देहरादून (हि. डिस्कवर)
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से एक कार्यक्रम के तहत प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, मैती आंदोलन के प्रणेता एवं पद्मश्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ का एक व्याख्यान कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसका विषय था “पर्यावरण संरक्षण के अभिनव प्रयोग और अनुभव” । इसके तहत कल्याण सिंह रावत ने केंद्र के सभागार में प्रेरक सचित्र व्याख्यान के माध्यम से विगत चार दशकों से अधिक समय के अपने अनुभवों, पर्यावरण संरक्षण के लिए किए गए नवाचारों तथा समाज को प्रकृति से जोड़ने के सफल प्रयासों को विस्तार से साझा किया। उन्होंने अपने व्याख्यान से उपस्थित श्रोताओं को पर्यावरण संरक्षण के प्रति संवेदनशील एवं सक्रिय बनाने का सार्थक संदेश दिया।
डॉ. रावत ने कहा कि प्रकृति संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं का विषय नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की नैतिक जिम्मेदारी है। उन्होंने अपने बचपन से प्रकृति के प्रति विकसित लगाव, वन विभाग से जुड़े अनुभवों तथा हिमालयी जीवन से मिली प्रेरणा का उल्लेख करते हुए बताया कि इन्हीं अनुभवों ने उन्हें पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में आजीवन कार्य करने की दिशा प्रदान की।
उन्होंने वर्ष 1995 में आरम्भ हुए विश्वप्रसिद्ध ‘मैती आंदोलन’ की प्रेरक यात्रा का सचित्र विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि विवाह जैसे शुभ अवसर पर नवदंपति द्वारा पौधारोपण की परंपरा ने आज एक जनआंदोलन का रूप ले लिया है। उत्तराखण्ड से प्रारम्भ हुआ यह अभियान आज देश के अनेक राज्यों और विदेशों तक पहुँच चुका है तथा इसके माध्यम से लाखों पौधों का रोपण किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि जब सामाजिक संस्कारों को प्रकृति संरक्षण से जोड़ा जाता है, तब पर्यावरण बचाने का अभियान स्थायी और प्रभावी बन जाता है।

व्याख्यान के दौरान डॉ. रावत ने चिपको आंदोलन, हिमालय बचाओ अभियान, जैव विविधता संरक्षण, जलस्रोतों के पुनर्जीवन, वन्यजीव संरक्षण तथा सामुदायिक सहभागिता के अनेक प्रेरक प्रसंग साझा किए। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए जनजागरण अभियानों, विद्यालय आधारित गतिविधियों तथा युवाओं की भूमिका पर विशेष बल दिया।
उन्होंने बताया कि उनके सामूहिक प्रयासों से रानीचौरी (टिहरी) में ‘मैती शोध एवं जैव विविधता वन’ की स्थापना की गई, जहाँ हजारों पौधों का रोपण कर एक समृद्ध हरित क्षेत्र विकसित किया गया है। यहाँ पर्यावरण शिक्षा, जैव विविधता संरक्षण तथा युवाओं के लिए स्वरोजगार आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम भी संचालित किए जा रहे हैं। उन्होंने रानीचौरी विश्वविद्यालय परिसर में विद्यार्थियों के सहयोग से विशाल नर्सरी विकसित करने, गाँवों में व्यापक वृक्षारोपण अभियान चलाने तथा ग्रीन बेस्ट अचीवर जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पर्यावरण चेतना को जन-जन तक पहुँचाने के प्रयासों की भी जानकारी दी।
डॉ. रावत ने अपने विभिन्न नवाचारों का उल्लेख करते हुए देवभूमि वृक्ष प्रसाद योजना, चाल-खाल पुनर्जीवन, हिमालय लोक संस्कृति संरक्षण, बुग्याल संरक्षण अभियान, लोकमौली वृक्ष संस्कृति, जलस्रोत संरक्षण तथा अनेक पर्यावरण मेलों के आयोजन की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पर्यावरण संरक्षण को उत्सव का स्वरूप देने के उद्देश्य से वन मेला, पर्यटन एवं पर्यावरण मेला, हिमालयी पर्यावरण मेला तथा रानीचौरी पर्यावरण मेले जैसे आयोजन प्रारम्भ किए गए, जिनका व्यापक सामाजिक प्रभाव देखने को मिला है।
उन्होंने विद्यालयों में ईको क्लबों के गठन, हजारों विद्यार्थियों को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने, उत्कृष्ट विद्यालयों के लिए हरित श्री सम्मान, तथा वर्ष 2024 से 2 सितम्बर को बुग्याल संरक्षण दिवस मनाने की पहल का भी उल्लेख किया। साथ ही देहरादून के ऐतिहासिक खलंगा स्मारक सहित अनेक स्थलों पर वृक्षारोपण कर उन्हें हरित स्मृति स्थलों के रूप में विकसित करने के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली अपनाकर ही आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित पर्यावरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी श्री चन्द्रशेखर तिवारी ने डॉ. कल्याण सिंह रावत का स्वागत एवं आभार व्यक्त करते हुए कहा कि मैती आंदोलन ने पर्यावरण संरक्षण को सामाजिक संस्कार और जनभागीदारी से जोड़कर एक नई दिशा प्रदान की है। उन्होंने डॉ. रावत का जीवन प्रकृति के प्रति समर्पण, समाज को जागरूक करने और पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बनाने का प्रेरणादायी उदाहरण बताया ।
उपस्थित प्रतिभागियों ने डॉ. रावत के सचित्र व्याख्यान को अत्यंत प्रेरणादायी बताया और मत व्यक्त किया कि पर्यावरण संरक्षण के लिए जनसहभागिता ही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है । जल, जंगल, जमीन और जैव विविधता के संरक्षण के प्रति सजग एवं सक्रिय रहने के प्रति लोगों का मानना था कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की नहीं, अपितु आम नागरिक की भी साझा जिम्मेदारी बनती है।
कार्यक्रम का सफल संचालन सामाजिक इतिहासकार डॉ. योगेश धस्माना ने किया।
आज के कार्यक्रम में पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी.के. पाण्डे, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, मदन बिष्ट, शीशपाल गुंसाई, न कर्नल डी.एस. बर्तवाल, कर्नल डी.पी. डिमरी, गजेन्द्र रमोला, शांति प्रसाद जिज्ञासु, बीना बेंजवाल, सुरेन्द्र सजवाण, शूरवीर सिंह रावत, आलोक हिमांशु आहूजा, संदीप गुसाई, कविता बिष्ट, परम जीत सिंह, कल्याण सिंह बुटोला देवेन्द्र कुमार सहित अनेक पर्यावरणविद्, पर्यावरण प्रेमी, बुद्धिजीवी, लेखक, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं युवा पाठक उपस्थित रहे।

