Friday, April 4, 2025
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सूक्ष्म जीवों की खेती में उपयोगिता।

(डा० राजेन्द्र कुकसाल)

मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों की आबादी ही मृदा के स्वास्थ्य को निर्धारित करतें हैं। मृदा को अभी तक एक निर्जीव भौतिक वस्तु मात्र माना जाता था। किन्तु वास्तव में मृदा एक जीवित क्रियाशील तंत्र है, जिसके अपने जैविक, रसायनिक और भौतिक गुण होते हैं। इनमें से किसी एक के भी परिवर्तन अथवा बदलाव होने से मृदा के मूल भूत स्वरूप एवं स्वभाव में परिवर्तन ला देता है। मृदा स्वास्थ्य पोषण सुरक्षा का एक मूल भूत घटक है।यह उत्पादित आहार की गुणवत्ता और मात्रा को भी प्रभावित करता है।

‌मृदा में बहुत छोटे सूक्ष्म जीव होते हैं जिन्हें हम आंखों से नहीं देख सकते। एक ग्राम मिट्टी में इनकी संख्या करोड़ों में होती है। सूक्ष्म जीव मुख्यतया बैक्टीरिया, फफूंद, एक्टिनोमाइसेट्स शैवाल, प्रोटोजुआ और वाइरस आदि बहुत सारे होते हैं। ये जीव हमारी मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढाते हैं तथा टिकाऊ कृषि के लिए ज़रूरी हैं । यदि हमारे खेत में सूक्ष्म जीव अधिक है तो निश्चित रूप से हमारी खेत की उर्वरा शक्ति भी अच्छी होगी। मृदा में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता के लिए जीवांश पदार्थों की उपस्थिति,नमी, वायु संचार तथा निरंतर उदासीन के आसपास पी एच मान का होना आवश्यक है। ये चारों आवश्यकतायें जीवांश खाद से पूरी की जा सकती है।

सूक्ष्म जीव से कई लाभ होते हैं।

1-  हम जो भी जैविक पदार्थ खेत में डालते हैं चाहे वह गोबर की खाद हो, कम्पोस्ट खाद हो,वर्मी कम्पोस्ट हो,हरी खाद हो, फसलों के अवशेष हों, विभिन्न प्रकार की खलियां, मुर्गी की खाद हो हड्डियों का चूरा या मछलियों की खाद कुछ भी जीवांश खेत में डालते हैं उसको सड़ाने का काम सूक्ष्म जीव ही करते हैं। सूक्ष्म जीव इन जैविक पदार्थों को सड़ा कर व पचा कर ह्यूमस बनाते हैं। ह्यूमस ही मिट्टी की असली ताकत है। जिस मिट्टी में जितना ज्यादा ह्यूमस होगा उस मिट्टी की उतनी अधिक उपजाऊ क्षमता होगी। मिट्टी में जीवाणुओं की संख्या कम होने पर ह्यूमस जल्दी या ठीक से नहीं बनेगा।

जीवांश पदार्थ और ह्यूमस में अन्तर है ह्यूमस बनने में समय लगता है। ह्यूमस याने जैव रसायन (जीवनद्रव्य ) की निर्मिति जीवांश खाद व पौधों के अवशेष के विघटन के उपरांत होती है,विघटन करने वाले अनन्त करोड़ सूक्ष्म जीव होते हैं देशी गाय का गोबर इन सूक्ष्म जीवों का जामन होता है। ह्यूमस में अनेक पोषक तत्व पाए जाते हैं उनमें से दो जैविक कार्वन एवं जैविक नाइट्रोजन मुख्य हैं। जैविक कार्वन हरे पौधे प्रकाश संश्लेषण क्रिया द्वारा तथा जैविक नत्रजन ,नाइट्रोजन स्थिरीकरण जीवाणुओं द्वारा हवा से नत्रजन लेकर पौधों की जड़ों को उपलब्ध कराते हैं। ह्यूमस में मुख्य रूप से 60% जैविक कार्वन एवं 6% जैविक नत्रजन होता है जिसे C: N अनुपात 10:1 भी कहा जाता है। जब भूमि में ह्यूमस बनता है तब ही मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होता है मिट्टी में पोषक तत्वों को रोकने की ताकत इसी ह्यूमस से आती है ह्यूमस ही मिट्टी की ताकत है।

