Wednesday, March 18, 2026
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द्रोणागिरि के गोफारा गुफा में उत्कृत इन शैलचित्रों या भीत्तिचित्र लेख। काश…हिमालयराज के इस सन्देश को हम पढ़ पाते।

द्रोणागिरि के गोफारा गुफा में उत्कृत इन शैलचित्रों या भीत्तिचित्र लेख। काश…हिमालयराज के इस सन्देश को हम पढ़ पाते।

(मनोज इष्टवाल)

पर्यटन एवं धर्मस्व मंत्री सतपाल महाराज द्वारा हाल ही में कुमाऊँ दौरे के दौरान जिस तरह लखु उड्यार के पुरातन काल को 5000 बर्ष पूर्व का बताकर उसकी आख्या मांगी है। उसे तरीके से संग्रहित करने के कदम उठाये हैं वह अपने आप में सराहनीय कदम है।

इसी सन्दर्भ का पीछा करते हम द्रोणागिरी पर्वत को चर्चा में लाते हैं जहां की गोफारा गुफा द्रोणागिरी पर लिखी लिपि को कुछ विद्वान तिब्बतियन समुदाय के धर्मगुरुओं ने पढ़ने की कोशिश की है व उसका अर्थ या भावार्थ बताने की कोशिश की है। इस सम्बंध में गढ़वाल मंडल के उपायुक्त हरक सिंह रावत द्वारा द्रोणागिरी पर्वत को ट्रैक ऑफ़ द इयर-2017 घोषित होने के बाद वहां की गुफा के शैल व भीत्तिचित्र के जो प्रमाण दिए हैं, वह काबिलेतारीफ हैं।

मुझे लगता है कि आर्कोलोजी विभाग को द्रोणागिरी के शैलचित्रों के काल का अध्ययन करने के लिए एक दल द्रोणागिरी भेजना चाहिए ताकि देश दुनिया के आगे हम उसके पुरातन काल का वजूद स्पष्ट कर सकें, क्योंकि द्रोणागिरी रामायण काल से जुडा वह क्षेत्र रहा है, जहाँ से हनुमान संजीवनी बूटी के रूप में पर्वत राज हिमालय का एक अंश उठाकर श्रीलंका ले गए थे और इसी गुस्से में द्रोणागिरी क्षेत्र के लोग वहां हनुमान का नाम लेना भी उचित नहीं समझते हैं। अपर आयुक्त गढ़वाल हरक सिंह रावत द्रोणागिरी स्थित गोफारा उड्यार के बारे में जानकारी देते हुए बताते हैं कि गोफारा गुफा उड्यार द्रोणागिरी गाँव से ऊपर पर्वत देवता के बेहद निकट है। 

हरक सिंह रावत बताते हैं कि द्रोणागिरी गाँव के उनके बुजुर्ग गोफारा गुफा में उत्कृत इन शैलचित्रों या भीत्तिचित्र लेख के बारे में बताया जाता है कि पौराणिक काल में तिब्बत से आये कुछ शिकारियों ने इस क्षेत्र में चौंर गाय (चंवर गाय) का शिकार किया। और उस चौंर गाय का शिकार करने के बाद हो रही लगातार बर्फबारी से बचने के लिए मारी गयी चौंर गाय को भी गोफारा गुफा में ले गए, उनमें से एक लकडियाँ ढूँढने निकल गया। इस कृत्य से पर्वत देवता इतने रुष्ट हुए कि उन्होंने पूरी गुफा का बड़ा सा हिस्सा तोड़कर उन्हें वहीँ ज़िंदा दफन कर दिए उनमें से जो बचा था। उसी ने इस गुफा पर अपनी भाषा में कुछ लिखा है, जिसे उन्होंने विभिन्न तिब्बतीय विद्वानों से पढवाने की कोशिश की है व उन्होंने इसका अर्थ कुछ यों निकाल है:- “यह एक जीनोबो के सभी जीवित प्राणियों के लिए एक इच्छा है, जो “एक दिव्य प्राणी” क्षेत्र में रहता है। जोकि हर एक आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक दिल जमा कर सकते हैं। किसी बाधा और बाधा के बिना आप लम्बे समय तक जीवित रह सकते हैं और आप दुःख से छुटकारा पा सकते हैं।” उक्त लेख से पता चलता है कि द्रोणागिरी क्षेत्र में दिव्य भगवान निवास करते हैं जोकि आदमियों के आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से इस क्षेत्र में रहने वालों का भला कर सकते हैं।

ज्ञात हो कि रामायण काल (त्रैता युग) की जानकारी के अनुसार जब लक्ष्मण जी को मेघनाथ द्वारा ब्रहमास्त्र से मूर्छित कर दिया था, तब सुषैण वैध ने ही राम जी को सलाह दी थी कि द्रोणागिरी पर्वत देवता में ही ऐसी सर्व शक्ति विराजमान हैं जो लक्ष्मण जी की प्राण रक्षा कर सकती हैं। तब हनुमानजी इसी द्रोणागिरि का एक हिस्सा उखाड़कर लंका ले गये थे। तभी से द्रोणागिरि को पर्वतों के देेवता की मान्यता प्राप्त है व वहां उगने वाली वनस्पति को संजीवनी बूटी के रूप में मान्यता है।

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