Sunday, March 15, 2026
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गैरसैंण की पीड़ा और एक बयान का बोझ

(शीशपाल गुसाईं)

उत्तराखंड की राजनीति में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो केवल शब्द नहीं रहते, वे भावना बन जाते हैं, इतिहास बन जाते हैं और कभी-कभी पूरे समाज की आत्मा को छू लेते हैं। “गैरसैंण” भी ऐसा ही एक शब्द है। यह केवल एक स्थान का नाम नहीं है, यह उस आंदोलन की स्मृति है जिसमें पहाड़ के हजारों युवाओं ने अपने सपने और अपने जीवन दांव पर लगाए थे। यह उस उम्मीद का नाम है जो पहाड़ के गांवों में जन्मी थी कि एक दिन राज्य की सत्ता भी उन्हीं पहाड़ों में बैठेगी जहां से राज्य आंदोलन की आवाज उठी थी।

इसीलिए जब गैरसैंण के बारे में कोई हल्का या असावधान बयान सामने आता है तो वह केवल राजनीतिक विवाद नहीं बनता, बल्कि पहाड़ के लोगों के दिल में एक गहरी टीस पैदा करता है। कल मंगलवार को उत्तराखंड के वरिष्ठ मंत्री सतपाल महाराज का वह बयान इसी कारण चर्चा का विषय बन गया जिसमें उन्होंने भराड़ीसैंण स्थित विधानमंडल भवन को भविष्य में वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की संभावना का जिक्र किया।

यह बयान शायद एक सामान्य टिप्पणी के रूप में कहा गया होगा, शायद पर्यटन की संभावनाओं की ओर इशारा करने के लिए कहा गया होगा, लेकिन जिस स्थान का संबंध उत्तराखंड की राजधानी की भावना से जुड़ा हो, वहां इस तरह की टिप्पणी स्वाभाविक रूप से विवाद को जन्म देती है। गैरसैंण केवल एक भवन या परिसर का नाम नहीं है; यह उस सपने का प्रतीक है जिसे राज्य आंदोलन के दौरान हजारों लोगों ने अपने भीतर संजोया था।

उत्तराखंड राज्य बनने से पहले लंबे समय तक पहाड़ के लोगों की शिकायत रही कि सत्ता मैदानों में बैठती है और फैसले पहाड़ के जीवन की कठिनाइयों को समझे बिना किए जाते हैं। यही कारण था कि राज्य आंदोलन के दौरान गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग लगातार उठती रही। आंदोलनकारियों का तर्क था कि राज्य का प्रशासनिक और राजनीतिक केंद्र वहीं होना चाहिए जहां राज्य की भौगोलिक और सामाजिक आत्मा बसती है।

जब वर्ष 2000 में उत्तराखंड राज्य बना तो देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाया गया। उस समय भी यह उम्मीद जताई गई थी कि भविष्य में राजधानी के प्रश्न पर व्यापक विचार किया जाएगा। लेकिन धीरे-धीरे समय बीतता गया और अस्थायी राजधानी स्थायी व्यवस्था का रूप लेती चली गई।

इसी पृष्ठभूमि में जब भराड़ीसैंण में विधानसभा भवन का निर्माण हुआ तो पहाड़ के लोगों के भीतर एक नई आशा जगी। उन्हें लगा कि शायद अब राज्य की सत्ता धीरे-धीरे पहाड़ की ओर लौटेगी। यही कारण था कि जब तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया तो इसे आंदोलन की भावना को सम्मान देने वाला कदम माना गया।

लेकिन इसके साथ ही एक सवाल भी बना रहा—क्या गैरसैंण वास्तव में प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनेगा, या वह केवल प्रतीकात्मक राजधानी बनकर रह जाएगा?

आज की स्थिति यह है कि भराड़ीसैंण का विधानमंडल परिसर अत्यंत भव्य और आधुनिक है। वहां विधानसभा भवन, विधायक आवास, अधिकारियों के आवास और कई अन्य बुनियादी ढांचे विकसित किए गए हैं। इन परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद साल भर में केवल कुछ ही दिनों के लिए वहां विधानसभा सत्र आयोजित होता है।

यही कारण है कि जब वेडिंग डेस्टिनेशन जैसी टिप्पणी सामने आई तो विपक्षी नेताओं ने इसे तुरंत राजनीतिक मुद्दा बना दिया। उनका कहना था कि यदि साल में तीन या चार दिन ही सत्र चलेगा और बाकी समय उस परिसर को विवाह समारोहों के लिए उपयोग किया जाएगा, तो यह उस भावना के साथ न्याय नहीं होगा जिसके कारण गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग उठी थी।

