिरे गाँव के आस पास खोजने वालों के जीवन को भी खतरा था। वन विभाग के कर्मचारी ज़ूचना मिलने के बाद अगली सुबह आये।

जंगल मे जो दृश्य था वह अपराध और करुणा की कहानी एक साथ बयां कर रहा था। यह घटना स्थानीय मीडिया में खूब प्रकाशित हुई। इस कॉलम में समाचार देना महत्वपूर्ण नही है। महत्वपूर्ण यह है कि आखिर उत्तराखंड में कब तक ऐसा चलता रहेगा। अभी एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमे गुलदार घर के अंदर घूम रहा था। पिछले हफ्ते दुगड्डा के निकट अपने बेटे को स्कूल छोड़ने गई महिला जब घर लौट रही थी उसे बाघ ने अपना निवल बना दिया। उत्तराखंड में पिछले दो दशकों में औसतन 60 लोग जंगली जानवरों के निवाले बने हैं।

लोगों को किसी भी बाघ, भालू, सुअर बंदर आदि को मारने की अनुमति नही है। लोग हाका मारकर, रोकर, चिल्लाकर या ताली बजाकर अपना बचाव करने को विवस हैं। पीड़ित परिवारों किसी प्रकार की आर्थिक सहायता भी तब तक नही मिलती जब तक जंगली जानवर प्रमाणित न हो। इस प्रकार की घटना का प्रमाण कांसखेत के निकट एक गाँव मे घटित घटना है। इडके अर्थ यह हुआ कि जब जंगली जानवर घाट लगा रहा हो उस समय आदमी अपना कैमरा से फोटो भी लेकर मर जाए ताकि परिवार को मुवावजा मिल सके। उत्तराखंड का प्रशासन संवेदना विहीन है। पूरा प्रशासन जन सेवा की बजाय धन संग्रह में व्यस्त है। वे प्रशासनिक अधिकारी जो इन हरकतों में व्यस्त हैं समाज का एक वर्ग उनकी कारगुजारी के प्रमाण इकठ्ठा कर रहा है। झारखंड की अधिकारी पूजा सिंघल की तरह उत्तराखंड के कई अधिकारी भी आईने में उतरने वाले हैं।
मुख्यमंत्री धामी संवेदनशील राजनेता हैं। मुख्यमंत्री, क्या वन नीति को लोकानुकूल बनाने का प्रयास करेंगे। वर्तमान स्थितियों को देखते हुए उत्तराखंड में पलायन को रोक पाना संभव नही है।

जनभावना जो उभर रही है इसके लिए पेश है ताज भोपाली का एक शेर-
तुम्हारी बज़्म से बाहर भी एक दुनिया है
मेरे हुज़ूर बड़ा जुर्म है ये बेख़बर होना।

Himalayan Discover
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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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