2- सूक्ष्म जीव पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। खेत में जो जीवांश हमने डाले उनमें उपस्थित पोषक तत्वों को निकालने व अलग करने का कार्य सूक्ष्म जीव ही करते हैं। भूमि में उपलब्ध पोषक तत्वों को उसी रूप में पौधे नहीं ले पाते हैं सूक्ष्म जीव ही इन पोषक तत्वों को उस रूप में बदलते हैं जिस रूप में पौधे उन तत्वों को लेते हैं। कुछ सूक्ष्म जीव राइजोबियम आदि वातावरण के नाइट्रोजन फिक्सेशन का कार्य करते हैं तथा पौधों को नत्रजन उपलब्ध कराते हैं।

सूक्ष्म जीव भूमि में उपलब्ध अघुलनशील फोस्फेट को घुलनशील बनाते हैं।पोटेशियम को मिट्टी के कणों से बाहर निकालने का कार्य सूक्ष्म जीव ही करते हैं। और भी कई अघुलनशील पोषक तत्वों को घुलनशील बनाते का कार्य सूक्ष्म जीव करते हैं।

3-  सूक्ष्म जीव मिट्टी से ऐसे कई हार्मोन विटामिन निकालने का कार्य करते हैं जो पौधों की जड़ों के विकास में सहायता करते हैं। जड़ें मजबूत होंगी तो वह भूमि से अधिक पोषक तत्वों को ग्रहण करेंगी जिससे पौधा मजबूत होगा।

4-  मृदा की संरचना व दशा को सुधारने का कार्य भी सूक्ष्म जीव करते हैं। सूक्ष्म जीव ऐसे रसायन निकालते हैं जिससे मिट्टी के कण बन्ध जाते हैं व मिट्टी को भुरभुरा बनाते हैं ऐसी मिट्टी में वायु का संचार अच्छा होता है जिससे जड़ों को आक्सीजन मिलती है तथा जड़ों का अच्छा विकास होता है ।

भूमि में सूक्ष्म जीवों की संख्या में वृद्धि करने के उपाय।

सूक्ष्म जीव कार्बनिक पदार्थ खाते हैं सूक्ष्म जीवों की मिट्टी में संख्या बढ़ाने हेतु जीवांश (जैविक ) खादों गोबर की खाद, कम्पोस्ट खाद, हरी खाद,वर्मी कम्पोस्ट, मुर्गी की खाद, फसलों के अवशेष आदि का अधिक प्रयोग करें।

जीवा मृत का प्रयोग करें।

पी एच मान 6.5 – 7.5 के बीच याने उदासीन बनाये रखें जिससे जीवाणु अपना कार्य ठीक से करते रहें। यदि मिट्टी अम्लीय है तो चूने का और यदि क्षारीय है तो जिप्सम का प्रयोग करें।

खेत में अधिक देर तक पानी न रुकने दें।

जैव उर्वरकों (बायो फर्टिलाइजर)का प्रयोग करें – जैव उर्वरक जीवित उर्वरक है जिनमें सूक्ष्म जीव विद्यमान होते हैं। ये प्राकृतिक तरीके से पौधों का पोषण करते हैं।

जैव उर्वरकों के प्रकार- नाइट्रोजन यौगिकीकरण करने वाले जीवांणु

*  दलहनी फसलें- राइजोबियम, अन्य फसलें – एजोटोबैक्टर, एजोस्पाइरिलम, एसीटोबैक्टर , अजोला,नीली हरी शैवाल आदि।

* फॉस्फोरस घुलनशीलता के लिए- एसपर्जिलस, पैनिसिलियम, स्यूडोमोनॉस, बैसिलस आदि।

* पोटाश व आयरन घुलनशीलता के लिए – बैसिलस, फ्रैच्युरिया, एसीटोबैक्टर आदि।

* प्लांट ग्रोथ प्रमोटिंग राइजोबैक्टीरिया- बैसिलस, फ्लोरिसेंट आदि।

* माइकोराइजल कवक- एक्टोमाईकोराइजा तथा अरवस्कुलर माईकोराइजा।

माइकोराइजा एक लाभदायक कवक (फंगस) है, जो पौधों की जड़ों के साथ सहजीवी संबंध बनाता है। यह पौधों को पोषक तत्व और पानी सोखने की क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है।

फसल चक्र में दलहनी फसलों का समावेश एवं मुख्य फसल के साथ अन्तर्वतीय फसलों का उत्पादन।

केंचुओं के लिए मल्चिंग (आछ्यादन ) कर सूक्ष्म वातावरण निर्मित करें।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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