इस पूरे विवाद का एक और महत्वपूर्ण पहलू सतपाल महाराज का राजनीतिक कद भी है। वे उत्तराखंड की राजनीति में केवल एक मंत्री नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लंबे अनुभव वाले नेता रहे हैं। जून 1997 से मार्च 1998 के बीच उन्होंने केंद्र सरकार में वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया, उस समय भारत के प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल व वित्त मंत्री पी. चितम्बरम थे। उस दौर में भारत की अर्थव्यवस्था उदारीकरण के महत्वपूर्ण चरण से गुजर रही थी और आर्थिक नीतियों के बड़े फैसले लिए जा रहे थे। ऐसे समय में वित्त मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में कार्य करना अपने आप में एक बड़ी जिम्मेदारी थी।

इसके बाद जुलाई 1996 से जून 1997 के बीच जब केंद्र में संयुक्त मोर्चा सरकार बनी और सी के जाफर शरीफ रेल मंत्री बने, उस समय सतपाल महाराज रेल राज्य मंत्री के रूप में कार्यरत थे। उसी दौर में ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के सर्वेक्षण की पहल हुई। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए यह परियोजना लंबे समय से एक सपना रही है और इसे पहाड़ के विकास की जीवनरेखा माना जाता है। वर्षों बाद यह परियोजना वास्तविक निर्माण के चरण में पहुंची, लेकिन उसके प्रारंभिक विचार और सर्वेक्षण की शुरुआत 1990 के दशक में ही हो गई थी। इसलिए कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस परियोजना की दिशा तय करने में सतपाल महाराज की भूमिका महत्वपूर्ण रही।

इसी तरह उत्तराखंड राज्य निर्माण की प्रक्रिया में भी उनका नाम लिया जाता है। 1996 के दौर में जब अलग उत्तराखंड राज्य की मांग राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुंच रही थी और उस समय के प्रधानमंत्री एच. डी. देवगौड़ा के नेतृत्व में केंद्र सरकार चल रही थी, तब दिल्ली की राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे को आगे बढ़ाने और विभिन्न नेताओं के बीच संवाद स्थापित करने में सतपाल महाराज की भूमिका को कई लोग महत्वपूर्ण मानते हैं।

यही कारण है कि उनके समर्थक और कुछ राजनीतिक विश्लेषक उन्हें प्रतीकात्मक रूप से “रेल पुरुष” भी कहते हैं। लेकिन राजनीति में उपलब्धियों के साथ-साथ सार्वजनिक शब्दों की जिम्मेदारी भी होती है। कई बार एक छोटा-सा बयान भी बड़ी बहस को जन्म दे देता है।

गैरसैंण के संदर्भ में भी यही हुआ। पहाड़ के गांवों में रहने वाले लोग पहले ही इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि राज्य बनने के बावजूद पहाड़ी क्षेत्रों से पलायन लगातार जारी है। गांव खाली हो रहे हैं, खेत बंजर हो रहे हैं और युवा रोजगार की तलाश में मैदानों या महानगरों की ओर जा रहे हैं।

ऐसे समय में जब गैरसैंण को राजधानी के रूप में विकसित करने की उम्मीद लोगों के मन में अब भी जीवित है, तब वहां के विधानसभा परिसर को विवाह स्थल के रूप में देखने की कल्पना कई लोगों को असहज करती है। यह असहजता केवल राजनीति की उपज नहीं है; यह उस भावनात्मक जुड़ाव का परिणाम है जो पहाड़ के लोग गैरसैंण के साथ महसूस करते हैं।

लेकिन इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यह भी है कि इतना बड़ा राजनीतिक कद रखने वाला व्यक्ति आखिर ऐसी हल्की टिप्पणी क्यों कर रहा है। सतपाल महाराज कोई साधारण नेता नहीं हैं। वे उस पीढ़ी के नेता हैं जिन्होंने संसद की राजनीति देखी है, केंद्र सरकार में जिम्मेदारियां निभाई हैं और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।

ऐसे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि उनके शब्दों में गंभीरता और दूरदृष्टि दिखाई दे। लेकिन भराड़ीसैंण को वेडिंग डेस्टिनेशन बताने जैसी टिप्पणी कई लोगों को इस कारण भी चौंकाती है कि यह शैली किसी ब्लॉक प्रमुख या स्थानीय नेता की हल्की बयानबाजी जैसी प्रतीत होती है, न कि उस व्यक्ति की जिसने राष्ट्रीय राजनीति में काम किया हो।

यहीं से एक और राजनीतिक प्रश्न जन्म लेता है—क्या सतपाल महाराज जैसे नेता को अनजाने में किसी राजनीतिक खेल का मोहरा बनाया जा रहा है। क्या उन्हें ऐसे विवादों में उलझाकर उनके राजनीतिक कद को सीमित करने की कोशिश की जा रही है।

यह प्रश्न इसलिए भी उठता है क्योंकि उत्तराखंड की राजनीति में उनका अनुभव और कद असाधारण माना जाता है। एक समय ऐसा भी रहा जब उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व के भीतर अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए कई विधानसभा क्षेत्रों में टिकट वितरण को प्रभावित किया था। कहा जाता है कि उन्होंने सोनिया गांधी के समक्ष अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन करते हुए आधा दर्जन से अधिक नेताओं के टिकट बदलवा दिए थे।

बाद में वे कांग्रेस से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी में आ गए और भाजपा में आए हुए भी उन्हें एक दशक से अधिक समय हो चुका है। इसके बावजूद यह सवाल अक्सर उठता है कि इतने बड़े अनुभव और राष्ट्रीय पहचान के बावजूद वे राज्य की राजनीति में वह स्थान क्यों नहीं प्राप्त कर पाए जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती थी।

कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि इसका एक कारण उनकी सार्वजनिक बयानबाजी की शैली भी रही है। कई बार उनके बयान ऐसे विवादों को जन्म दे देते हैं जिनसे उनका राजनीतिक कद कमजोर होता दिखाई देता है।

2017 में जब त्रिवेंद्र सिंह रावत के नेतृत्व में उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनी और सतपाल महाराज को कैबिनेट मंत्री बनाया गया, तब भी कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया था। उन्हें लगा था कि केंद्र की राजनीति का अनुभव रखने वाला इतना वरिष्ठ नेता राज्य की राजनीति में सीमित भूमिका में क्यों है।

इस पूरे प्रसंग का एक और पक्ष भी है। आज जब गैरसैंण को लेकर राज्य के भीतर फिर से आंदोलन और राजनीतिक बहस दिखाई दे रही है, तब ऐसे बयान और अधिक संवेदनशील हो जाते हैं। एक ओर उत्तराखंड क्रांति दल और कांग्रेस पार्टी गैरसैंण के मुद्दे को लेकर आवाज उठा रही हैं, वहीं दूसरी ओर सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी विनोद रतूड़ी जैसे लोग भी गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं।

ऐसे समय में यदि भराड़ीसैंण के विधानसभा परिसर को वेडिंग डेस्टिनेशन , मीटिंग हॉल बनाने की बात कही जाए तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या इस स्थान की ऐतिहासिक और राजनीतिक गरिमा को समझा जा रहा है या नहीं।

क्या सचमुच उस भवन के प्रांगण में, जहां राज्य की नीतियां तय होती हैं, एक दिन डीजे बजेगा, बैंड बजेगा और जयमाला के मंच सजेंगे? क्या यही वह सपना था जिसके लिए हजारों लोगों ने आंदोलन किया था? क्या यही वह कल्पना थी जिसके लिए राज्य बनने के बाद हजारों करोड़ रुपये खर्च कर भराड़ीसैंण में विधानमंडल परिसर बनाया गया था?

गैरसैंण की पहाड़ियों के सामने एक और ऐतिहासिक स्मृति भी है जो इस बहस को और अधिक भावनात्मक बना देती है। ठीक सामने की पहाड़ियों में कोडियाबगड़ (दूधातोली) का वह क्षेत्र है जहां महान स्वतंत्रता सेनानी चंद्र सिंह गढ़वाली की अस्थियों का विसर्जन हुआ था। वही चंद्र सिंह गढ़वाली जिन्होंने अंग्रेजी शासन के आदेश को ठुकराकर पेशावर में गोली चलाने से इनकार कर दिया था और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अमर हो गए थे।

कहा जाता है कि उन्होंने भी पहाड़ की अस्मिता और सम्मान को ध्यान में रखते हुए कोडियाबगड़ (दूधातोली) को नेहरू जी से राजधानी बनाने की इच्छा व्यक्त की थी। ऐसे में यदि उसी ऐतिहासिक भूमि के सामने लोकतंत्र के मंदिर को विवाह स्थल में बदलने की बात कही जाए तो स्वाभाविक है कि यह पहाड़ की संवेदनाओं को झकझोर देती है।

गैरसैंण केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं है। यह उत्तराखंड की आत्मा का प्रतीक है। यह उस सपने का प्रतीक है जिसमें पहाड़ के गांवों ने अपने भविष्य को देखा था। इसीलिए पहाड़ के लोगों की दिल की पुकार आज भी वही है—गैरसैंण को केवल एक प्रतीक बनाकर न छोड़ा जाए। उसे उसी सम्मान और महत्व के साथ विकसित किया जाए जिसकी कल्पना उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान की गई थी।

सतपाल महाराज जैसे अनुभवी नेताओं से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे अपने शब्दों के माध्यम से उस भावना को मजबूत करें, कमजोर नहीं। क्योंकि राजनीति में शब्द केवल वाक्य नहीं होते, वे समाज की दिशा तय करने वाले संकेत भी होते हैं। और जब बात गैरसैंण की हो, तो हर शब्द पहाड़ के दिल में गूँजता है।

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35 बर्षों से पत्रकारिता के प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक, पर्यटन, धर्म-संस्कृति सहित तमाम उन मुद्दों को बेबाकी से उठाना जो विश्व भर में लोक समाज, लोक संस्कृति व आम जनमानस के लिए लाभप्रद हो व हर उस सकारात्मक पहलु की बात करना जो सर्व जन सुखाय: सर्व जन हिताय हो.
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